Thursday, September 17, 2020

बातें—मुलाकातें : 17 (मुकुल देव)

बातें—मुलाकातें : 17 

मुकुल देव एक ऐसे कलाकार हैं, जिनका अभिनय कैरियर बिना किसी शोर—शराबे के बदस्तूर जारी है. मिस यूनिवर्स बनी सुष्मिता सेन के नायक के रूप में दस्तक फिल्म से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाले मुकुल 50 से ज्यादा फिल्मों और दो दर्जन से ज्यादी टीवी धारावाहिकों में अभिनय कर चुके हैं. उन्होंने हिंदी, पंजाबी, बंगाली, तमिल और कई दूसरी भाषाओं की फिल्मों में काम किया है. विख्यात अभिनेता और मॉडल राहुल देव उनके बड़े भाई हैं. और मुकुल से मेरी मुलाकात राहुल की वजह से ही हुई थी. राहुल से तब तक मेरी अच्छी मित्रता हो चुकी थी और हमारा घर उनके घर से एक—डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर ही था, इसलिए अक्सर जाना होता रहता था. फिल्मों में मुकुल राहुल से थोड़ा पहले आ गए थे और उस समय तक मुंबई शिफ्ट हो चुके थे. एक दिन पता चला कि वह दिल्ली आ रहे हैं तो तय हुआ कि उनका इंटरव्यू भी कर लेना चाहिए. वक्त लेने की जरूरत नहीं पड़ी, क्योंकि राहुल पहले ही उन्हें मेरे बारे में बता चुके थे.


बहरहाल, मैं मुकुल से मिलने उनके साकेत स्थित घर पहुँचा. एक दम भाई से मुख्तलिफ मिजाज वाले मुकुल में मुझे जबर्दस्त आत्मविश्वास देखने को मिला. राहुल जहाँ बेहद शांत और सोच—समझकर बातें करते थे, वहीं मुकुल के व्यवहार में बहुत बेबाकी और लापरवाही थी. तो उन्होंने इंटरव्यू के दौरान कई बार जोश में आकर बहुत सारी ऐसी बातें भी कहीं, जो इंटरव्यू में शामिल नहीं की जानी चाहिए थीं. इस लंबे इंटरव्यू और बातचीत के बाद जो कुछ मेरी समझ में आया, मैंने लिखकर नवभारत टाइम्स में जमा करा दिया. लेकिन, मुकुल के व्यवहार में कहीं मुझे ऐसा नहीं महसूस हुआ कि उनके साथ मेरे कभी अनौपचारिक रिश्ते बन पाएंगे. हालांकि बाद में दो—तीन बार अलग—अलग मुद्दों पर उनसे संक्षिप्त बातचीत हुई, लेकिन कभी यह बातचीत पत्रकार—कलाकार वाले स्तर से आगे नहीं बढ़ सकी. बहरहाल, आज मुकुल का जन्मदिन है, उन्हें हार्दिक शुभकामनाएं...

Interview




Saturday, September 12, 2020

बातें—मुुलाकातें : 16 (दुर्गा जसराज)

कला और संगीत उन्हें विरासत में मिले हैं. उनके नाना व्ही. शांताराम भारतीय सिनेमा के दिग्गज थे तो पिता पंडित जसराज, ​हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायन के. भाई सारंगदेव भी एक नामचीन म्युजिशियन हैं और माँ मधुरा पंडित गायिका. तो भला संगीत से वे कैसे अछूती रह सकती हैं. जी हाँ, हम बात कर रहे हैं इंडियन क्लासिकल सिंगर दुर्गा जसराज की, जो गायकी के अलावा अंताक्ष्यरी जैसे प्रसिद्ध टीवी शो की होस्ट, चंद्रकांता और महाभारत जैसे धारावाहिकों में एक्ट्रेस भी रह चुकी हैं. फिलहाल वह अपनी खुद की कंटेंट कंपनी और एक संगीत अकादमी चलाती हैं.

दुर्गा से मेरी मुलाकात दिल्ली में हुई थी, जब वह अपने टीवी शो के आॅडिशन के लिए आई हुई थीं और एक पाँच सितारा होटल में ठहरी थीं.  मैंने होटल फोन किया और दुर्गा से मुलाकात के लिए वक्त माँगा. उन्होंने बिना किसी हील हुज्जत के अगले दिन होटल बुला लिया. वहीं रिसपेप्शन पर मुझे उनके को होस्ट अन्नू कपूर मिल गए. मुझे देखते ही वे चहके, अरे आप... यहाँ कैसे. उनके इस गर्मजोशी भरे व्यवहार से मुझे बहुत अच्छा लगा, क्योंकि पिछले ही दिन उनसे मेरी बड़ी गर्मागरम मुठभेड़ होकर चुकी थी, जिसके बारे में फिर कभी चर्चा करेंगे. मैंने बताया कि मैं दुर्गा जी का इंटरव्यू करने आया हूँ. उन्होंने कहा कि जाइए, वो आप ही का वेट कर रही हैं. 



रूम नंबर पता कर, मैं दुर्गा के कमरे में पहुँचा. जहाँ, वे तो नहीं बल्कि एक चेयर पर रखी लाल बालों वाली जनाना विग मुझे अपना इंतजार करती हुई मिली. कहीं ये टकली तो नहीं है, मुझे आशंका हुई. मैंने उन्हें आवाज दी. उन्होेंने मुझे बैठने के लिए कहा. कुछ मिनट के बाद उनका आगमन हुआ. उनके बालों के लेकर मेरी आशंका निर्मूल साबित हुई और फिर शुरू हुआ सवाल—जवाब का सिलसिला. इसके अलावा मुझे और कोई ऐसी बात याद नहीं, जो काबिले जिक्र हो. सिवा इसके कि भले ही हमारी बातचीत बहुत दिलचस्प न रही हो, लेकिन इस बातचीत के बाद जो इंटरव्यू तैयार हुआ, वह बहुत दिलचस्प है. आप भी पढ़िए और आज उनका जन्मदिन भी है तो इस मौके पर उन्हें बहुत सारी शुभकामनाएं...

Interview



 

Sunday, September 6, 2020

बातें-मुलाकातें: 15 (बैरी जाॅन)

भले ही अंग्रेजों ने करीब दो सौ साल हमें गुलाम बनाकर रखा हो, लेकिन आजादी मिलने के बाद देश में जो गिनती के अंग्रेज बचे हैं, उन्हें लेकर हम बड़ी करुणा से भरे रहते हैं. पता नहीं यह उनके गोरे रंग का आकर्षण होता है या हिंदुस्तान में उनकी मौजूदा स्थिति, अक्सर हम अंग्रेजों को देखकर उनके बारे में एक अजीब किस्म की सहानुभूति ही महसूस करते हैं, गोया जंगल का राजा शेर किसी पिंजरे में कैद हो.

एक पत्रकार के रूप में मेरा वास्ता दो अंग्रेजों से पड़ा है और दोनों के ही तजुर्बे बड़े मुख्तलिफ किस्म के रहे हैं. लेकिन आज मैं एक ही अंग्रेज की बात करूंगा. यह हैं बैरी जाॅन...
बैरी जाॅन भारतीय रंगमंच में एक दबदबे वाली जगह रखते हैं और शाहरुख जैसे स्टार और मनोज वाजपेयी जैसे कलाकार, उनके सेलिब्रिटी चेलों में शुमार हैं. उनसे मेरी पहली मुलाकात एनएसडी की एक वर्कशाॅप के दौरान हुई थी, लेकिन तब कोई बात नहीं हो पाई थी. लेकिन असली मुठभेड़ हुई इसके कुछ साल बाद जब मैंने दैनिक भास्कर का फीचर डिपार्टमेंट जाॅइन कर लिया था.
हम चर्चित लोगों के संस्मरण लिया करते थे. मैंने जाॅन का नाम सुझाया और संपादक की मंजूरी मिलने के बाद उनके आॅफिस में फोन लगा दिया. तब तक वे इमागो नाम का एक एक्टिंग स्कूल खोल चुके थे.
उनके सहायक ने फोन उठाया और मेरा संदेश जाॅन तक पहुँचाया. फोन पर बातचीत हुई. तो पता चला कि जाॅन को हिंदी समझने में तकलीफ होती थी और मुझे अंग्रेजी में. लिहाजा तय हुआ कि मैं अपने सवाल ई-मेल कर दूँगा, जिन्हें पढ़कर जाॅन मेल से ही अपने जवाब भेज देंगे.
यहाँ तक तो सब ठीक था. गड़बड़ तब हुई, जब हमारे आॅफिस का इंटरनेट ठप्प पड़ गया. अब जाॅन के जवाब लेने के लिए साइबर कैफे जाना पड़ता, इसलिए मैंने सोचा कि एक बार फोन करके उनके सहायक से पूछ लेता हूँ कि जवाब मेल किए हैं या नहीं, जिससे समय और पैसा खराब न हो. मैंने फोन लगाया और उससे पूछा कि जवाब मेल किए हैं या नहीं... उसने पता नहीं क्या समझा, सीधे जाॅन से फोन कनेक्ट कर दिया. जाॅन ने मेरा सवाल सुनते ही मुझे लताड़ते हुए अंग्रेजी में लेक्चर पेलना शुरू कर दिया, अच्छी बात यह थी कि मुझे बोली हुई अंग्रेजी, खासकर अंग्रेजों की बोली हुई, ज्यादा नहीं समझती थी, इसलिए न ज्यादा बेइज्जती महसूस हुई और न ही बहुत गुस्सा आया. लेकिन, इतना तो समझ में आ ही गया था कि जाॅन मुझसे कह रहे थे कि यह मेरी रिस्पाॅन्सिबिलिटी थी कि मैं फोन करने के बजाए पहले अपना मेल चेक करता. मुझे उम्मीद न थी कि उस मासूम से दिखने वाले शख्स के भीतर इतना ज्यादा ईगो भरा होगा.
खैर, इंटरव्यू तो मैंने अनुवाद करके पब्लिश करवा दिया था, लेकिन जाॅन के इस व्यवहार की वजह से मेरा मन लंबे समय तक उनके प्रति नाराजगी से भरा रहा. अब कभी-कभार जब जाॅन किसी फिल्म में नजर आते हैं, तो मुझे बरबस ही वो वाकया याद आ जाता है, जिसके बाद मैंने जाॅन को जानवर कहना शुरू कर दिया था.

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Tuesday, September 1, 2020

बातें- मुलाकातें: 14 ( शोभना नारायण )

विश्वख्यिात कथक नृत्यांगना पद्मश्री शोभना नारायण उन सक्षम लोगों में से एक हैं, जो जिस क्षेत्र में कदम रखते हैं, उनमें ही नए-नए आयाम गढ़ते हैं. वह एक क्लासिकल डांसर हैं, बैले डांस और टैप डांस जैसी वेस्टर्न डांस आर्ट के साथ कोलिब्रेट कर दुनिया भर में दर्जनों सफल डांस शो कोरियोग्राफर हैं, नृत्य प्रशिक्षिका हैं, अभिनेत्री हैं, नृत्य के विभिन्न आयामों पर दस से ज्यादा पुस्तकें लिख चुकी लेखिका हैं और इस सबके साथ-साथ वह एक सीनियर सरकारी अफसर भी रही हैं और नौकरी व कला के बीच जबर्दस्त संतुलन साधते हुए निरंतर आगे बढ़ती रही हैं.

मेरी शोभना जी से मुलाकात एक इंटरव्यू के लिए ही हुई थी. निर्धारित समय पर मैं लोधी गार्डन एरिया में उनके आॅफिस जा पहुँचा. वहाँ उन्होंने बड़ी गर्मजोशी से मेरा स्वागत किया. इंटरव्यू के लिए जो कुछ पूछना था, वह तो पूछा ही, लेकिन मेरे जिस सवाल से वह सबसे ज्यादा खुश हुई वह यह था कि कला और ब्यूरोक्रेसी, इन दो नावों की सवारी एक साथ करते हुए क्या उन्हें बीच में गिर जाने का डर नहीं लगता. इस पर उन्होंने कहा कि आज तक किसी ने उनसे ऐसा सवाल नहीं पूछा और वे दो नहीं बल्कि तीन नावों ( परिवार भी) की सवारी कर रही हैं और उन्हें खुद नहीं पता कि वह यह सब कैसे मैनेज कर लेती हैं.

यह उनके व्यवहार की मधुरता और स्वभाव की मिलनसारिता ही थी कि इंटरव्यू के बाद भी हम काफी देर साथ बैठे और इधर-उधर की बातें करते रहे. उन्होंने अपनी कई प्रतिभाशाली शिष्याओं के बारे में बताया कि आप चाहें तो इनका भी इंटरव्यू कर सकते हैं. फिर तभी उनकी एक फिल्म अकबर‘स ब्रिज के प्रोड्यूसर मनोहर आशी वहाँ आ पहुँचे. उस समय यह फिल्म बन ही रही थी. शोभना जी ने उनसे मेरा परिचय कराया और फिर मुझे एक अनसुनी कहानी जानने को मिली कि किस तरह 1556 में अकबर बादशाह, औलाद की चाह में जौनपुर में गोमती के किनारे एक मस्जिद बनाना चाहते थे, लेकिन एक कुम्हार स्त्री ( इसकी भूमिका शोभना जी ने की थी) ने जब उनसे कहा कि इस इलाके के लोगों को मस्जिद से ज्यादा पुल की जरूरत है तो उन्होंने मस्जिद बनाने का इरादा छोड़कर वहाँ रहने वालों के लिए पुल का निर्माण कराया.  आशी ने बताया कि इस भूमिका के लिए शोभना जी ने बहुत मेहनत की है और उन्होंने अपने रोल को रीयल बनाने के लिए कुम्हार परिवार के साथ काफी वक्त बिताया था. 

आशी और शोभना जी चाहते थे कि मैं उस फिल्म के बारे में लिखूँ, लेकिन कुछ वजहों से यह संभव नहीं हो पाया. पर शोभना जी से मेरे सम्पर्क बाद में भी कई साल तक बने रहे और मुझे जब भी किसी खास विषय पर बात करनी होती, मैं बेहिचक उन्हें फोन कर दिया करता और वे भी बिना किसी टाल-मटोल के मुझे वक्त और सहयोग देतीं. 

आज उनका जन्मदिन है, इस मौके पर हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं... 

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Thursday, August 27, 2020

बातें-मुलाकातेंः 13 (मिनी मेनन)

यह वह दौर था, जब भारतीय युवतियाँ विश्व फलक पर अपने सौंदर्य के जलवे बिखरा रही थीं और हर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में पहला, दूसरा या तीसरा स्थान हासिल कर रही थीं. संयोग से इनमें से कई दिल्ली या नोएडा की रहने वाली थीं, तो उन तक पहुँचना अपेक्षाकृत सुगम था, तो करीब आधा दर्जन विनर ब्यूटीज के इंटरव्यू मेरे खाते में दर्ज हो चुके थे. ऐसा ही एक अहम खिताब मिनी मेनन ने भी जीता था, फेमिना मिस इंडिया एशिया पैसेफिक का...

मिनी के बारे में मुझे एक हमपेशा मित्र से पता चला, जो कुछ दिन पहले उनका इंटरव्यू कर चुकी थी. हम एक-दूसरे से अपने एक्सपीरिएंस और रिफ्रेंस शेअर किया करते थे. उसने मिनी की बहुत तारीफ की कि वह एक बहुत ही स्वीट- सिंपल और डाउन टू अर्थ गर्ल है और बहुत सुलझी हुई भी. उसने मुझे सुझाव दिया कि मुझे मिनी का इंटरव्यू भी करना चाहिए. मुझे भी सरल हृदय व्यक्तियों से मिलकर बहुत अच्छा लगता था, तो मैंने उससे मिनी का टेलीफोन नंबर ले लिया और उन्हें फोन करके नवभारत टाइम्स में चल रहे अपने काॅलम मेरा सपना के बारे में बताया और कहा कि मैं इस काॅलम के लिए उनका इंटरव्यू करना चाहता हूँ. मिनी ने कहा कि इन दिनों उनके पापा की तबियत खराब है तो कुछ दिन बाद काॅल कर लीजिएगा हफ्ते भर बाद मैंने फिर फोन किया तो मिनी ने फिर वही विवशता जाहिर की. कुछ दिनों के अंतर से मैंने फिर दो-तीन बार उन्हें काॅल किया, लेकिन इसी तरह की परिस्थिति सामने आती रही. 

करीब एक-डेढ़ महीने के बाद मैंने मिनी को काॅल किया तो वह बोली कि आप कल आ सकते हैं क्या? मैंने अपनी सहमति दे दी और इंटरव्यू के लिए मिनी के नोएडा स्थित घर पहुँच गया. जैसा मेरी दोस्त ने बताया था, मिनी मुझे उससे भी कहीं ज्यादा स्वीट और सिंपल लगीं. हमने काफी देर बात-चीत की. मैं सवाल करता गया, वो जवाब देती गईं. और इंटरव्यू खत्म हुआ. इंटरव्यू के बाद चाय आ गई. चाय की चुस्की लेते हुए मैंने मिनी से उनके पापा की तबियत के बारे में पूछा. मिनी ने जवाब दिया कि वे कुछ ही दिन पहले एक्सपायर हो गए. बताते-बताते वह उदासी, उनकी आवाज और आँखों में छलक आई, जिसे अब तक उन्होंने बड़े सब्र से अपने भीतर सँभाले रखा था. 

मुझे बहुत दुःख महसूस हुआ और मैंने अफसोस जाहिर करते हुए कहा कि आप अगर बता देतीं तो मैं कुछ दिन बाद आ जाता. मिनी बोली कि कोई बात नहीं, आप इतने दिनों से मेरा इंटरव्यू करना चाहते थे तो मुझे आपको और होल्ड पर रखना ठीक नहीं लगा. मैंने मन ही मन मिनी के साहस की दाद दी और इस बात के लिए उनका शुक्रिया अदा किया कि अपने   दुःख के बावजूद उन्होंने इस बात का ध्यान रखा कि मुझे असुविधा न हो. 

अपने पैशन को प्रोफेशन में बदलना और उसमें कामयाबी व शोहरत हासिल करना बहुत भाग्यशाली लोगों को नसीब होता है. अच्छी बात यह है कि मिनी उनमें से एक हैं. इंटरव्यू के दौरान मिनी ने अपने बहुत सारे सपनों के बारे में बताया था, उनमें तीन थे आर्कियोलाॅजी में कैरियर बनाना, मीडिया में नाम कमाना और दुनिया की सैर करना. इत्तेफाक देखिए कि आज ये तीनों सपने लगभग हकीकत में तब्दील हो चुके हैं. मिनी बीते सालों में एक प्रतिष्ठित लेखक और पत्रकार बन चुकी हैं. उनके खाते में ब्लूमबर्ग टीवी इंडिया की इनसाइड इंडियाज बेस्ट नोन कंपनीज, द पिच और असाइनमेंट जैसे लोकप्रिय शोज, इन फोकस जैसी अवार्ड-विनिंग डाॅक्यूमेंट्रीज, भारत के सात अग्रणी उद्यमियों पर आधारित राइडिंग द वेव नाम की एक किताब दर्ज हैं. उन्हें इंडियन ब्राॅडकास्ट फेडरेशन द्वारा बेस्ट बिजनेस न्यूज एंकर अवार्ड, जीटीवी के अस्तित्व अवार्ड फाॅर जर्नलिज्म और  राजीव गाँधी अवार्ड फाॅर एक्सीलेंस एज ए यंग अचीवर जैसे प्रतिष्ठित सम्मान भी मिल चुके हैं. इम्पेक्ट मैगजीन द्वारा साल 2013 में मिनी को इंडियन मार्केटिंग, एडवर्टाइजिंग और मीडिया के क्षेत्र में दस सर्वाधिक प्रभावशाली महिलाओं में शुमार किया गया था.

और जहाँ तक इतिहास और पुरातत्व के प्रति उनके आकर्षण का सवाल है तो यह जानना एक सुखद अनुभव है कि वे इन दिनों लाइव हिस्ट्री इंडिया (https://www.livehistoryindia.com/)  की कोफाउंडर और एडिटर हैं और पूरी शिद्दत से भारतीय इतिहास और पुरातत्व के तमाम अनछुए पहलुओं और अनजाने पन्नों को दुनिया के सामने उजागर करने में लगी हैं.

आज मिनी का जन्मदिन है, उन्हें इस मौके पर और उनकी तमाम उपलब्धियों के लिए हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं कि वह यूँ ही सफलता के नित नए मकाम हासिल करती रहें.

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Wednesday, August 26, 2020

बातें-मुलाकातें: 12 (बासु भट्टाचार्य )

वैसे तो बासु भट्टाचार्य जी ने अनुभव, आविष्कार, गृहप्रवेश, पंचवटी और आस्था जैसी कई बेहद उम्दा फिल्में बनाई हैं, लेकिन उन्हें सबसे ज्यादा जाना जाता है, तीसरी कसम के लिए. यह फिल्म भले ही कारोबारी लिहाज से कामयाब न रही हो, लेकिन हिंदी सिनेमा के इतिहास में एक मील के पत्थर के रूप में दर्ज है. इसे 1966 में सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था.


बहरहाल, मौका था साहित्य अकादमी द्वारा साहित्य और सिनेमा पर आयोजित तीन दिवसीय सेमिनार का, जहाँ भट्टाचार्य फणीश्वर नाथ रेणु जी की कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ पर आधारित अपनी फिल्म तीसरी कसम के बारे में चर्चा के लिए आए थे.

अपने व्याख्यान में उन्होंने इस फिल्म की निर्माण यात्रा के बारे में बहुत दुर्लभ जानकारियाँ साझा कीं. व्याख्यान के बाद जब वह इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के आॅडिटोरियम से बाहर आए तो मैंने उन्हें थाम लिया और अपना परिचय देने के बाद उनके व्याख्यान की तारीफ करते हुए उनसे कहा कि मैं उनका इंटरव्यू करना चाहता हूँ.

चलते-चलते उन्होंने पूछा कि आपने तीसरी कसम देखी है? मैंने नहीं देखी थी, इसलिए न में जवाब दिया. इस पर वह बोले कि फिर मैं आपसे बात नहीं करूंगा. मैंने कहा कि लेकिन मैंने आपकी अनुभव और आविष्कार देखी हैं. पहले उन्होंने मुझे घूरा और बोले कि ठीक है, पर ज्यादा वक्त मत लीजिएगा. मैंने कहा हद से हद पंद्रह मिनट.

और फिर हम वहीं लाॅन में पड़ी कुर्सियों पर बैठ गए. मैंने डिक्टाफोन शुरू कर दिया और फिर जो बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ, वह तकरीबन पौन घंटा चला.

बहुत सारे सवाल-जवाब हुए. एक सवाल उनकी आने वाली फिल्म आस्था के बारे में भी था, जिसमें ओमपुरी, रेखा और नवीन निश्चल मुख्य भूमिकाओं में थे.

मैंने उनके एक पुराने इंटरव्यू में पढ़ा था कि इस फिल्म की कहानी उन्होंने अमिताभ बच्चन व रेखा को ध्यान में रखकर लिखी थी. इंटरव्यू में उन्होंने साफ कहा था कि यह फिल्म कोई और नहीं कर सकता. अगर अमिताभ इस फिल्म को करने के लिए राजी नहीं होते तो मैं यह फिल्म कभी नहीं बनाऊंगा.

मैंने उन्हें यह बात याद दिलाई तो वह बिदक गए. उन्होंने कहा कि उन्होंने ऐसा कभी नहीं कहा. वह इंटरव्यू मेरी इकट्ठा की गई रिफ्रेंस क्लिपिंग्स में सुरक्षित था और आज भी मेरे पास रखा हुआ है, इसलिए मुझे उनके इस जवाब पर हैरानी हुई. और जिस पत्रकार ने वह इंटरव्यू लिया था, वह एक सीनियर और संजीदा फिल्म जर्नलिस्ट थी, इसलिए यह मनगढ़ंत होगा, ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती थी. पर मुझे उस समय यही ठीक लगा कि इस बात को तूल न दिया जाए और इंटरव्यू को सुचारू रूप से चलने दिया जाए. और मैंने ज्यादा बहस करने की बजाए, बात को वहीं खत्म कर दिया. पत्रकारिता के दौरान यह पहला मौका था, जब मैंने सबूत होते हुए भी बहस की बजाए समर्पण का रास्ता चुना था.

शायद इसी का नतीजा था कि यह इंटरव्यू बहुत अच्छा रहा और यह मेरे किए गए सबसे गंभीर साक्षात्कारों में से एक है.

आज सिनेमा के इस दिग्गज की पुण्यतिथि है, इस अवसर पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि के साथ यह साक्षात्कार यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ. अगर आपको गंभीर किस्म के सिनेमा में रुचि रही है तो यह आपको पसंद आएगा.

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Tuesday, August 18, 2020

बातें-मुलाकातें: 11 ( नंदना सेन)

जो सिर्फ परिचित होते हैं, उनके बारे में लिखना आसान होता है, क्योंकि उनसे जुड़ी डिटेल्स बहुत ज्यादा नहीं होतीं. लेकिन, जो आपके दिल के करीब होते हैं उनके बारे में संस्मरण लिखना बड़ी टेढ़ी खीर होता है, क्योंकि आपके पास साझा करने के लिए इतने सारे पल होते हैं कि आप तय नहीं कर पाते कि क्या लिखें क्या न लिखें. ऊपर से सामने वाले के रूठ जाने का डर कि पता नहीं कौन सी बात का खुलासा उसे नाराज कर दे.

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, चश्मे और क्लोज़अप

फिर भी मैं कोशिश करता हूँ कि कम से कम शब्दों में ज्यादा से ज्यादा अनुभव बाँट सकूँ. नंदना सेन का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है. वह इंटरनेशनल लेवल की अभिनेत्री हैं, जिन्होंने गौतम घोष की गुड़िया, बोक्षू द मिथ, फाॅरेस्ट, परफेक्ट मिसमैच, आॅटोग्राफ, सिड्यूसिंग मारिया, रंगरसिया  जैसी कई ऐसी फिल्मों में काम किया है, जो देश-विदेश के अनेक फिल्म फेस्टिवलों में सराही गई हैं. हिंदी फिल्मों के दर्शक उन्हें ब्लैक, मैरीगोल्ड, माइ वाइफ्स मर्डरर, स्ट्रेंजर्स, टैंगो चार्ली, प्रिंस जैसी फिल्मों के माध्यम से याद कर सकते हैं, जिनमें नंदना ने नायिका/ सहनायिका की भूमिकाएं निभाई हैं. 

नंदना को मैंने पहली बार सीरी फोर्ट सभागार में देखा थी, जहाँ इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल चल रहा था और वह अपनी फिल्म बोक्षू द मिथ की स्क्रीनिंग के सिलसिले में दिल्ली आई थीं.  फिल्म बहुत अच्छी थी और नंदना का काम भी. उस दिन फेस्टिवल का आखिरी दिन था, नंदना की एक प्रेस काॅन्फ्रेंस थी. आॅरेंज येलो साड़ी में वह गजब ढा रही थी. मैं उस दिन उनसे बात नहीं कर पाया. फेस्टिवल का आॅफिशियल होस्ट था, होटल अशोका. अगले दिन मैंने वहाँ फोन किया और नंदना से बात कराने के लिए कहा. जब फोन नंदना से कनेक्ट हुआ तो मैंने अपना परिचय देते हुए इंटरव्यू के लिए समय देने के लिए कहा. नंदना ने कहा कि आप अपने कुछ प्रीवियस पब्लिश्ड इंटरव्यू लेते आइएगा. मैं उन दिनों दिल्ली में रहना छोड़ चुका था, बस काम के हिसाब से आता-जाता रहता था. इसलिए उनकी यह फरमाइश पूरा कर पाना संभव नहीं था. मैंने अपनी विवशता जताई तो उन्होंने कहा कि फिर तो मुश्किल होगा. पर मैंने किसी तरह उन्हें राजी कर लिया और उन्होंने बताया कि वह होटल से चेकआउट कर रही हैं. उन्होंने मुझे अगले दिन सुबह-सुबह मयूर विहार स्थित अपनी बहन के घर बुला लिया. 

सर्दियों के दिन थे, यह नंदना कल की प्रेस काॅन्फ्रेंस वाली ग्लैमरस नंदना से एक दम अलग थी. पर उनका नैसर्गिक सौंदर्य भी कुछ कम प्रभावशाली नहीं था. वह घर की कैज्युअल ड्रेस पहने थी और सर्दी से बचने के लिए एक शाॅल लपेट रखा था. मैंने डिक्टाफोन आॅन कर दिया और फिर सवाल-जवाब का जो सिलसिला शुरू हुआ वह तकरीबन एक घंटा चला. बीच-बीच में उन्हें हिंदी बोलने में दिक्कत महसूस होती तो वे अंग्रेजी में जवाब देने लगतीं, जिससे हमारी बातचीत पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा था. इंटरव्यू के दौरान पूरे समय उनका पैट डाॅगी भौंक-भौंक कर अपनी मौजूदगी का  एहसास कराता रहा गोया कह रहा हो कि भाई मेरा भी इंटरव्यू रिकाॅर्ड करते रहो. इंटरव्यू के बाद वह किचन में गईं और ब्रेकफास्ट के लिए स्प्राउट्स ले आईं. मैंने उनसे कहा कि मैं अब तक पचास से ज्यादा इंटरव्यू कर चुका हूँ, लेकिन यह पहली बार था, जब किसी ने प्रूफ लाने को कहा. नंदना ने हैरानी से कहा कि आप इतने इंटरव्यू कर चुके हैं. कितनी उम्र है आपकी? मैंने बताया तो वह बोलीं कि देखकर नहीं लगता. ऐसा लगता है कि जैसे काॅलेज से पासआउट करके आए हैं.

मैंने उन्हें टीज करते हुए पूछा  कि 'इज दिस ए कम्प्लीमेंट आॅर कम्प्लेंट?'

'दिस इज ए फैक्ट !' पहले मेरे सवाल से वह चौंकी, लेकिन जिस बिजली की तेजी से उन्होंने एक सेकेंड से भी कम में इतना शानदार जवाब भी सोच लिया, उसने मुझे उनकी हाजिर जवाबी का कायल कर दिया.

बातचीत के दौरान मैंने उन्हें अपनी लिखी, उनकी फिल्म सेड्यूसिंग मारिया की समीक्षा दिखाई. वह बोलीं कि क्या मैं इसे अपने पास रख सकती हूँ. मैंने कहा, बिल्कुल...यह मैं आप ही के लिए लाया था. उनके लिए मैं एक और चीज लेकर गया था, वह था जेड स्टोन का बना एक छोटा सा जालीदार हाथी, जिसके भीतर एक और छोटा हाथी बंद था.

यह  लीजिए, एक छोटा सा गिफ्ट. मैंने उन्हें वह हाथी देते हुए कहा. तो नंदना ने बताया कि उन्हें ऐसे आइटम बहुत अच्छे लगते हैं, जिनमें इस तरह एक के भीतर दूसरा आइटम होता है और वह इसे हमेशा अपने पास रखेंगी. 

मैंने उनसे पूछा कि उनका बर्थडे कब आता है. उन्होंने कहा कि 19 अगस्त को. मैंने कहा कि और एक दिन बाद होता तो राजीव गाँधी जी का और आपका जन्मदिन एक ही होता. वह बोलीं कि 19 अगस्त को बिल क्लिंटन का भी जन्मदिन है.

मैंने कहा कि ठीक है, क्लिंटन को तो मैं विश कर नहीं सकता, पर अगर आप अपना फोन नंबर देंगी तो आपको जरूर विश किया करूंगा. उन्होंने मेरे से डायरी ली और अपना नंबर, अमेरिका का पता और ई-मेल आईडी सब लिख दिया. कुछ देर और इधर-उधर की बातें हुईं और मैंने उनसे विदा ली. 

यह हमारी पहली और अब तक की आखिरी मुलाकात थी. लेकिन, इसके बाद से हमारी ऐसी दोस्ती शुरू हुई, जो आज भी बरकरार है. कई बार गिले-शिकवे और मान-मनव्वल के वाकये भी हुए हैं, सुख-दुःख की बातें एक-दूसरे के साथ शेयर की हैं. सच तो यह है कि यह नंदना की विनम्रता और अपनापन ही है, जो हमारी दोस्ती बदस्तूर जारी है.

बीतें सालों से उनसे नियमित रूप से मैसेज और ई-मेल के जरिए बात होती है. वह राइटिंग, फेमिली, सोशल काॅजेज में बिजी होने के बावजूद वक्त निकालकर हमेशा जवाब देती हैं. इतने सालों में हमारी मित्रता के अनुभव इतने ज्यादा हैं कि यहाँ साझा कर पाना ना तो मुमकिन है और न ही मुनासिब. लेकिन एक बात जरूर बताना चाहूँगा कि नंदना को मेरी कविताएं बहुत अच्छी लगती हैं.

एक बार उनकी तारीफ से उत्साहित होकर मैंने उनसे कहा कि अगर आपको मेरी कविताएं इतनी ही अच्छी लगती है तो मैं आपके हर बर्थडे पर एक कविता गिफ्ट कर दिया करूंगा तो उनका जवाब था कि यह अच्छी बात है, लेकिन इसके लिए बर्थडे तक इंतजार कराना जरूरी  है क्या? उनके इस जवाब ने मुझे लाजवाब कर दिया...

आज नंदना का बर्थडे है. उन्हें दिली मुबारकबाद और एक स्वस्थ, सक्रिय, खुशियों और उपलब्धियों भरे जीवन के लिए हार्दिक  शुभकामनाएं.