Tuesday, August 18, 2020

बातें- मुलाकातें: 10 (गुलजार)

हर व्यक्ति का मिजाज अलग होता है, सोच अलग होती है, प्राथमिकताएं अलग होती हैं. अगर हम किसी व्यक्ति को अपने अनुरूप नहीं पाते तो यह उसकी शख्सियत का नहीं, बल्कि हमारी तंगनजरी का कसूर होता है.

आज मैं बात कर रहा हूँ, गुलजार साहब की. वह एक जाने-माने गीतकार, लेखक, कवि, निर्देशक हैं और शब्दों के साथ प्रयोग करने में उन्होंने जो महारत हासिल की है, वह अपने आप में बेजोड़ है. मैं बचपन से उनकी कविताओं का जबर्दस्त प्रशंसक रहा हूँ, और कविता लिखते हुए शब्दों को पिघलाने की कोशिश करते हुए उन्हें ही याद करता हूँ और पाता हूँ कि उनकी इस विलक्षण प्रतिभा का एक प्रतिशत भी मैं अपनी कविता में डाल पाता हूँ तो खुद ही अपनी कविता का सैदाई बन जाता हूँ. 

चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, चश्मे और क्लोज़अप

लेकिन, उनसे हुई दो-तीन मुलाकातों का मुझ पर ऐसा असर पड़ा कि कभी भी मैं एक अच्छे इंसान के रूप में उनका आदर नहीं कर पाया. उनके मगरूर व्यवहार की वजह से मैं उनसे एक लंबे समय तक खफा रहा हूँ. उनकी आलोचना सुनकर खुश हुआ हूँ, उनकी शिकस्त से सुकून महसूस किया है. यहाँ तक कि उनके नाम के साथ साहब सफिक्स के इस्तेमाल में भी मेरी जुबान और कलम दोनों को बड़ा संकोच होता रहा है.

मेरी उनसे मुलाकात साहित्य अकादमी के एक फेस्टिवल में हुई थी, जिसका विषय साहित्य और सिनेमा का संबंध था. तीन दिन चलने वाले इस फेस्टिवल के पहले ही दिन मेरी नजर गुलजार साहब पर पड़ी. मैं उनके पास जा पहुँचा और इंटरव्यू के बारे में बताते हुए उनसे टाइम माँगा. उन्होंने कहा कि कितना वक्त लगेगा. मैंने कहा कि पाँच से दस मिनट. इस पर उन्होंने बहुत कुटिलता से मुस्कराते हुए कहा कि पाँच मिनट तो बहुत ज्यादा हो जाएगा, और फिर किसी से बातों में मशगूल हो गए. इसके बाद इस समारोह के दौरान मेरा कई बार उनसे आमना-सामना हुआ और हर बार मैंने उन्हें किसी न किसी से गप लड़ाते हुए देखा. मैं यह नहीं समझ पाता था कि मुझे इंटरव्यू के लिए पाँच मिनट देना उन्हें बहुत ज्यादा लग रहा था. मेरा मन खट्टा हो गया, और इस बात से और ज्यादा कि मेरा सपना काॅलम के लिए उनका जो इंटरव्यू मैं करना चाहता था, वही इंटरव्यू उन्होंने किसी और को दिया, जो कि नभाटा में छपा भी. हालांकि यह मेरी गलती थी, उन्हें पूरा हक था इंकार करने का और यह तय करने का कि वे किसे समय दें, किसे नहीं. लेकिन, उस समय मैं इसे अपनी बेइज्जती मानकर उनसे रुष्ट हो गया और कई साल तक इस बात को दिल में पाले रहा. 

इसके कुछ दिन बाद एक और ऐसा वाकया हुआ, जिसने मुझे उनकी बेरुखी और मगरूरियत को लेकर अपनी राय पुख्ता करने की नई वजह दे दी. एक दिन सुबह-सुबह उनकी किताब पुखराज या शायद मेरा कुछ सामान की रिलीज थी. मैं इस कार्यक्रम में पहुँच गया. वहाँ गुलजार साहब भी थे. उन्होंने कुछ कविताओं का पाठ किया. उनकी धीर-गंभीर आवाज में कविताएं सुनना वाकई एक अविस्मरणीय अनुभव था, लेकिन मैं तो नाराज था तो इस बात को सराह कैसे सकता था. रही-सही कसर उनकी एक टिप्पणी ने पूरी कर दी. हुआ ये कि एक कविता सुनकर एक श्रोता ने पूछा कि क्या यह आपने राखी जी के लिए लिखी है. इस पर गुलजार साहब ऐसे बिगड़े, जैसे कि उसने उन्हें गाली दे दी हो. उन्होंने उसे कठोर स्वर में जो कहा, वह शब्दशः तो मुझे याद नहीं, लेकिन उसका मतलब यही था कि वह सिर्फ कविता सुने, बाल की खाल न निकाले. 

इस बात को सालों बीत गए, गुलजार साहब के बारे में मेरी राय जस का तस रही. एक दिन मैंने उनका इंटरव्यू पढ़ा, जिसमें उन्होंने कहा कि उनकी बेटी मेघना एक प्रोड्यूसर से मिलने गई तो उसने चार घंटे उससे रिसेप्शन पर इंतजार कराया. गुलजार साहब का यह भी कहना था कि जब मेरे जैसे व्यक्ति की बेटी के साथ यह व्यवहार होता है, तो नए लोगों के साथ किस तरह का व्यवहार होता होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है. मुझे इस वाकये को पढ़कर एक पैशाचिक किस्म की संतुष्टि महसूस हुई कि अब ऊंट पहाड़ के नीचे आया. जब खुद पर पड़ी तो नए लोगों की भावनाओं का ख्याल आया. खुद के पाँच मिनट भी बहुत कीमती लग रहे थे.

आज जब सोच में परिपक्वता और खुलापन आया है तो अपने इस दुराग्रह को लेकर शर्मिंदगी सी महसूस होती है. 

मेरी उनके बारे में राय चाहे जो रही हो, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि वे आज भी हिंदी सिनेमा की सबसे विलक्षण प्रतिभाओं में शामिल हैं, बल्कि ऐसी पूंजी हैं, जिस पर पूरी इंडस्ट्री को फख्र करना चाहिए.

आज उनका जन्मदिन है, दिली बधाई के साथ मैं कामना करता हूँ कि उनकी जादुई कलम हमेशा हमें यूंही शब्दों के तिलिस्मी संसार की सैर कराती रहे.


Monday, August 17, 2020

बातें- मुलाकातें: 9 (दलेर मेहंदी)

मुलाकातें, जिंदगी का एक अभिन्न अंग होती हैं. हर मुलाकात कोई न कोई याद देकर जाती है. कुछ यादें मीठी होती हैं, कुछ फीकी, कुछ कड़वी तो कुछ उबाऊ... आज जिस मुलाकात की बात करने जा रहा हूँ, यह आखिरी किस्म की थी.



दलेर मेहंदी... नाम तो सुना ही होगा. हो सकता है आज मीका, बादशाह, अरजित जैसे गायकों की लोकप्रियता के बीच इनका नाम याद करने में आपको थोड़ा दिमाग पर जोर डालना पड़े, लेकिन अगर आप बोलो तारा रा रा, हो जाएगी बल्ले-बल्ले दार जी रब-रब दार जी रे जैसे सुपरहिट साॅन्ग्स को याद करेंगे तो आपको यह भी याद आ जाएगा कि पंजाबी पाॅप को इंटरनेशनल लेवल पर ले जाने वाले सिंगर्स में दलेर का नाम टाॅप के तीन-चार में तो लिया ही जा सकता है. वह तो बुरा हो कबूतरबाजी का, जिसमें उनका नाम उछला तो उनके हरे-भरे कैरियर पर जैसे ग्रहण सा लग गया. वर्ना तो वह ऐसा वक्त था, जब गायकी के क्षेत्र में उनकी तूती बोलती थी. वह भी ऐसे दौर में, जब बादशाह की तरह पेड लाइक्स हासिल करने की सुविधा नहीं थी. उसके बावजूद दिलेर दिलों पर राज करते थे. अब भी करते हैं, लेकिन संगीत से ज्यादा अपने ग्रीन ड्राइव, फूड फाॅर लाइफ जैसे सामाजिक कामों के जरिए...
बहरहाल, मुलाकात की बात चल रही थी. दलेर से भी हमारी मुलाकात उनके महरौली, दिल्ली स्थित कार्यालय में होना तय हुआ. उस समय किसी का इंटरव्यू करने जाने से पहले, उसके बारे में होमवर्क करने का रिवाज था, जिसे हम भी फाॅलो करते थे. दलेर के बारे में पता चला कि वह बहुत ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं, तो तय हुआ कि सवालों की भाषा और प्रकृति सामान्य ही रखी जाए. एक से भले दो में यकीन करते हुए मैं अपने साथ, अपने एक मित्र को भी ले गया. जिन्हें गूढ़ विषयों पर ज्ञान हासिल करने और मौका-बेमौका उस ज्ञान का वमन करने में बहुत मजा आता था. मैंने उन्हें आगाह कर दिया था कि यहाँ इस तरह की बातें मत करना.
सवाल-जवाब का सिलसिला शुरू हुआ. दलेर जी मेरे सवालों के जवाब देते रहे. लेकिन मैंने हर जवाब के साथ यह महसूस किया कि उन्हें उत्तर देने के लिए काफी सोचना पड़ रहा है. दरअसल उन दिनों नवभारत टाइम्स में चल रहा मेरा सपना काॅलम ही ऐसा था कि इसमें पीआर एजेंसियों के तैयार किए रेडीमेड जवाबों से काम नहीं चल सकता था.
उनकी असहजता के महसूस करते हुए मैंने अपने सवालों को सरलतम बनाए रखा और उन्होंने मुश्किल से ही सही, पर उनके अच्छे दिलचस्प जवाब भी दिए. लेकिन, मेरे ज्ञानी मित्र बार-बार उनसे दार्शनिक किस्म के सवाल पूछ-पूछ कर उन्हें और भी असहज बना देते थे. मेरे बार-बार इशारा करने और फुसफुसाने का उन पर कोई असर नहीं हो रहा था. आखिर में एक सवाल ऐसा आया, जिससे उन्होंने काफी हलका महसूस किया और बेहद खुल गए. यह सवाल था कि आपकी दिली ख्वाहिश किया है, उन्होंने कहा कि वह एक संगीत नगरी बसाने का सपना देखते हैं, जिसमें चप्पे-चप्पे पर गीत और संगीत बिखरा हो. लोग जिधर से गुजरें, उनके कानों में संगीत की मिठास घुल जाए.
आज उनका जन्मदिन है, हम यही कामना करते हैं कि वह स्वस्थ और सक्रिय रहें और संगीत नगरी बसाने का उनका सपना जल्दी पूरा हो, ताकि हम भी उसकी सैर करने जा सकें.

interview

Sunday, August 16, 2020

बातें-मुलाकातें: 8 ( क्रिकेटर चेतन चैहान)


अभी कुछ देर पहले चेतन जी के निधन का दुःखद समाचार मिला, और उनसे हुई मुलाकातों की यादें ताजा हो आईं.

पत्रकारिता में कई बार हमें बहुत मुगालते हो जाते हैं. अगर कुछ लोग हमें सम्मान और महत्व देते हैं तो हम इसे उनकी भलमनसाहत से ज्यादा अपनी खूबी मान बैठते हैं और इस चक्कर में बहुत से लोगों को गलत समझ बैठते हैं.

चित्र में ये शामिल हो सकता है: Raja Mane, बाहर

बात उन दिनों की है, जब मैं दैनिक भास्कर के पत्रिका विभाग में था. हम लोग साप्ताहिक परिशिष्ट रसरंग में एक काॅलम दिया करते थे, इक्के पर इक्का. इसमें किसी भी क्षेत्र के एक व्यक्ति से उसी क्षेत्र के दूसरे व्यक्ति पर, जो कि उसका मित्र, समकक्ष, सीनियर या प्रतिद्वंद्वी कोई भी हो सकता था, एक आलेख लिखने के लिए बोलते थे. अब सब लोग लेखक तो होते नहीं, कुछ से मिलकर हम उनसे सवाल करते थे और उनके जवाबों के आधार पर उनके नाम से लेख लिख दिया करते थे.
इसी क्रम में मैंने सुझाव दिया कि एक लीजेंड क्रिकेटर चेतन चैहान से दूसरे लीजेंड क्रिकेटर कपिल देव के बारे में लिखवाया जाए. उन दिनों वे हमारे संसदीय क्षेत्र अमरोहा से भाजपा के साँसद थे. इस सुझाव के पीछे मेरा यह भी विचार था कि इंटरव्यू के बहाने चेतन जी से परिचय हो जाएगा.
बहरहाल, चेतन जी को फोन कर मैंने उन्हें इस काॅलम के बारे में बताया और उनसे समय माँगा. उन्होंने अगले दिन दिल्ली के शकरपुर इलाके में स्थित उनके आॅफिस में आने के लिए कहा. हम उन दिनों लक्ष्मीनगर में रहते थे, जो शकरपुर के एकदम सामने ही पड़ता है, सो मैं अपने रूममेट और मित्र के साथ तयशुदा वक्त पर उनके आॅफिस पहुँच गया. वह हमें सीढ़ियों पर मिल गए. मैंने अपना परिचय दिया तो वह बोले कि अच्छा हुआ, आप आ गए. हमारे एक परिचित की डेथ हो गई है और अभी मैं निगमबोध घाट जा रहा हूँ, तो आज तो बात नहीं हो पाएगी. आप कल इसी वक्त आ जाइए.
अगले दिन हम दोनों एक बार फिर उनके आॅफिस में थे. मैंने उन्हें बताया कि हम आपके संसदीय क्षेत्र से ही हैं. लेकिन इस बात के प्रति उनकी उदासीनता देखकर बहुत निराशा हुई. उन्होंने कहा कि बताइए, किस बारे में बात करनी है. मैंने कहा कि आपका कपिल देव जी के साथ एक लंबा सफर रहा है. उनके बारे में ही बताइए.
इनके लिए कुछ ले आओ, चेतन जी ने अपने कर्मचारी को आदेश दिया और वह चाय के दो कप और एक प्लेट में बिस्किट रख गया. इसके बाद मैं सवाल पूछता गया, वे बोलते गए और मेरा मित्र नोट्स बनाता गया. चाय और बिस्कुट वैसे ही रखे रहे. न उन्होंने लेने के लिए कहा और न हमने उन्हें हाथ लगाया.
करीब आधा घंटे की बातचीत के बाद इंटरव्यू खत्म हुआ. हम उठ खड़े हुए.
अरे आपने तो कुछ लिया ही नहीं, शायद उनका ध्यान पहली बार चाय की तरफ गया.
‘आपने कहा भी तो नहीं’ मैं मन ही मन बोला, लेकिन उनसे यही कहा कि बातचीत के बीच में ध्यान हीं नहीं गया कि चाय रखी है.
वह हमें सीढ़ियों तक छोड़ने आए और फिर एक और धमाका किया. बोले कि इसक अच्छा पेमेंट दिलवाना, कभी दस-पाँच हजार का पेमेंट लगवा दो.
इस काॅलम के लिए इस तरह की यह पहली माँग थी तो मैं अचंभित रह गया. इसके लिए अभी तक किसी को भी भुगतान नहीं किया गया था. लेखकों को एक आर्टिकल के चार-पाँच सौ रुपए से ज्यादा नहीं मिला करते थे. खुद मेरी पूरे महीने की सेलरी ही छह हजार रुपए थी, इसलिए सिर्फ बातचीत के लिए यह मुझे एक बहुत बड़ी रकम लगी. फिर भी मैंने कहा कि मैं अपने एडिटर से बात करूंगा कि जो बेस्ट पेमेंट हो सकता है, वह लगवा दें.
इस दोनों मुलाकातों को लेकर मैं एक लंबे समय तक क्षोभ से भरा रहा और उन्हें गलत समझता रहा. कई लोकल कार्यक्रमों में उनसे आमना-सामना हुआ, लेकिन पिछली बेरुखी को याद करके कभी उनसे बात करने में हमेशा एक संकोच सा ही महसूस होता रहा.
पर यह भी सच है कि हमारे इलाके में उनकी जो लोकप्रियता थी, और जिस तरह से वह लोगों के सुख-दुःख में भागीदारी किया करते थे, उसे देखकर यही लगता था कि वह बेहद मिलनसार किस्म के व्यक्ति हैं. वैसे भी जिस से भी चेतन जी की चर्चा होती, वह उनकी तारीफ ही करता.
फिर जैसे-जैसे जीवन और सोच में परिपक्वता और व्यावहारिकता बढ़ी तो यह एहसास हुआ कि मैंने उन्हें लेकर जबर्दस्ती के पूर्वाग्रह पाल रखे हैं. और फिर मैंने पाया कि यह व्यक्ति बेहद स्पष्ट है और राजनेताओं वाली लागलपेट, छद्म-शिष्टता और छलकपट से दूर, मूलतः एक सरल स्वभाव वाला खिलाड़ी है. इस प्रकार उनके बारे में मेरी राय सकारात्मक होने लगी तो फिर मैंने उन्हें पसंद करना शुरू कर दिया.
विश्वास करना कठिन है कि आज वह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन दुर्भाग्य से यह एक कठोर सत्य है, जिसे स्वीकार करना होगा. आइए उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करें और उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करें.

Saturday, August 8, 2020

बातें—मुलाकातें : 7 (गीतकार संदीप नाथ )

किसी से रूबरू हुए बिना भी अच्छी दोस्ती हो सकती है. हिंदी फिल्मों के जाने—माने गीतकार संदीप नाथ इसकी एक बेहतरीन मिसाल हैं, जिनसे मेरी मित्रता करीब ​पंद्रह साल पुरानी है. हमारे एक साझा मित्र हैं, कुमार अतुल जो कि अमर उजाला के देहरादून संस्करण में समाचार संपादक हैं. उन्होंने एक बार संदीप नाथ के बारे में बताया और कहा कि तुम्हें संदीप से बात करनी चाहिए, क्योंकि तुम्हारे नाम ही नहीं और भी कई चीजें आपस में मिलती हैं.

ये चीजें थीं, हमारे मूल निवास, वे बिजनौर में पले—बढ़े और पढ़े हैं और मैं बिजनौर से करीब 50 किलोमीटर दूर के कस्बे मंडी धनौरा में. वे भी स्थापित कवि हैं और मैं शौकिया, वे पत्रकार रह चुके हैं, मैं पत्रकारिता कर रहा हूँ... वगैरह—वगैरह. जाहिर है कि मन में उत्सुकता होनी ही थी.
बिना झिझक के अतुल भाई के दिए नंबर पर कॉल लगा दिया और पहली बार में जितना गर्मजोशी भरा रिस्पॉन्स मिला, उसने हमारी मित्रता के दरवाजे खोल दिए. इसके बार के डेढ़ दशकों में हमारी सैकड़ों बार फोन पर बातें हुईं और वह भी काफी—काफी देर. लेकिन, बार—बार मुलाकातों का योग बनते—बनते रह जाता. और यह योग बिना करीब एक साल पहले. जब संदीप नागपुर महानगर निगम के एक कार्यक्रम में बतौर ​विशिष्ट अतिथि नागपुर आए थे.

चित्र में ये शामिल हो सकता है: Sandeep Nath, बाहर
आगे बढ़ने से पहले कुछ बातें संदीप नाथ के बारे में... ​कितने अजीब रिश्ते हैं यहाँ (पेज 3), सिकंदर ओ सिकंदर ( फैशन), यूं शबनमी पहले नहीं थी चाँदनी (सांवरिया) जैसे मधुर गीतों और आशिकी 2 के 'सुन रहा है ना तू...' जैसे सुपर—डुपर हिट गीत के रचनाकार संदीप की कविता और गजलों के आधा दर्जन से ज्यादा संकलन प्रकाशित हो चुके हैं. उन्होंने डीएनए में गाँधी नाम की एक सोशल सैटायर मूवी का निर्माण—निर्देशन भी किया है और हाल ही में एक गायक के तौर पर अपनी नई पारी का आगाज किया है सूफी गाने रंगरेज से, जिसका वीडियो यूट्यूब पर धूम मचा रहा है और इसे दो लाख बारह हजार से ज्यादा बार देखा जा चुका है,
(आप भी https://www.youtube.com/watch?v=BNOnvhQHvjs पर विजिट करके देख सकते हैं, लाइक कीजिए और शेयर कीजिए. ).
अब मुलाकात पर लौटते हैं. संदीप नाथ नागपुर में हैं, यह बात मुझे अचानक ही तब पता चली, जब मैं यह कार्यक्रम कवर करने गया और मंच पर अतिथियों के परिचय में उनका नाम भी पुकारा गया. सुनकर बहुत गुस्सा आया कि भाई नागपुर में हैं और मुझे बताना भी जरूरी नहीं समझा. सोचा कि अब मैं भी बात नहीं करूंगा. लेकिन फिर ख्याल आया कि मन में गुस्सा रखने की बजाए, फोन करके शिकायत करना ज्यादा बेहतर है.
कार्यक्रम खत्म होने के बाद उन्हें फोन लगाया और जितना गिला कर सकता था, जम के किया. इस पर संदीप ने इतनी बार अफसोस प्रकट किया कि मुझे अपने गुस्से पर गुस्सा आने लगा और एक सबक भी सीखने को मिला कि हमें कभी भी ईगो को रिश्तों के आड़े नहीं आने देना चाहिए. अगर मैं इस बात को दिल से लगाता तो खामख्वाह एक अच्छा—भला आत्मीय रिश्ता औपचारिक रिश्ते में बदल जाता.
बहरहाल, मिलने के लिए शाम का वक्त तय हुआ और मैं अपने एक और हमनाम मित्र संदीप अग्रवाल जी, जो कि एक प्रतिष्ठित व्यवसायी, जननेता और सामाजिक कार्यकर्ता हैं, के साथ संदीप नाथ से मिलने जा पहुँचा. संदीप अभी रास्ते में ही थे. हम होटल की लॉबी में इंतजार करने लगे. कुछ देर बाद उनका आगमन हुआ. साथ में एक व्यक्ति और था. लिफ्ट में जब हम उनके साथ ऊपर रूम में जा रहे थे तो मैंने मजाक किया कि आज पहली बार मैं तीन संदीप को एक साथ देख रहा हूँ तो उन्होंने बताया कि उनके साथ वाले सज्जन का नाम भी संदीप ही है.
वह चौथे संदीप थे, मराठी अभिनेता संदीप कुलकर्णी. (डोम्बिली फास्ट और श्वास फेम). इस ​इत्तेफाक से हम सब बहुत आनंदित हुए. इसके बाद संदीप के रूम में अगले दो घंटों में गिले—शिकवों और मनव्वलों के एक और दौर के बाद अलग—अलग मुद्दों पर ढेर सारी बातें हुईं, जिनका यहाँ जिक्र करना संभव नहीं है. लेकिन जिस बात का जिक्र सबसे ज्यादा जरूरी है वह यह है कि आज संदीप नाथ का जन्मदिन है. इस मौके पर उन्हें ढेर सारी बधाई और एक उज्जवल भविष्य व सफलता की हार्दिक शुभकामनाएं.

Wednesday, August 5, 2020

बातें—मुलाकातें : 6 (श्रीमती सुषमा स्वराज)

एक साल पहले, आज ही के अभाग्यशाली दिन काल के क्रूर हाथों ने देश से एक ऐसी शख्सियत को छीन लिया था, जो एक राजनेता तो थी ही, लेकिन उससे बढ़कर एक जननेता थी. जी हाँ, हम बात कर रहे हैं दिवंगत भाजपा नेत्री श्रीमती सुषमा स्वराज की, जिन्होंने अपने लगभग अर्द्धशती लंबे राजनीतिक कैरियर में अपने जुझारूपन, दयालु स्वभाव और मिलनसारिता के बल पर सबके दिलों पर राज किया. कुछ साल पहले, एक साक्षात्कार के सिलसिले में उनसे मिलना तय हुआ. उनकी मिलनसारिता और गर्मजोशी का अंदाजा तो तभी से लगना शुरू हो गया था, जब मैंने पहली बार मुलाकात का वक्त लेने के लिए उन्हें कॉल किया था.

मैं संदीप सौरभ बोल रहा हूँ...
जी संदीप जी बोलिए...
जितनी हस्तियों का मैंने इंटरव्यू किया था, उनमें वह पहली थीं, जिन्होंने इतनी विनम्रता और सम्मान के साथ मेरा नाम लिया था, तो मन को बहुत अच्छा लगा और थोड़ा अजीब भी. खैर, परिचय देने और इंटरव्यू का टॉपिक देने के बाद तुरंत वक्त मिला और मुलाकात हुई और अगले दिन मैं उनके लोधी स्टेट वाले घर पर पहुँच गया. वह तब तक एक बहुत बड़ी हस्ती बन चुकी थीं, लेकिन उनके व्यवहार से इस बड़प्पन का कहीं भी आभास नहीं मिलता था. टीवी पर उन्हें कई बार देखा था, लेकिन वास्तविक जीवन में वह स्क्रीन से भी ज्यादा ओजस्वी और गरिमामयी दिखती थीं. वह बहुत सहज भाव से मेरे सामने ही बैठ गईं और बोली कि बताइए संदीप जी, आप क्या जानना चाहते हैं. तब तक चाय के कप और पारले—जी के बिस्कुट आ चुके थे. वह बोलीं, पहले चाय पी लीजिए. फिर बात करते हैं. मैंने चाय पीते—पीते उनसे कई सवाल पूछ लिए. एक सवाल था कि आप नारी मुक्ति के बारे में क्या सोचती हैं. इस पर उनके लहजे में ऐसा जोश आया कि मैं सहम सा गया कि कहीं मैंने कोई गलती तो नहीं कर दी. उनका कहना था कि आखिर नारी को मुक्ति किससे चाहिए? अपने परिवार से, अपने बच्चों से? मैं नारी मुक्ति में नहीं, नारी शक्ति में विश्वास करती हूँ... इंटरव्यू के छपने के बाद उनका यह वाक्य कोटेशन के रूप में कई जगह छपा. बाकी इंटरव्यू आप स्वयं पढ़ सकते हैं.
आज उनकी प्रथम पुण्यतिथि पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि. वह एक ऐसी राजनेता थीं, जिनकी कमी हमेशा खलती रहने वाली है.

interview

Friday, July 24, 2020

बातें-मुलाकातें: 5 ( इस बार भी नाम न पूछो )

जर्नलिज्म के एथिक्स की जब भी बात चलती है, मुझे एक प्रोड्यूसर से जुड़ा किस्सा याद आ जाता है. उस समय नए-नए पत्रकार बने थे अपुन, तो जोश और आदर्शवाद कूट-कूट कर भर चुका था. हमारी तरह ही एक नए-नए डायरेक्टर-प्रोड्यूसर बने थे श्रीमान एक्स ( नाम न ही पूछें तो बेहतर होगा, आजकल बहुत बड़ी तोप बन चुके हैं.)

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श्रीमान एक्स प्रोड्यूसर जरूर नए थे, लेकिन एक लेखक के तौर पर काफी स्थापित हो चुके थे और फ्रांस में रहा करते थे. फिल्म फेस्टिवल में उनकी फिल्म, जिसकी तब तक थिएटर रिलीज नहीं हुई थी, अपने कुछ टाॅपलेस दृश्यों की वजह से बड़ी चर्चा में आ गई थी और साथ ही श्रीमान एक्स और उनकी हीरोइन वाई भी. हीरोइन से तो मुलाकात न हो सकी, लेकिन श्रीमान एक्स मिल गए. अपना परिचय देते हुए मैंने उनसे इंटरव्यू के लिए हीरोइन का नंबर माँगा, तो उन्होंने एक अनोखी जानकारी दी कि फ्रांस में किसी का नंबर दूसरे को देना अशिष्टता माना जाता है. लेकिन, उन्होंने कहा कि आप मेरा नंबर ले लीजिए. वाई अगले वीक दिल्ली आएंगी तो आप मुझे काॅल कर लीजिएगा. मैं अपने वसंत विहार स्थित आॅफिस में आपकी उनसे मुलाकात करवा दूँगा. मुझे इसमें क्या आपत्ति हो सकती थी. मैंने उनका नंबर लेकर रख लिया.
अगले हफ्ते मैंने उन्हें फोन किया तो उन्होंने आॅफिस का एड्रेस देते हुए कहा कि आप कल सेकेंड हाफ में आ जाइए. अगले दिन मैं उनके आॅफिस पहुँच गया. देखा तो हीरोइन का दूर-दूर तक कोई पता न था. मैंने उनसे पूछा कि वाई कहाँ है तो भाईसाहब बोले कि वो आज आने वाली थीं, लेकिन उनका प्रोग्राम कैंसिल हो गया. मुझे बड़ी निराशा हुई, लेकिन मन में ये ख्याल बिल्कुल भी नहीं आा कि वे झूठ भी बोल रहे हो सकते हैं.
तभी श्रीमान एक्स ने मुझे एक नायाब हल सुझाया. बोले कि मैं हर इंटरव्यू में वाई के साथ रहता हूँ. मुझे पता है कि वो किस सवाल का क्या जवाब देती है. आपको जो पूछना है, मुझसे पूछ लीजिए, मैं आपको बिल्कुल वैसे ही जवाब दूँगा. तुनकमिजाजी और नैतिकता ने उफान मारा मैंने बड़ी शांति से उन्हें समझाया कि मैं बहुत एथिकल जर्नलिज्म करता हूँ. इस तरह का इंटरव्यू मैंने न कभी किया है और न कभी करूँगा.
श्रीमान एक्स अवाक मेरा चेहरा देखते रह गए. जब मैं जाने लगा तो वे मेरे पीछे-पीछे आए और दरवाजे पर मुझे रोककर हाथ जोड़ते हुए खेद प्रकट किया और कहने लगे कि बुरा मत मानिएगा, मेरी फिल्म रिलीज होने वाली है, इसलिए मैंने आपसे ऐसा कहा जिससे फिल्म को पब्लिसिटी मिल जाए. वर्ना मैं आपसे ज्यादा एथिकल आदमी हूँ. मैंने कहा कि मैंने बुरा नहीं माना है, सिर्फ यह कहा है कि मैं इस तरह के फर्जी इंटरव्यू नहीं करता. अगर आप चाहें तो मैं अपने एडिटर से बात करके आपका इंटरव्यू कर लूँगा.
बाद में मैंने उनका भी इंटरव्यू किया और उनकी विद्वता में तो वैसे भी कोई शक नहीं था, इसलिए इंटरव्यू बहुत अच्छा हुआ. फिल्म निर्माण और निर्देशन से जुड़े बहुत से महत्वपूर्ण मुद्दों पर उनसे काफी लंबी और काम की बातें हुईं. उनकी निजता का प्रश्न न होता तो वह इंटरव्यू यहाँ जरूर पोस्ट करता. न कर पाने के लिए साॅरी...
( 6 अगस्त को भाजपा की वरिष्ठ नेत्री दिवंगत श्रीमती सुषमा स्वराज जी की पहली पुण्यतिथि है. उनसे जुड़ा संस्मरण अगले सप्ताह .)

Sunday, July 12, 2020

बातें-मुलाकातें: 4 (नाम न पूछो)

एक बड़े प्रसिद्ध गायक हैं. अपने दौर में वे और भी ज्यादा प्रसिद्ध थे. जैसे शिकारी शिकार ढूंढता फिरता है, वैसे ही हम फ्री-लांस जर्नलिस्ट की तरह सेलिब्रिटीज ढूंढते हैं. ऐसे ही ढूंढते-ढूंढते पता चला कि वह गायक एक स्टारनाइट के लिए दिल्ली आए हैं, जहाँ प्रोग्राम के बाद वह होटल रंजीत में ठहरने वाले थे. मैंने होटल में फोन लगाया और बताया कि मैं आपका इंटरव्यू करना चाहता हूँ. उन्होंने सुबह-सुबह आठ बजे बुला लिया. मैंने अपने सहपाठी और उस समय रूममेट रहे पं. उमेश चतुर्वेदी जी को इस बारे में बताया और तय हुआ कि साथ ही चला जाए.

फ़ोटो का कोई वर्णन उपलब्ध नहीं है.

जब हम होटल पहुँचे तो आठ बजने में थोड़ा सा वक्त था. वे गायक होटल की लाॅबी में ही मिल गए. हमें बड़ी खुशी हुई कि ये बंदा तो वक्त का बड़ा पाबंद है और हमारे स्वागत के लिए खड़ा है. हमने उनके पास जाकर अपना परिचय दिया. उन्होंने कहा कि मैं तो अभी इनके साथ एयरपोर्ट के लिए निकल रहा हूँ. किनके साथ? यह सवाल हमारे मन में आया तो हमने उनकी दृष्टि का अनुसरण किया. उनकी सहगायिका एक टैक्सी में बैठ रही थीं. हमें बहुत अजीब लगा कि जब इस बंदे को फ्लाइट पकड़नी थी तो हमें बुलाकर हमारा वक्त क्यों जाया किया.
जवाब तुरंत ही मिल गया. उन गायक महोदय ने अपनी जेब से अपनी एक रंगीन पोस्टकार्ड साइज फोटो हमें थमा दी और बोले कि आप अपनी मर्जी से जो भी चाहे छाप दीजिएगा. हमने जब इंकार किया तो उन्होंने हमारे सामने एक और विकल्प पेश किया. बोले कि ऊपर मेरी वाइफ रूम में हैं. उन्हें पता है कि मैं किस सवाल का क्या जवाब देता हूँ, आप उनसे मिलकर इंटरव्यू कर लीजिए. अब तक मेरा धैर्य जवाब दे चुका था. मैंने इससे साफ मना कर दिया और कहा कि मैं ऐसे काम नहीं करता. उन्हें एहसास हुआ कि कुछ गड़बड़ हो गई है. उन्होंने पंडित जी से उनका नाम पूछा. चतुर्वेदी शब्द सुनते ही उनका ब्राह्मणवाद जाग उठा और उन्होंने अपनी जन्मभूमि और वह सरनेम बताया, जो वह अपने नाम के साथ शायद ही कभी इस्तेमाल करते हों. उन्हें लगा कि ब्राह्मण कुलनाम बताकर वे हमें मना लेंगे. लेकिन पं. उमेश जी तो और भी उसूलों वाले आदमी ठहरे. उन्होंने भी ऐसा करने से मना कर दिया. तब तक उनकी साथी गायिका उन्हें आवाज देने लगी थी.
वह टैक्सी की ओर बढ़ गए और उनका फोटो लेकर हम टहलते-टहलते आईएनएस आ गए, जहाँ चाय के स्टाॅल पर गर्मागर्म चाय और मठरी खाकर नाश्ता किया और उस गायक को गालियाँ देते हुए अपना गुस्सा शांत किया.
वह फोटो अभी भी मेरे पास रखा है. कभी पुरानी फाइलें देखते हुए अचानक आँखों के सामने आ जाता है तो उस घटना की याद से अब गुस्सा नहीं आता, बल्कि हँसी आती है कि उस वक्त हम कितने तुनकमिजाज हुआ करते थे. तुनकमिजाजी का ऐसा ही एक और किस्सा अगली कड़ी में...