Wednesday, December 23, 2020

बातें—मुलाकातें: 36 (कनुप्रिया विमल—सहगल)

कुल लोग कम समय के लिए आपके जीवन में आते हैं, लेकिन ऐसी छाप छोड़कर जाते हैं कि हमेशा वे आपकी यादों में बने रहते हैं. कनुप्रिया ऐसी ही एक लड़की थी... बेहद सरल स्वभाव, साफ दिल और बेबाकी भरी बातें करने वाली लड़की. सुप्रसिद्ध साहित्यकार गगाप्रसाद विमल जी की बेटी कनु से मेरी मुलाकात तब हुई थी, जब उसने अभिनय में अपना कैरियर शुरू किया था और मैंने पत्रकारिता में. मैंने टाइम्स आॅफ इंडिया में उसके बारे में एक छोटा सा आइटम पढ़ा. लगा कि इसके बारे में तो और भी काफी कुछ लिखा जा सकता है. अपने स्रोतों से उसका नंबर तलाशा और कॉल कर दिया.


जैसी कि अपेक्षा थी, उसने तुरंत इंटरव्यू देने के लिए बुला लिया. मैं जब उसके घर पहुंचा तो वहाँ बेहद पारिवारिक किस्म का माहौल था. उसके मम्मी—पापा (डॉ. विमल) घर भी ही थे. उन्होंने बिना किसी बनावट के सहज—स्वाभाविक ढंग से मेरा स्वागत किया और फिर कनु और मेरी एक लंबी बातचीत हुई. बहुत सारी निजी और पेशागत चीजों के बारे में.


इंटरव्यू छपा तो मैंने उसे बताया...वह बोली कि पेपर तो मैंने मंगा लिया था, लेकिन आप जरूर आइएगा. गया तो इस बार उसने चाकलेट से स्वागत किया. फिर तो उसके घर आना—जाना शुरू हो गया और हम अच्छे दोस्त बन गए. सब लोग मुझे घर का ही एक सदस्य मानने लग गए थे. वह जब भी परेशान होती, मुझे फोन लगा लेती और अपने दिन भर का हाल सुनाती. कई बार तो वह देर रात को फोन करके मुझे जगा देती और कहती कि मैंने उससे कहा था कि जब भी जरूरत हो, फोन कर लेना. उसका कहना होता था कि मुझे गुस्सा नहीं करना चाहिए. अगर मैंने गुस्सा किया तो वह मुझे डंडे से मारेगी. उसकी ऐसी बचपने वाली बातें सुनकर मुझे गुस्सा आ भी रहा होता था तो उसकी जगह हँसी आ जाती थी.

चूंकि वह ग्लैमर की दुनिया में नई थी, इसलिए इस पेशे की छद्मता और चालाकी उसके व्यवहार में प्रवेश नहीं कर पाई थी. वह किसी भी कलाकार के बारे में बेहद मुखर होकर कुछ भी बोल देती थी. मैं उसकी ज्यादातर बातों को गॉसिप समझकर गंभीरता से नहीं लेता था. जैसे कि उसने एक बार बताया था कि शाहरूख् खान ने किस तरह विवेक वासवानी को 'उपकृत' कर फिल्म इंडस्ट्री में अच्छे बैनरों में जगह बनाई तो मुझे बिल्कुल यकीन नहीं आया था, क्योंकि मैं विवेक वासवानी को इतना सक्षम नहीं मानता था. लेकिन, एक बात माननी पड़ेगी. फिल्म पत्रकार होते हुए भी सितारों को लेकर जो समझ मुझमें नहीं थी, वह उसमें काफी गहरी थी.

उन दिनों चंद्रचूड़ सिंह और अरशद वारसी की, एबीसीएल की द्वारा निर्मित, तेरे मेरे सपने रिलीज हुई थी. कनुप्रिया ने मुझसे पूछा कि दोनों में आपको कौन लगता है कि आगे जाएगा? मैंने मन ही मन दोनों की तुलना करके बताया कि चंद्रचूड़ सिंह स्मार्ट हैं, सुंदर है तो उनका भविष्य ज्यदा अच्छा होगा. लेकिन उसका कहना था कि चंद्रचूड़ में स्टार मैटेरियल नहीं है. अरशद वारसी लंबी रेस का घोड़ा है...और देखिए, उसका आकलन ही सही साबित हुआ.

करीब एक साल बाद मुझे खामोश नाम के एक टीवी सीरियल की स्क्रिप्ट लिखने का मौका मिला, जो कबीर कौशिक (सहर, चमकू, मैक्सिमम, हम तुम और घोस्ट के डायरेक्टर) डीडी नेशनल के लिए बना रहे थे. मुझे लगा कि कनुप्रिया को इस सीरियल से जोड़ा जा सकता है. मैंने उसे बताया और उसके हिसाब से एक कैरेक्टर स्क्रिप्ट में जोड़ दिया. मेरे एक दोस्त, राहुल देव, पहले से ही उसमें टाइटिल रोल प्ले कर रहे थे. कुछ एपिसोड की स्क्रिप्ट लिखने के बाद पता चला कि डीडी की लालफीताशाही की वजह से सीरियल की योजना परवान नहीं चढ़ पाई है. इस तरह उसके लिए कुछ करने का मेरा इरादा धरा का धरा रह गया. इसके बाद कुछ दिक्कतों की वजह से दिल्ली छोड़नी पड़ी तो बहुत सारे लोगों का साथ भी छूट गया.

करीब एक साल बाद मुझे खामोश नाम के एक टीवी सीरियल की स्क्रिप्ट लिखने का मौका मिला, जो कबीर कौशिक (सहर, चमकू, मैक्सिमम, हम तुम और घोस्ट के डायरेक्टर) डीडी नेशनल के लिए बना रहे थे. मुझे लगा कि कनुप्रिय को इस सीरियल से जोड़ा जा सकता है. मैंने उसे बताया और उसके हिसाब से एक कैरेक्टर स्क्रिप्ट में जोड़ दिया. मेरे एक दोस्त, राहुल देव, पहले से ही उसमें टाइटिल रोल प्ले कर रहे थे. कुछ एपिसोड की स्क्रिप्ट लिखने के बाद पता चला कि डीडी की लालफीताशाही की वजह से सीरियल की योजना परवान नहीं चढ़ पाई है. इस तरह उसके लिए कुछ करने का मेरा इरादा धरा का धरा रह गया. इसके बाद कुछ दिक्कतों की वजह से दिल्ली छोड़नी पड़ी तो बहुत सारे लोगों का साथ भी छूट गया.

कुछ साल बाद डॉ. विमल से एक फिल्म फेस्टिवल के मौके पर मुलाकात हुई तो उन्होंने बताया कि कनु की शादी हो गई है और उसको एक बेटा है. मैंने उन्हें बधाई दी और सोचा कि उनसे कनु का नंबर लेकर उसे भी विश कर दूँ. फिर लगा कि सब कुछ जैसा है, वैसे ही चलता रहे; यही ज्यादा बेहतर होगा.

करीब दो साल पहले डीडी पर फोर्थ एम्पायर प्रोग्राम देखते हुए एंकर की सूरत कनुप्रिया से मिलती—जुलती लगी. बाद में क्रेडिट्स देखकर पता चला कि वह कनुप्रिया ही है. बस सरनेम विमल की जगह सहगल हो चुका था. बहुत अच्छा लगा...पिछली बहुत सारी बातों की यादें ताजा हो आईं. सोचा कि अबकी बार दिल्ली जाना हुआ तो उन सबसे मिलूंगा. लेकिन यह न हो सका और अब कभी हो भी न पाएगा, क्योंकि पिछले वर्ष 23 दिसंबर को श्रीलंका में हुई एक सड़क दुर्घटना में नियति के क्रूर हाथों ने सबको हमसे छीन लिया. डॉ. विमल को, कनुप्रिया को और उसके मासूम बेटे को... अमिट स्मृतियों के साथ सभी को भावभीनी श्रद्धांजलि!

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Thursday, December 17, 2020

बातें—मुलाकातें: 35 (रघु राय)

रघुनाथ राय चौधरी को आप भले ही उनके मूल नाम से न पहचान पाएं, लेकिन यकीनन आपने अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त, लीजेंड भारतीय छायाकार रघु राय का नाम जरूर सुना होगा. फोटोग्राफी की दुनिया में उनका वही रुतबा है, जो पत्रकारिता में मार्क टल्ली का या गायन में पं. जसराज का.


पद्मश्री रघु राय ने संडे, इंडिया टुडे और स्टेट्समैन जैसे लीडिंग पब्लिकेशन में रहते हुए फोटो जर्नलिज्म को नई ऊंचाइयां दीं तो एक क्लासिकल फोटोग्राफर के तौर पर देश की सामाजिक, पुरातात्विक और प्राकृतिक संपदा को देहली, द सिख्स, कलकत्ता, खजुराहो, ताजमहल, तिबेत इन एक्साइल, इंडिया और मदर टेरेसा जैसी डेढ़ दर्जन से अधिक पुस्तकों में समेटा. विभिन्न विषयों पर उनके फोटो एसे टाइम,लाइफ, जिओ, द न्यूयॉर्क टाइम्स, संडे टाइम्स, न्यूजवीक, द इंडीपेंडेंट और न्यूयॉर्कर जैसी इंटरनेशनल पत्र—पत्रिकाओं में प्रमुखता से स्थान पाते रहे हैं.
रघु जी से मेरी मुलाकात नवभारत टाइम्स के लिए मेरा सपना कॉलम के सिलसिले में हुई थी. यह इंटरव्यू दिल्ली के खान मार्केट के पास भारती नगर स्थित उनके निवास स्थान पर हुआ.
पूरा संवाद बहुत गंभीरता और सार्थकता से भरा था. शुरू में मेरी उम्र और मेरा चेहरा देखकर उन्हें लगा कि शायद मुझे उनकी बातें समझ में न आएं, लेकिन दो—तीन सवाल—जवाब के बाद उन्हें भी मुझसे बातें करने में रस आने लगा और फिर तो उन्होंने न सिर्फ अपने सपनों और जज्बातों के बारे में खुलकर बातें की, बल्कि देश और समाज से जुड़े विषयों पर भी बेबाकी से अपने विचार प्रकट किए. कई बार जब भी उन्हें लगता कि मैं उनकी बात से उकता रहा हूँ तो वे तुरंत मेरे हाथ को छूकर मेरा ध्यान अपनी ओर खींचने की कोशिश करते थे. हालांकि ऐसा नहीं था... उनकी सब बातों से सहमत न होने के बावजूद मैं पूरी गंभीरता और धैर्य से उन्हें सुन रहा था.
बातें बहुत ज्यादा थीं, इसलिए सारी चीजें कॉलम में नहीं छप पाईं. पर इस बातचीत का फायदा ये हुआ कि जब मुझे तत्कालीन वाजपेयी सरकार के कामकाज पर एक सीरीज चलाने का मौका मिला तो मैंने एक बार फिर उन्हें फोन कर उनसे बातचीत की और इस बार फासीवाद, राष्ट्रवाद, शिवसेना, भाजपा, कॉन्ग्रेस, सामाजिक असंवेदनशीलता आदि के बारे में उनके विचारों को प्रकाशन रूप में सामने आने का मौका मिला.
दिलचस्प बात यह है कि दोनों इंटरव्यू में उन्होंने एक बात बड़ा जोर देकर कही थी और दोनों ही बार यह संपादन में बाहर हो गई. उनका कहना था कि हमारे देश में गाय की अहमियत इंसान से ज्यादा है, अगर किसी गाय के साथ दुर्घटना हो जाए तो लोग मरने—मारने पर उतारू हो जाते हैं. लेकिन एक इंसान घंटों तक सड़क पर पड़ा रहने के बाद दम तोड़ दे तो किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता.
आज मैं जब इन इंटरव्यूज को फिर से पढ़ रहा हूँ तो साफ महसूस होता है कि इतने सालों के बावजूद कहीं कुछ नहीं बदला है, बल्कि जो चिंताएं उन्होंने तब प्रकट की थीं, वे आज और भी विकट रूप में हमारे सामने हैं.
बहरहाल, आज उनका जन्मदिन है. इस मौके पर उनके उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए असंख्य शुभकामनाएं.

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Tuesday, December 8, 2020

बातें—मुलाकातें: 34 (शत्रुघ्न सिन्हा)

शत्रुघ्न सिन्हा जी से मेरा संबंध काफी लंबा रहा है. बहुत निकटता तो नहीं, लेकिन अनौपचारिकता बहुत थी इसमें. उनके साथ यादों का पिटारा इतना बड़ा है कि उनका विस्तार से परिचय देने की कोई गुंजाइश नहीं है... वैसे भी उनका परिचय देने की जरूरत ही क्या है? शायद ही कुछ ऐसा हो, जो उनके बारे में लोगों को न पता हो. फिर भी उनके साथ मुझे जो महूसस हुआ, वह यहाँ साझा जरूर करना चाहूंगा.



शत्रुघ्न सिन्हा, एक ऐसी स्टार शख्सियत , जिसे फिल्म इंडस्ट्री का सबसे फायरी एक्टर और राजनीति का सबसे मुंहफट पाॅलिटिशियन माना जाता रहा है. लेकिन, रीयल लाइफ में वह एक ऐसे इंसान है, जिसमें विनम्रता, धैर्य और मिलनसारिता कूट-कूट कर भरी है. वह नाम के शत्रु हैं, लेकिन असल में बहुत अच्छे मित्र हैं. सिन्हा की...बीइंग ए जर्नलिस्ट, मैं अब तक जिन 60-70 सेलिब्रिटीज से मिला हूँ, उनमें किसी के व्यवहार से इतना प्रभावित नहीं हुआ, जितना कि शत्रु साहब के. इंटरव्यू के सिलसिले में मेरी दो बार उनसे लंबी मुलाकात हुई है और करीब एक दर्जन बार फोन पर बातचीत हुई है...और हर बार उनका रिस्पाॅन्स बहुत गर्मजोशी भरा रहा है. न कोई ईगो, न कोई खीझ... मेरे हर कड़वे से कड़वे सवाल का जवाब उन्होंने बहुत सब्र के साथ दिया है.
हमारी पहली मुलाकात उन दिनों हुई, जब वह भाजपा से राज्यसभा सांसद थे और दिल्ली के सफदरजंग एन्क्लेव इलाके में रहते थे. मैंने इंटरव्यू के लिए उन्हें कॉल किया तो उनके तत्कालीन सचिव प्रदीप माथुर ने फोन उठाया. बिना किसी विलंब के उन्होंने मेरी सिन्हा साहब से बात करा दी.स्क्रीन पर सुनी आवाज को पहली बार रीयल में सुनना वाकई एक शानदार अनुभव था. उन्होंने मुझे अगले दिन बारह बजे आने का समय दे दिया.
अगले दिन जब मैं उनके घर पहुंचा तो माथुर जी से पता चला कि वे तैयार हो रहे थे, क्योंकि रात भर वहां लाइट गायब थी और साहब सुबह तक सो नहीं पाए थे. मैं इंतजार करने लगा और माथुर जी के साथ ही गुफ्तगू करने लगा. करीब दो घंटे बाद शत्रु जी का आगमन हुआ और उन्होंने आते ही देरी के लिए क्षमा मांगी. मैंने हँसते हुए कहा कि कोई बात नहीं आप तो वैसे ही लेटलतीफी के लिए मशहूर रहे हैं...
‘मशहूर नहीं, बदनाम कहिए...’ एक जोरदार अट्टहास के साथ उनका जवाब मिला, और फिर उन्होंने कहा कि आप दो घंटे से इंतजार कर रहे हैं और आपने खाना तो खाया नहीं होगा. इसलिए जब तक आप खाना नहीं खाएंगे मैं आपको इंटरव्यू नहीं दूंगा. मैंने तब तक एक उसूल बनाया हुआ था कि जिसके यहां इंटरव्यू के लिए जाता था, उसकी चाय तक नहीं पीता था ताकि सवालों की तल्खी कहीं मंद न हो जाए. यह पहली बार था, जब उनके अपनत्व भरे आग्रह के आगे मैं इंकार नहीं कर पाया.
खाने के बाद लंबी बातचीत हुई, जिसमें काफी कुछ आप यहाँ दिए गए इंटरव्यूज में पढ़ सकते हैं. बाकी जो नहीं छपा, उसमें से सब तो नहीं, फिर भी जितना मुमकिन और मुनासिब है, उसे पेश करने की कोशिश करूंगा.
उन्होंने अपने लिए फीकी ब्लैक कॉफी मंगाई तो मैंने पूछा कि आप बिना चीनी की कॉफी पीते हैं, फिर भी आपके स्वभाव में इतनी मिठास कैसे है तो उन्होंने हँसते हुए बताया कि ज्यादा मीठा कड़वाहट पैदा करता है, इसलिए मैं ब्लैक कॉफी पीता हूँ ताकि मिठास बैलेंस रहे.
मैं उनके बारे में काफी होमवर्क करके गया था, इसलिए सवाल—जवाब के बीच कई ऐसे सवाल थे, जो काफी आक्रामक और विचलित करने वाले थे. जैसे कि मैंने उनसे पूछा कि आप एक अभिनेता के तौर पर खुद को कितने मार्क देंगे, तो उनका कहना था कि ये तो वही बात हुई कि वकील भी मैं, जज भी मैं और जल्लाद भी मैं... ये तो आप लोग तय करेंगे. इस पर मैंने उनसे कहा कि बतौर एक अभिनेता, हर अभिनेता जिंदगी में कोई न कोई लैंडमार्क रोल जरूर करता है, जैसे कि अमरीश पुरी ने मोगंबो या अमजद ने गब्बर का किया. लेकिन, आपके खाते में कोई ऐसा यादगार रोल दर्ज नहीं है. इस पर उन्होंने चिढ़कर जवाब दिया कि यह एक्टर की नहीं, बल्कि किरदार की कामयाबी है. अगर मोगंबो का रोल परेश रावल ने या फिर मुकरी ने किया होता तो यह उतना ही हिट होता.
जब भी उनसे मिला या बात की, मैंने हर बार यही महसूस किया कि शत्रु जी हर सवाल का जवाब बहुत शांति के साथ देते थे. अगर कोई सवाल उन्हें नागवारा भी गुजरता तो भड़कने के बजाय उनका यहीं कहना होता था कि आप अच्छे आदमी हैं, जो यह पूछ रहे हैं.
बीच में उन्होंने यह कहा कि उन्होंने आज तक कोई फिल्म अधूरी नहीं छोड़ी. मैंने कहा कि मैंने भी सिर्फ एक ही फिल्म के बारे में सुना है. उन्होंने पूछा कि कौन सी तो मैंने यार मेरी जिंदगी की याद दिलाई. वह बोले कि वह मेरी वजह से बंद नहीं हुई तो मैंने पूछा कि क्या अमित जी की वजह से तो उनका जवाब था कि मैं ऐसा नहीं कहूंगा. फिर उन्होंने फिल्म के प्रोड्यूसर की मौकापरस्ती की कहानी बताई.
बातचीत के दौरान उन्होंने अमिताभ से अपनी मित्रता का एक रोचक किस्सा भी साझा किया, जिसमें वे और पूनम जी कुली की दुर्घटना के बाद अस्पताल में भरती अमित जी को देखने गए थे. उस समय तेजी बच्चन जी ने पूनम सिन्हा को आशीर्वाद देते हुए कहा कि तुमने इस पति को पाने के लिए बहुत तपस्या की है. इस पर अमिताभ खांसते हुए बोले कि ऐसे पति के लिए तपस्या करने की क्या जरूरत थी.
शत्रु जी मुझे मेरी धीमी आवाज के कारण अपने पास बुला लेते थे और कहते थे कि आप दिलीप कुमार की तरह बात करते हैं, इसलिए मेरे पास आ जाइए ताकि मैं आपको ठीक से सुन सकूं. जैसे ही मेरी आवाज धीमी होती, वह तुरंत टोकते—नहीं देवदास बिल्कुल नहीं. एक दिन फोन पर मैंने उनसे कहा कि मैं देवदास बोल रहा हूँ तो उन्हें हँसी आ गई और कहा कि बोलिए देवदास जी. फिर उन्होंने समझाया कि मैं उनकी बात का बुरा न मानूं. वह यह सिर्फ इसलिए कहते हैं ताकि मेरी धीमी आवाज की वजह से सामने वाले को यह न लगे कि मुझमें आत्मविश्वास की कमी है. वह कहते थे कि आपमें बहुत विनम्रता व धैर्य है, मैं आपका बहुत उज्जवल भविष्य देख रहा हूँ.
वह अक्सर मुझे कहते थे कि मुझे अगर फिल्म पर इंटरव्यू करना है तो मुंबई आऊं. यह क्या कि शत्रुघ्न सिन्हा दिल्ली में आसानी से मिल गया तो कर लिया फिल्मी इंटरव्यू. एक बार मैंने कहा कि आसानी से नहीं मिले आप, पूरे छह महीने ट्राई किया है. इस पर उन्होंने कहा कि अरे नहीं, आपको तो मैं हमेशा बुलाता हूँ. वाकई इसमें कोई शक नहीं कि मुझे जब भी उनसे बात करने की जरूरत हुई, वह हमेशा मेरे लिए उपलब्ध रहे.
लेकिन कई फिल्मों का सीक्वल उतना अच्छा नहीं होता, जितना कि मूल फिल्म होती है. मेरे नागपुर आने के बाद, दिल्ली से जुड़े बहुत से लोगों से सम्पर्क टूट गया, उनमें शत्रु साहब भी थे.
हालांकि वह साल में एक—दो बार नागपुर आते रहते थे, लेकिन मिलने की न तो कोई वजह होती थी और न बहाना, इसलिए मैं हमेशा उनसे मिलने में एक संकोच सा महूसस करता रहा.
पिछले साल वे एक राजनीतिक कार्यक्रम के लिए नागपुर आए तो मेरे हमनाम मित्र संदीप अग्रवाल जी बोले कि चलो, आपको आपके पुराने मित्र से मिलवाते हैं. मैं जानता था कि इतने सालों बाद मिलने पर पहले जैसी गर्मजोशी य बेतकल्लुफी की उम्मीद नहीं करनी चाहिए. फिर भी लगा कि एक बार मिल तो लेना चाहिए, देखते हैं कि शत्रु साहब मुझे पहचानते हैं या नहीं. और मैं उनके साथ होटल रेडिसन जा पहुँचा.
वहाँ सालों बाद अपने फेवरेट इंसान और एक्टर को देखकर एक अजीब सी अनुभूति हुई. उनके व्यक्तित्व का तेज और व्यवहार की गर्मजोशी की जगह एक तरह की अरुचि और चिड़चिड़ेपन ने ले ली थी. वक्त वाकई बहुत बेरहम होता था. एक समय जिस शेर की दहाड़ से पूरा जंगल गूंज उठता था, आज वह बेहद थका—थका नजर आ रहा था. हाथ मिलाने के बाद, मैंने उनके इंटरव्यूज की फोटो कॉपीज उनकी ओर बढ़ाते हुए कहा कि ये लीजिए आपके लिए.
'क्या है ये?' उन्होंने लेने के लिए हाथ आगे बढ़ाने की बजाए, भौंहे उठाते हए पूछा.
'कुछ पुरानी यादें...'
'दिखाइए...'
मैंने रोल किए हुए पेपर खोले तो उन्हें समझ में आया. उन्होंने वे कागज लेकर मेरा शुक्रिया अदा किया और उन्हें अपने सहायक को रखने के लिए देते हुए मुझसे पूछा कि आप क्या प्रोग्राम की कवरेज के लिए नागुपर आए हैं. मैंने उन्हें बताया कि मैं कई साल से यहीं रहता हूँ.
इसके बाद हम कुछ देर वहाँ बैठने के बाद उनके साथ—साथ नीचे आ गए और वहीं से विदा ली. इस दौरान जो कुछ भी महसूस हुआ, उसे यहाँ दोहराने का कोई मतलब नहीं है, लेकिन इतना जरूर है कि इससे काफी मुगालते कम हुए. पर यह भी सच है कि इसका मुझे कोई मलाल नहीं है. समय के साथ—साथ बहुत सारी चीजें बदल जाती हैं. जितना अपनामन, मान—सम्मान और सहयोग उनकी ओर से मुझे मिला, वह अभूतपूर्व है. इसके लिए मैं उनका शुक्रगुजार हूँ.
आज उनके 75वें जन्मदिन के अवसर पर अनगिनत बधाईयां और उनके उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घ जीवन और सभी स्वप्नों के पूरा होने के लिए हार्दिक शुभकामनाएं.

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Monday, December 7, 2020

बातें—मुलाकातें:33 (कुमार शाहनी)

अगर आपने तरंग, कस्बा, खयालगाथा, मायादर्पण जैसी फिल्मों का नाम नहीं सुना है तो मुमकिन है कि आपने कुमार शाहनी का नाम भी न सुना हो. ये वे फिल्में हैं, जिनमें से पहली को नेशनल अवार्ड, दूसरी व तीसरी को फिल्मफेअर और चौथी को ये दोनो अवार्ड मिलें हैं.



1865 से 2005 तक के चार दशकीय कैरियर में उन्होंने कुल जमा पांच फीचर फिल्में, दस शॉर्ट्स और एक बायोग्राफिकल डॉक्यूमेंट्री भावांतरण बनाई है, जो ओडिशी नृत्य सम्राट केलुचरण महापात्रा पर आधारित थी और उसे बेस्ट बायोग्राफिकल फिल्म का नेशनल अवार्ड भी मिला. शाहनी साहब ने बेशक कम काम किया है, लेकिन जितना भी किया है वह असाधारण है. यही वजह है कि जब भी पैरेलल सिनेमा मूवमेंट की बात चलती है, उनका नाम इसके सर्वाधिक सशक्त हस्ताक्षरों में शुमार किया जाता है.
उनसे मेरी मुलाकात इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के मौके पर ही हुई थी. जगह थी दिल्ली के सीरीफोर्ट आॅडिटोरियम का प्रांगण. ​फेस्टिवल का आखिरी दिन था. रात के आठ बज चुके थे और मैं वापस लौट रहा था. तभी मैंने उन्हें एक कोने में मद्धिम रोशनी में चाय की चुस्कियां लेते हुए देखा. मैंने वहाँ पहुंचकर उनका अभिवादन किया और अपना परिचय दिया. वह बड़ी विनम्रता के साथ मिले. उन्होंने मुझसे पूछा कि मैंने फेस्टिवल में कौन—कौन सी मूवीज देखी हैं, कौन सी ज्यादा अच्छी लगीं, वगैरह—वगैरह. बातचीत के दौरान मैंने उनसे पूछा कि आजकल वे क्या कर रहे हैं तो उन्होंने बताया कि वे रवीन्द्र नाथ टैगोर के उपन्यास पर चार अध्याय नाम की एक फिल्म बना रहे हैं.
साहित्य और समांतर सिनेमा में मेरी बहुत ज्यादा रुचि थी, मुझे यह जानकर बहुत अच्छा लगा कि वे दोनों को एक साथ ​ला रहे हैं. मैंने उनसे कहा कि मैं उनका इंटरव्यू करना चाहता हूँ. उन्होंने कहा कि वे इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में ठहरे हुए हैं और कल दिल्ली में ही हैं. अगर मैं चाहूं तो कल आकर उनका इंटरव्यू कर सकता हूँ.
रात को मैंने नवभारत टाइम्स में बात की तो उन्होंने कहा कि मैनेजमेंट आजकल ग्लैमरस और पॉपुलर लोगों के इंटरव्यू की प्रीफर करता है. इसलिए कुमार शानी का इंटरव्यू अवॉइड ही करूं. क्योंकि ज्यादा संभावना यही है कि वह न छपे. मुझे भी लगा कि क्यों अपना और शाहनी साहब का वक्त बर्बाद करूं, इसलिए इंटरव्यू का ख्याल दिल से निकाल दिया.
इस तरह वह संक्षिप्त मुलाकात हमारी आखिरी मुलाकात साबित हुई.
शाहनी साहब आजकल कहाँ हैं, कैसे हैं, क्या कर रहे हैं, इस बारे में कोई जानकारी मुझे नहीं मिल पाई है. आज उनका 80 वां जन्म दिन है. इस मौके पर उन्हें हार्दिक बधाई और दीर्घ स्वस्थ जीवन के लिए शुभकामनाएं.

Sunday, December 6, 2020

बातें—मुलाकातें: 32(शेखर कपूर)

शेखर कपूर एक ऐसे प्रतिभाशाली निर्देशक हैं, जिन्हें हम मासूम जैसी संवेदनशील फिल्म के लिए भी याद कर सकते हैं और मि. इंडिया जैसी विशुद्ध मनोरंजक फिल्म के लिए भी. बैंडिट क्वीन और एलिजाबेथ व एलिजाबेथ : द गोल्डन एज जैसी अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त फिल्मों के लिए भी सराह सकते हैं और टाइम मशीन व पानी जैसी महत्वाकांक्षी फिल्मों के लिए भी, जिन्हें वे दशकों से बनाना चाहते हैं, लेकिन नहीं बना पा रहे हैं. अगर तारीफ न करनी हो तो जोशीले जैसी बेहूदा फिल्म के लिए कोस भी सकते हैं. लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि वे एक बेहद साहसी व प्रतिभाशाली निर्देशक और संवेदनशील अभिनेता हैं. यह एक अलग बात है कि पिछले कई सालों से वे काम से ज्यादा विवादों और अपने बेबाक ट्वीट्स की वजह से खबरों में रहते हैं. उन्होंने जितनी मूवीज डायरेक्ट की हैं, उससे ज्यादा कुछ इस हिस्सा डायरेक्ट करके बीच में छोड़ी हैं, क्योंकि एक डायरेक्टर को जितनी क्रिएटिव लिबर्टी का अधिकार है, वह उससे कोई कम्प्रोमाइज नहीं करना चाहते. 



मेरी उनसे मुलाकात इंटरनेशल फिल्म फेस्टिवल में बैंडिट क्वीन के मौके पर हुई थी. उनकी फिल्म का प्रीमियर था. उस समय वेबसीरीज का कॉन्सेप्ट नहीं था और सेंसर बोर्ड की कैंची की धार कुछ ज्यादा ही तेज हुआ करती थी. इसके बावजूद फिल्म में शारीरिक व शाब्दिक हिंसा भरपूर थी और नग्न दृश्य भी. जो उस समय के दर्शकों के लिए वाकई एक अभूतपूर्व अनुभव था. 

फिल्म के बाद शेखर की प्रेस कॉन्फ्रेंस थी. मैंने इसलिए फिल्म को कुछ ज्यादा ही ध्यान से देखा कि कहीं कोई ऐसी चीज मिले, जिसके आधार पर उन्हें घेरा जा सके. और मैंने एक ऐसी गलती पकड़ ही ली. 

फिल्म के तुरंत बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस शुरू हुई. सब लोग फिल्म से संबंधित रूटीनी सवाल पूछते रहे. मैं शां​ति से बैठा रहा और उन्हें इससे भी ज्यादा शांति से सवालों के जवाब देते हुए देखता रहा. कॉन्फ्रेंस खत्म होने के बाद मैं उनके पास पहुँचा और उन्हें अपना परिचय देते हुए बोला कि मुझे उनसे कुछ बात करनी है. उन्होंने मेरी ओर हाथ बढ़ाया और बड़ी गर्मजोशी से हाथ मिलाते हुए बोले कि पूछिए, क्या पूछना है. 

मैंने कहा कि मुझे प्रेस कॉन्फ्रेंस में सबके सामने यह बात पूछना ठीक नहीं लगा, लेकिन मेरा सवाल यह है कि इस फिल्म में आपने फूलन देवी के बेहमई गांव पर हमले वाले सीन में डेट टैग तो 14 फरवरी 1981 का लगाया है, लेकिन गांव में पोस्टर मेरा करम, मेरा धरम मूवी का लगा है, जो 1987 में रिलीज हुई थी. 

कोई और डायरेक्टर होता तो या तो बगले झांकने लगता, या फिर सवाल का जवाब दिए बिना बचकर निकलने की कोशिश करता. लेकिन शेखर कपूर मुस्कराए और बिना वक्त गंवाए मुझे बधाई दी कि आपका आॅब्जर्वेशन बड़ा माइन्यूट है. फिर उन्होंने बताया कि जिस समय शूटिंग चल रही थी, हमने लड़के को मेरा गांव मेरा देश फिल्म का पोस्टर लाने के लिए भेजा था. वह गलती से इस फिल्म का पोस्टर ले आया, क्योंकि वो भी धर्मेन्द्र की फिल्म थी और ये भी. इसलिए हमें लगा कि शूटिंग को रोकने के बजाए, इसी का यूज कर लेते हैं. 

मैंने उनसे पूछा कि आप कहाँ रुके हुए हैं, मैं आपका इंटरव्यू करना चाहता हूँ. तो उन्होंने बताया कि उनके पैरेंट्स दिल्ली में ही रहते हैं महारानी बाग में. वे वहीं रुके हैं. उन्होंने मुझे अपना फोन नंबर दिया और कहा कि कल आ जाइए, फोन करके. अगले दिन जब मैंने उन्हें फोन किया ​तो उन्होंने बताया कि वे अभी बॉम्बे जा रहे हैं. पर नेक्स्ट टाइम इंटरव्यू जरूर कर लेंगे. इसके बाद मैंने कई बार उनके घर पर कॉल किया, लेकिन वह नेक्स्ट टाइम कभी नहीं आया. 

आज उनके 75 वें जन्मदिन पर ढेर सारी बधाईयां. इस उम्र में भी वे बेहद ​सक्रिय हैं और आज भी कई बड़ी लेखकीय व निर्देशकीय ​परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं. उनके सपने पूरे हों तथा हमें कुछ और बेहतरीन चीजें देखने को मिलें, यही हमारी हार्दिक शुभकामना है.

Wednesday, November 18, 2020

बातें—मुलाकातें: 31 (सुष्मिता सेन)

19 नवंबर को दो ऐसी नारियों का जन्म हुआ है, जिन पर भारतीय जितना मन चाहे गर्व का अनुभव कर सकते हैं, पहली हैं भूतपूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत श्रीमती इंदिर गाँधी और दूसरी देश के लिए पहला मिस यूनिवर्स टाइटल जीतकर लाने वाली सुष्मिता सेन.



सुष्मिता से मेरी मुलाकात तब हुई थी, जब वह यह टाइटल जीतकर एक साल तक दुनिया भ्रमण करने के बाद स्वदेश लौटी थीं. हर तरफ उनके ही चर्चे थे. उस समय वह दिल्ली के वसंत कुंज स्थित फ्लैट में रहती थीं. मैंने उनके घर का नंबर तलाशा और फोन लगाया. उनकी मम्मी ने फोन उठाया तो मैंने अपना परिचय देते हुए कहा कि मैं सुष्मिता का इंटरव्यू करना चाहता हूँ. उन्होंने एक मिनट होल्ड करने के लिए कहा और फिर सुष्मिता से बात कर, मुझे अगले दिन 11 बजे के आसपास आने के लिए बोला.

हमेशा की तरह मैं तयशुदा वक्त पर उनके घर पहुँच गया. लेकिन उस वक्त सुष्मिता किसी और को इंटरव्यू दे रही थीं, तो मुझे इंतजार करने के अलावा कोई और चारा नहीं था.

मैं वहीं एक चेयर पर बैठ गया. करीब आधा घंटा बीत चुका था. मैं उन दिनों बहुत धैर्यशील हुआ करता था, इसलिए कोई दिक्कत नहीं थी. अचानक मुझे अपने कंधे पर एक नर्म सा स्पर्श महसूस हुआ. मैंने पीछे घूम कर देखा तो ​ब्रह्मांड की सबसे सुंदर लड़की मेरे सामने थी. ताजगी और सौंदर्य से भरपूर.

'आई एम सॉरी, आपको इंतजार करना पड़ा. आइए, शुरू करते हैं.' उन्होंने मुस्कराते हुए कहा और किसी को कुछ पीने के लिए लाने के लिए कहा. एक ही मिनट में दो गिलासों में कोल्ड ड्रिंक हमारे सामने आ गए.

हमने सिप करते हुए इंटरव्यू शुरू कर दिया. मैं आक्रमण की पूरी तैयारी से गया था तो बिना उनके लड़की या सर्वसुंदर लड़की होने का लिहाज किए, हर तरह के सवाल दागता गया और वह धैर्य से उनका जवाब देती गईं. केवल एक सवाल पर वह थोड़ा बिदकीं. यह था कि उन्होंने प्रतियोगिता के दौरान महिलाओं और अनाथ बच्चों के लिए काम करने की इच्छा जाहिर की थी. उसके लिए वे आज कितनी प्रतिबद्ध हैं. यह सवाल मैंने हल्का सा मुस्कराते हुए पूछा था कि कहीं उन्हें यह न लगे कि मैं उन पर इल्जाम लगा रहा हूँ.

उन्होंने कहा कि मैं आपसे ज्यादा सीरियस हूँ, क्योंकि आप मुस्करा रहेे हैं.
मैंने ऐसा कोई वादा भी तो नहीं किया था, मैं ढिठाई से बोला.
इस पर उन्होंने कहा कि इस टाइटल ने उन्हें रोल मॉडल बनाया है, भगवान नहीं. वे अपनी सीमाएं जानती हैं और मिस यूनिवर्स के तौर पर नहीं, बल्कि सुष्मिता सेन के तौर पर जो भी कर सकती हैं वे करेंगी.

इस बात के लिए उनकी तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने साल 2000 में रिनी और 2010 में अलिसा नाम की बच्चियों को अडॉप्ट किया और साबित किया कि वे अपने कमिटमेंट को लेकर वाकई सीरियस थीं.

एक और चीज, जिसे लेकर वह बहुत सीरियस दिखीं, वह थी सीखने में दिलचस्पी. उन्होंने कहा कि उनकी हिंदी बहुत ज्यादा अच्छी नहीं है. लेकिन बीच—बीच में वह कभी भी कोई अंग्रेजी शब्द बोलतीं तो मुझसे यह जरूर पूछतीं कि इसे हिंदी में क्या कहते हैं और फिर उसे दोहरातीं. जैसे कि उन्होंने अपने एक जवाब में कहा कि वह मेरी जिंदगी का एक चैप्टर था, यह दूसरा चैप्टर है. फिर बोलीं​ कि पहले बताइए कि चैप्टर को हिंदी में क्या कहते हैं.'अध्याय' मैंने कहा तो उन्होंने अपना जवाब दोहराया कि वह मेरी जिंदगी का एक अध्याय था, यह दूसरा अध्याय है.

इसके बाद और बहुत सारे सवाल—जवाब हुए, जो यहाँ इंटरव्यू में पढ़ सकते हैं. उनके जवाबों से उनकी जहानत का अंदाजा लगाया जा सकता है, जो बताता है कि वे सूरत ही नहीं, सीरत में भी किसी से कम नहीं हैं.

हमारे बीच दो चीजें कॉमन हैं... इंटरव्यू खत्म होने के बाद मैंने उठते हुए कहा.
'क्या?' उन्होंने हैरानी से मुझे देखा.
'एक तो आपकी तरह मेरा निकनेम भी टीटू है और दूसरे हम दोनों के इनिशिअल्स एस.एस.(संदीप सौरभ और सुष्मिता सेन) हैं.'
वह अवाक मुझे देखती रह गईं, और फिर जैसे ही उनकी समझ में आया तो उनके चेहरे पर चित्ताकर्षक मुस्कान फैल गई.

आज सुष्मिता का जन्मदिन है. उन्हें हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं.

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Monday, November 9, 2020

बातें—मुलाकातें: 30 (टी.एन.शेषन)

आम तौर पर ब्यूरोक्रेट्स को लोग एक व्यक्ति नहीं,बल्कि एक सिस्टम के तौर पर ही देखते हैं. लेकिन इनके बीच कई बार ऐसे चेहरे सामने आ जाते हैं, जो सिस्टम में लोगों का विश्वास जमाते हैं, उसकी ताकत से प​रिचित कराते हैं.


ऐसा ही एक चेहरा था पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त दिवंगत टी.एन. शेषन का. उनके निर्वाचन आयोग की कमान संभालने से पहले लोगों को चुनाव आयोग के बारे में सिर्फ इतनी ही जानकारी थी कि यह एक ऐसी संस्था है जो चुनावों की तारीख और नतीजे घोषित करती है. लेकिन जब शेषन ने अपनी भूमिका निभाना शुरू किया तो पूरे देश को बताया कि असल में चुनाव आयोग कितना शक्तिशाली है. जब वह अपने पूरे फॉर्म में आए तो बड़ेबड़े खुर्राट राजनेता उनके सामने पनाह माँगते नजर आते थे. नेताओं के नटबोल्ट कसे तो जनता के हीरो बन गए और 'गिव मी फाइव शेषन, आई विल गिव यू स्ट्रॉन्गेस्ट नेशन' एक मुहावरे के तौर पर इस्तेमाल होने लगा. इसके बार तो किरण बेदी, गोविंद खैरनार, हरजीत सिंह बाबा जैसे अनेक जननायक लोकतंत्र के शक्तिशाली पहरेदार की भूमिका में नजर आने लगे. लेकिन कुछ ही साल बाद यह पूरा माहौल एक गुबार की तरह ओझल हो गया और सब कुछ अपने पुराने ढर्रे पर लौट आया. जब किरण बेदी और टी.एन.शेषन खुद चुनाव मैदान में उतरे तो लोकप्रियता काम न आई और सराहना और समर्थन का फर्क साफसाफ महसूस किया गया. यह बहुत लंबी चर्चा का विषय है, इसलिए वापस शेषन जी पर लौटते हैं, जिन्हें आज से ठीक एक साल पहले नियति के क्रूर हाथों ने हमसे छीन लिया था.

शेषन एक बेहद सनकी ब्यूरोक्रेट के रूप में पहचाने जाते थे, जो सरेआम विज्ञापन में नेताओं को कच्चा चबाने की बात करते थे और पत्रकारों को आधी रात को फोन करके धमकने का माद्दा रखते थे. मैं उन दिनों आईआईएमसी से पत्रकारिता का कोर्स कर रहा था और अखबारों के लिए फ्रीलांस किया करता था. मुझे लगा कि अगर मैं टी.एन. शेषन का इंटरव्यू करने में कामयाब हो गया तो मेरे लिए यह एक बहुत बड़ी अचीवमेंट हो सकती है. नईनई शुरुआत थी तो इंकार चुभता नहीं था.

जनाब शेषन साहब का नंबर तलाशा और उन्हें फोन लगा दिया. उम्मीद के विपरीत उन्होंने खुद फोन उठाया. मैंने परिचय दिया कि कहा कि मैं आपका इंटरव्यू करना चाहता हूँ. वह बोले कि संडे को आ जाइएगा, लेकिन आने से पहले कॉल कर लेना. उस समय तो जैसे मेरे पाँव जमीन पर ही नहीं पड़ रहे थे, लग रहा था कि जैसे मैंने कोई बहुत बड़ी जंग जीत ली हो. लेकिन, उस वक्त नहीं मालूम था कि यह जंग का अंजाम नहीं, बल्कि आगाज है. असली जंग तो अब शुरू होनी थी.

शेषन साहब के आश्वासन से फूला न समाया मैं हवा में उड़ता हुआ नवभारत टाइम्स पहुँचा. उस समय अच्युतानंद जी एनबीटी के सहसंपादक थे. जब मैंने उन्हें बताया कि शेषन जी ने मुझे टाइम दे दिया है तो उन्हें यकीन न आया. फिर उन्होंने कहा कि यह मामला एक बहुत बड़ी हस्ती का है. इसलिए हम चाहते हैं कि जब आप इंटरव्यू लेने जाएं तो नवभारत टाइम्स से एक रिर्पोटर भी आपके साथ रहे. मुझे यह शर्त अटपटी तो लगी, लेकिन मैंने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और यही कहा कि वहाँ से कन्फर्मेशन मिलने के बाद मैं आपको बता दूँगा.

संडे मैंने सुबहसुबह शेषन साहब को फोन मिलाया और कहा कि मैंने कन्फर्मेशन के लिए फोन किया था. उन्होंने ​कहा कि वो तो आउट आॅफ स्टेशन हैं, आप तीनचार दिन के बाद फोन कर लीजिएगा.

अगली बार फोन किया तो एक बेहद मधुर महिला स्वर सुनाई दिया कि वो तो नहीं हैं, आप संडे को फोन कर  लीजिएगा. उन्हीं दिनों मैंने अखबार में पढ़ा था कि शेषन जी ने अपने फोन में एक ऐसी डिवाइस लगा रखी है, जिसके माध्यम से बच्चे, बूढ़े, बीमार बूढ़े, महिला, लड़की वगैरह करीब आधा दर्जन तरह से आवाज बदल कर बात की जा सकती है. मुझे लगा कि शायद इस बार भी ऐसा ही हो रहा है.

संडे फोन किया तो शेषन साहब की असली आवाज सुनने को मिली. मैंने कहा कि मैंने आपको इंटरव्यू के लिए कॉल किया था.

असंभव ! महाभारत के द्रोणाचार्य के अंदाज में उन्होंने एक शब्द में जवाब दिया और फोन रख दिया.

लेकिन मैं कहाँ हार मानने वाला था. कुछ दिनों बाद यह सोचकर कि अब तो वह भूल गए होंगे, मैंने नए सिरे से इंटरव्यू के लिए उनका समय माँगा. उन्होंने एक तारीख, ठीक से याद नहीं क्या तारीख थी, बता दी और कहा कि फोन करके आ जाइएगा. जब मैंने उस तारीख को उन्हें कॉल किया तो उन्होंने जवाब दिया कि वो तो बाहर गए हुए हैं. इतनी बार उनकी आवाज सुन चुका था कि धोखा होने का सवाल ही नहीं था. मैंने कहा कि उन्होंने मुझे आज इंटरव्यू के लिए बुलाया था.

'तो क्या वे आपके लिए यहाँ रुकते? उन्होंने गुस्से में कहा, 'आप कौन बोल रहे हो? हो कौन तुम?'

उनके गुस्से से मैं नर्वस हो गया, मैंने जल्दी से फोन रख दिया.

इसके बाद यह सिलसिला कई बार दोहराया गया. एक बार वह बड़े प्रेम से बात करते, अगली बार दुर्वासा बन जाते. इस आँखमिचौली के खेल में मुझे भी बहुत मजा आने लगा, इंटरव्यू लेना न लेना अब मेरी प्राथमिकता नहीं रही थी. बस उनसे बात होते रहना ही काफी था. उनके जन्मदिन पर विश करना, अलगअलग फेस्टिवल पर कॉल करके शुभकामनाएं देना सब जारी था, बस जो नहीं हो पाया, वह था शेषन साहब का इंटरव्यू.

छह महीने तक यह सब चला. फिर पता नहीं क्यों, या तो उनका नंबर बदल गया या फिर कोई और वजह रही होगी, उनका फोन उठना बंद हो गया. फिर एक दिन पता चला कि कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में उनका भाषण है. यह सोचकर कि वहीं उनका इंटरव्यू कर लूँगा, मैं वहाँ पहुँच गया. लेकिन भाषण के बाद  सवालजवाब सत्र में उन्होंने पत्रकारों की जिस तरह क्लास ली और खिल्ली उड़ाई, उसे देखते हुए  मेरी हिम्मत न हुई कि उन्हें छेड़ूँ और मैंने उनका इंटरव्यू करने का इरादा हमेशा के लिए छोड़ दिया.

आज उनकी पहली पुण्यतिथि के अवसर पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि. न भूतो न भविष्यति वाली उनके जैसी शख्सियत की कमी हमेशा महसूस की जाती रहेगी.