Friday, October 9, 2020

बातें—मुलाकातें: 23 (जगजीत सिंह)

जगजीत सिंह को चाहे आपने कैसेट के जरिए सुना हो या कंसर्ट में, उनकी रेशमी आवाज में आपको कभी कोई फर्क महसूस नहीं हुआ होगा. आप आँखें बंद करके जगजीत को सुनेंगे और तसव्वुर करेंगे तो आपको ऐसा लगेगा कि सिल्क का कुर्ता पहने और पशमीने की शॉल ओढ़े जगजीत वहीं आपके सामने मौजूद अपनी आवाज का जादू बिखेर रहे हैं.

लेकिन तसव्वुर और हकीकत में काफी फर्क होता है. जगजीत से वास्तविक जीवन में मिलना मेरे लिए एक हतप्रभ कर देने वाला अनुभव रहा है. 

जैसे एमआर सुबह से ही तलाश में लग जाते हैं कि आज किस डॉक्टर के यहाँ धावा बोला जाए, वैसे ही फ्रीलांस जर्नलिस्ट भी यही खोजते रहते हैं कि आज क्या स्टोरी हो सकती है. मैं इंटरव्यू किया करता था, इसलिए अखबारों पर बराबर नजर रहती थी कि कब कौन सी सेलिब्रिटी दिल्ली में है. उनके कार्यक्रमों के विज्ञापन छपते थे तो उनमें आॅफिशियल होस्ट का लोगो भी साथ होता था. इससे पता चल जाता था कि फलां शख्स फलां होटल में ठहरा हुआ है.

एक दिन ऐसे ही मैंने अखबार में जगजीत सिंह नाइट का विज्ञापन देखा. आॅफिशियल होस्ट देखा तो पता चला कि वह दिल्ली के रामकृ​ष्णपुरम स्थित होटल हयात, शायद अब उसका नाम बदल चुका है, में ठहरे हुए हैं. होटल फोन लगाया. जगजीत जी से कनेक्ट होने पर मैंने उन्हें बताया कि मैं नवभारत टाइम्स के लिए उनका इंटरव्यू करना चाहता हूँ. उन्होंने शाम के पाँच बजे का टाइम दिया.



मेरे पास उस समय तक 'मेरा सपना' के आठदस कॉलम प्रकाशित होकर इकट्ठा हो चुके थे तो मैं अक्सर जिसका इंटरव्यू करने जाता, उनकी कॉपी साथ ले जाता ताकि उन्हें समझाना आसान हो जाए कि उनके साथ इंटरव्यू किस तरह का होने वाला है. जगजीत सिंह के पास जाते हुए भी मैंने नमूने अपने साथ ले लिए और पाँच बजे हयात पहुँच गया. रिसेप्शन पे जाकर मैंने उन्हें बताया कि मैं जगजीत सिंह जी का इंटरव्यू करने आया हूँ. उन्होंने इंटरकॉम से उनके कमरे में फोन करके बताया. फिर मुझे कहा कि आप लॉबी में बैठिए, वो दस मिनट में आपको बुलाते हैं. मैं जाकर एक कोने में सोफे पर बैठ गया. 

यहाँ से मेरे एडवेंचर की शुरूआत हुई. दस मिनट बीते, पंद्रह मिनट बीते और जब बीस मिनट हुए तो मेरा सब्र जबाब दे गया. मैंने फिर से रिसेप्शन पर जाकर अपनी माँग दोहराई. इस बार उन्होंने मेरी बात कराई तो जवाब मिला कि होटल का अटेंडेंट तो देखकर गया, उसे आप नहीं मिले.

उन्होंने मुझे फिर से बैठने को कहा और मैं उसी जगह पर जाकर बैठ गया. पाँच मिनट बाद ही जगजीत सिंह के सहयोगी नीचे आए. पता नहीं उन्होंने कैसे अंदाजा लगाया, सीधे मेरे पास आकर मुझसे पूछा कि एक्सक्यूज मी, आर यू संदीप सौरभ? मेरे हाँ कहने पर उन्होंने मुझसे हाथ मिलाया और अटेंडेंट को बुलाकर लगे उसे डांटने कि ये तो यही हैं, तुम्हें कैसे नहीं मिले. वह अवाक सा मुझे देख रहा था. अब मेरी समझ में आया कि थोड़ी देर पहले एक अटेंडेंट हाथ में जो तख्ती लिए घूम रहा था, वो मेरे लिए थी. मुझे देखकर उसे लगा नहीं होगा कि इतना दुबलापतला, कम उम्र  लड़का पत्रकार हो सकता है, इसलिए वह मेरे पास नहीं फटका और मुझे उसका पता नहीं चल पाया.

खैर उनके साथ मैंने जगजीत जी के कमरे का रुख किया. वहाँ पशमीने की शॉल और झक्क सफेद सिल्क के कुर्ते वाले जगजीत सिंह का एक नया ही रूप सामने था, टीशर्ट और जींस पहने एक आम से पंजाबी प्रौढ का. मैं एकाएक तो उन्हें पहचान ही नहीं पाया. यह मेरे लिए दूसरा झटका था. खैर उनके सहयोगी ने मेरा उनसे परिचय कराया और मुझे ससम्मान सोफे पर बैठाया. जगजीत जी के सामने ब्रेड टोस्ट के पीस और काँच के गिलास रखे थे, जिनमें एक कत्थई द्रव भरा था. हालांकि मैं अभी भी श्योर नहीं कि वह व्हिस्की थी या लेमन टी, लेकिन उस समय मुझे वह शराब ही लगी थी

मैंने जगजीत सिंह को कॉलम के बारे में बताया और उन्हें सैंपल दिखाए. पॉपुलर कल्चर अखबारों में घुसपैठ कर चुकी थी और आम दर्शकों को जोड़ने के लिए कंटेंट पर काफी उकसाऊ किस्म के टाइटिल लगाये जाने लगे थे. मुझे क्या पता था कि ये सैंपल पेश कर मैंने अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मार ली है.

सपनों में लड़कियाँ भी होती थीं (सिद्धार्थ काक), मुझे लड़कियों के सपने कभी नहीं आए ( आशीष विद्यार्थी), इश्क किसी और के साथ करना चाहता था, सपने में किसी और के साथ... (खुशवंत सिंह) जैसे टाइटिल देखकर जगजीत सिंह भड़क उठे. उनका कहना था कि आप लोगों के पास लड़कियों के अलावा कोई और टॉपिक नहीं है क्या बात करने के लिए? मैंने शांति से उन्हें समझाया कि टाइटिल लगाने में मेरी कोई भूमिका नहीं रहती. इसके बाद इंटरव्यू शुरू हुआ. एहतियातन मैंने उनसे लड़कियों के बारे में कोई सवाल नहीं पूछा. फिर भी जाने क्यों, वे ज्यादातर सवालों पर झुंझला से रहे थे, तो मुझे बड़ी असुविधा हो रही थी.

इंटरव्यू से पहले मैं उनके बारे में कुछ लेख पढ़कर गया थाइसी का फायदा उठाते हुए मैंने उनसे एक सवाल पूछा कि तीस साल पहले जो जगजीत सिंह जेब में सिर्फ चार सौ रुपए डालकर मुंबई आए थे, आज के जगजीत सिंह उनसे किस तरह अलग हैं? यह सवाल सुनते ही साहेब एक बार फिर भड़क उठे, बोले कि सपनों के बीच में यह सवाल कहाँ से गया. इस बार उनका भड़कना मुझे गैरवाजिब लगा तो मैंने उनसे कहा कि अगर आप इस तरह हर सवाल पर गुस्सा करेंगे तो इंटरव्यू कैसे ले पाऊंगा. इससे बेहतर है आप जो चाहते हैं, वही बता दीजिए. मैं लिख लूँगा. अब वह थोड़ा नर्म पड़े और बोले, 'नहींनहीं...आपको जो पूछना है, पूछ सकते हैं.

लेकिन बारबार उनकी डांट सुनकर मेरा मूड आॅफ हो चुका था. इसलिए ज्यादा कुछ पूछते हुए जैसेतैसे इंटरव्यू खत्म किया. इसके बाद उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं चाय लेना पसंद करूंगा या कॉफी. मैंने कहा कि मैं दोनों ही नहीं पीता... इस पर उन्होंने प्लेट में रखे ब्रेड टोस्ट की तरफ इशारा करते हुए कहा कि ये तो ले लीजिए. इससे पहले जीवन में मैंने कभी भी ब्रेड टोस्ट नहीं खाया था, मन तो हुआ कि टेस्ट करूं, लेकिन मैं उनसे गुस्सा था, इसलिए टोस्ट भी नहीं लिया.

 जिस समय मैं उनसे विदा ले रहा था, उन्होंने एक बार फिर मुझे ताकीद की कि मैं अपने एडिटर को ढंग का टाइटिल लगाने के लिए कहूँ. मैं सहमति में सिर हिलाकर वहाँ से चला आया.

ऐसा लग रहा था कि जैसे मैं इंटरव्यू लेकर नहीं, अपनी रैगिंग करवाकर लौट रहा होऊं.

कई साल तक मेरी नाराजगी बरकरार रही. मेरा मन इस बात को कभी स्वीकार नहीं कर सका कि इतनी मीठी आवाज वाले शख्स के व्यवहार में इतनी कड़वाहट हो सकती है. फिर धीरेधीरे सोच और चीजों को देखने के तरीके में परिपक्वता आई तो समझ आया कि ये नाराजगी बेवजह है. यह समस्या तो सार्वजनिक जीवन जीने वाले किसी भी व्यक्ति के साथ हो सकती है कि वह निजी जीवन में अपनी पब्लिक इमेज को ओढ़े रख पाए.

जगजीत को इस नश्वर संसार से विदा लिए आज नौ साल हो चुके हैं. उनकी गजलों की समृद्ध विरासत भारतीय समाज में इतनी बहुतायत में बिखरी है कि लगता ही नहीं कि जगजीत हमारे बीच नहीं हैं. उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि.

interview



Thursday, October 8, 2020

बातें—मुलाकातें : 22 (उस्ताद अमजद अली खान)

ऐसे लोग बहुत कम होंगे, जिन्होंने सरोद का नाम सुना होगा. ऐसे लोग और भी कम होंगे, जिन्होंने सरोद सुना होगा, लेकिन ऐसे लोग यकीनन बहुत ही कम होंगे, जिन्होंने उस्ताद अमजद अली खान का नाम न सुना हो. सरोद और उस्ताद करीब छह दशकों से एक—दूसरे के पर्याय बने हुए हैं. मीडिया के कला—संस्कृति प्रेम वाले दौर में उस्ताद की भुवनमोहिनी मुस्कान अक्सर समाचार—पत्रों के पन्नों की शोभा बढ़ाती नजर आ जाती थी.



उस्ताद से मेरी मुलाकात नवभारत टाइम्स के लिए अपने कॉलम मेरा सपना के सिलसिले में ही ही हुई थी. फोन पर मुलाकात का वक्त मुकर्रर कर, उस्ताद के द. दिल्ली स्थित आलीशान बंगले पर पहुँचा. उस्ताद की विनम्रता और गर्मजोशी दिल को छू लेने वाली थी. मेहमाननवाजी की रिवायत को आगे बढ़ाते हुए शर्बत पेश हुआ. उस्ताद को मैंने बताया कि मैं किस तरह का इंटरव्यू करना चाहता हूँ. उन्हें विषय जानकर बहुत अच्छा लगा...
उन्हें अच्छा लगा, इसलिए इंटरव्यू भी बहुत अच्छा रहा. उन्होंने एक राग के बनने की प्रक्रिया को प्रसव जैसा बताया, जिसमें आह और वाह दोनों का अद्भुत समागम होता है. पूरी बातचीत बड़ी स्तरीय थी, जो बहुत कम इंटरव्यू में हो पाता है. मैं पूछता गया और उस्ताद मनोयोग से जवाब देते गए.
इंटरव्यू खत्म होने के बाद उन्होंने पूछा कि क्या हमने किसी और क्लासिकल म्युजिशियन का इंटरव्यू पब्लिश किया है. मैंने बताया कि कुछ अर्सा पहले पंडित रविशंकर जी की 75वीं वर्षगाँठ पर उनका इंटरव्यू छपा था, लेकिन वो मैंने नहीं किया था.
अचानक उन्होंने मुझसे पूछा ​कि मेरी उम्र कितनी है. पूछकर उन्होंने मेरी आँखों में झाँका.
मैंने कहा कि उनके चेहरे से तो उम्र काफी कम लगती है, लेकिन तजुर्बे को देखकर लगता है कि साठ साल होगी.
'अगले छह अक्टूबर को मैं पचास साल का हो रहा हूँ.' उन्होंने बताया.
उन्होंने कहा नहीं, लेकिन मैं समझ गया कि वह चाहते हैं कि उनके पचासवें जन्मदिन पर भी उनके बारे में कुछ छपे. अभी अक्टूबर में दस महीने का वक्त था, इसलिए मैंने बिना कोई वादा किए उनसे विदा ली.
अगले दिन उनका फोन आया, उन्होंने पूछा कि अभी मैंने इंटरव्यू पब्लिश करने के लिए तो नहीं दिया है. मुझे आशंका हुई कि कहीं वे इसे छापने से मना तो नहीं करने वाले. मैंने तब तक आधा इंटरव्यू ही लिखा था, इसलिए उन्हें बता दिया कि अभी लिख ही रहा हूँ. इस पर उस्ताद बोले कि आप मेरे सपनों के बारे में पूछ रहे थे ना. रात ही मैंने एक बहुत डरावना सपना देखा कि कुछ लोग ताजमहल पर चढकर उसे तोड़ रहे हैं. उन्होंने मुझसे इसरार किया कि अगर मुमकिन हो तो इस सपने को अपने राइटअप में एड कर दीजिए. मुझे इसमें क्या दिक्कत हो सकती थी, सिर्फ दो लाइने ही तो बढ़ानी थीं,बढ़ा दीं. इंटरव्यू छपा, ​मैंने उस्ताद को फोन करके बताया तो वो बोले कि मैं पेपर मँगा लेता हूँ. फिर पढ़कर आपको बताता हूँ. मुझे उम्मीद भी नहीं थी और उन्होंने बताया भी नहीं.
फिर मार्च में एक परिचर्चा के सिलसिले में उस्ताद को फोन किया और एक आदर्श महिला के बारे में उनसे उनके विचार पूछे. इस बार भी अनुभव काफी अच्छा रहा.
कुछ दिनों बाद इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में उस समय के मशहूर प्रोग्राम सुरभि की पार्टी थी. उसमें उस्ताद से मुलाकात हुई. मैंने उनकी ओर हाथ बढ़ाया तो उन्होंने हाथ तो मिलाया, लेकिन उसमें गर्मजोशी नदारद थी. मैंने उनसे पूछा कि क्या उन्होंने मुझे पहचाना. उन्होंने हाँ में इस तरह से गर्दन हिलाई, जैसे पहचाना तो नहीं था, लेकिन पीछा छुड़ाने के लिए हाँ बोला हो.
यह उस्ताद की भुवनमोहिनी छवि से मोहभंग का मेरा पहला मौका था. दूसरा मौका उनके जन्मदिन पर आया, जब मैंने उन्हें बधाई देने के लिए फोन किया.
अपना परिचय देते हुए मैंने उन्हें मुबारकबाद दी तो उन्होंने शुक्रिया कहा और फिर बोले कि ठीक है? यानी अगर विश कर दिया हो तो फोन रखूँ... यह उस्ताद से मेरी आखिरी बातचीत थी.

इन दो अनुभवों के बाद मेरा फिर कभी उन्हें संपर्क करने का साहस नहीं हुआ. अब सोचता हूँ तो लगता है कि किसी के बारे में इस तरह से एकतरफा राय पाल लेना कितना अहमकाना होता है. हमें समझना चाहिए कि रिच एन्ड फेमस लोगों के दिमाग मे एक ही समय हज़ारों तरह की बातें चल रही हो सकती हैं.

आज एक बार फिर उस्ताद की सालगिरह का मौका है तो मुझे वो बात याद आ रही है. लेकिन फिर भी उन्हें बहुत सारी शुभकामनाएं देने का मन कर रहा था तो मैंने फेसबुक पर उनके पेज पर इंटरव्यूज की कॉपी और शुभकामना संदेश भेज दिया. इस जवाब आ चुका है, 'बहुत—बहुत धन्यवाद संदीप जी.'
अलबत्ता आप दे​ख सकते हैं कि संयोग भी कैसे—कैसे रंग दिखाते हैं, पंडित रविशंकर जी की 75 वीं जयंती से प्रेरित होकर उस्ताद अमजद अली खान की 50 वीं जयंती पर कुछ विशेष लिखने की योजना, जो तब साकार नहीं हो पाई थी, आज उनकी खुद की 75 वीं जयंती पर पूरी हुई है.

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Sunday, September 27, 2020

बातें-मुलाकातें: 21 ( देेबब्रत बिश्वास)

दादा के नाम से संबोधित किए जाने वाले देेबब्रत बिश्वास जी एक ऐसे राजनेता हैं, जिन्हें उनके अनुभव और कार्यों से ही नहीं बल्कि शुचिता, मूल्यों और सि़द्धांतों वाली राजनीति के लिए भी बड़े सम्मान के साथ देखा जाता है. दादा आॅल इंडिया फाॅरवर्ड ब्लाॅक के महासचिव और प.बंगाल से चार बार सांसद रह चुके हैं. 



यह एक संयोग ही है कि 23 अगस्त को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की रहस्यमय गुमशुदगी को 75 साल पूरे हुए हैं और आज 28 सितंबर को दादा का भी 75 वां जन्मदिन है. आप सोच रहे होंगे कि दोनों बातों में क्या संबंध है. दरअसल, यह दादा ही हैं, जिन्होंने लंबे समय तक नेता जी की गुमशुदगी या ताइपे की विमान दुर्घटना में तथाकथित मृत्यु का सच देश के सामने लाने के लिए लगातार सरकार पर दबाव बनाए रखा है और इसके लिए निजी स्तर पर भी काफी प्रयास किए हैं. 

मेरा दादा से संपर्क इसी सिलसिले में हुआ था... 2002 की बात है, मैं उन दिनों दैनिक भास्कर के पत्रिका विभाग में था. उस समय केंद्र में राजग की सरकार थी और उसके द्वारा गठित जस्टिस मुखर्जी आयोग नेता जी की मृत्यु से जुड़े तथ्यों और सत्यों की जाँच कर रहा था. मैंने सुझाव दिया कि इसपर एक अच्छी और विस्तृत स्टोरी की जा सकती है. 

उन दिनों इस मामले में देबब्रत जी और उनके फाॅरवर्ड ब्लाॅक का नाम काफी चर्चा में था. मुझे लगा कि उनसे मिला जाए तो काफी अच्छी जानकारियां मिल सकती हैं. उनसे समय लेकर मैं उनके घर पहुँच गया. उन्होंने मेरे लिए चाय मंगा ली और फिर हमारी नेता जी के मुद्दे पर बातचीत शुरू हो गई. मैंने इस बारे में पहले से कुछ स्टडी कर रखी थी तो यह बातचीत काफी अच्छी रही और कुछ हद तक लंबी भी. 

इसके बाद उन्हें पता नहीं क्या सूझा, वे उठे और एक बहुत मोटी फाइल लाकर मुझे थमा दी. यह उन सब बयानों और साक्ष्यों की प्रतियों की फाइल थी, जो मुखर्जी आयोग के सामने अब तक की सुनवाईयों में पेश किए गए थे. मुझे तो जैसे खजाना मिल गया. यह बिल्कुल वैसे ही था,जैसे आप जाएं एक रुपए के लिए और मिल जाएं सौ रुपए. 

उन्होंने मेरा उल्लास ताड़ लिया और बोले कि आज जब तक चाहें आराम से यहाँ बैठिए और इस फाइल से नोट्स तैयार कर लीजिए. उन्होंने बताया कि वह निकल रहे हैं, लेकिन उनका एक आदमी घर पर ही है, मुझे किसी भी चीज की जरूरत हो तो मैं उससे कह सकता हूँ.

उनका यह स्नेह और सहयोग भावना मुझे अभिभूत कर गई. मैं तीन-चार घंटे उनके घर पर रहकर नोट्स तैयार करता रहा और फिर एक ऐसी स्टोरी तैयार हुई, जिसे मैं अपने पत्रकारीय लेखन की सर्वश्रेष्ठ रचनाओं में से एक मानता हूँ. 

रिपोर्ट पब्लिश होने के बाद मैंने दादा को उसकी सूचना दी और उनके सहयोग के लिए उनका आभार व्यक्त किया, जिसके बिना यह स्टोरी कभी मुमकिन न होती.

बाद में मुखर्जी आयोग के निष्कर्षों सामने आए, जिनमें आयोग ने उस दुर्घटना की वास्तविकता पर संदेह प्रकट किया था. लेकिन, तत्कालीन सरकार ने इन निष्कर्षों को मानने से इंकार कर दिया. हालांकि इस मामले में अब बहुत सारे दस्तावेज सार्वजनिक किए जा चुके हैं, लेकिन अभी भी यह सवाल अपनी जगह कायम है कि आखिर नेता जी के साथ क्या हुआ था.

आज दादा के जन्मदिन पर उन्हें हार्दिक बधाई. वे हमेशा स्वस्थ रहें, सक्रिय रहें यही शुभकामना है.



बातें—मुलाकातें : 20 (राहुल देव)

अपने  समय के टॉप इंडियन मेल मॉडल रहे राहुल देव ने अपने फिल्मी कैरियर का आगाज सनी देओल अभिनीत फिल्म चैंपियन के साथ किया था, जिसमें उन्होंने एक खूंखार खलनायक की भूमिका की थी. इसके बाद से वे बहुत सारी हिंदी और दक्षिण भारतीय फिल्मों में नायक—सहनायक—खलनायक की भूमिका में नजर आए हैं और उनका कामयाबी का सफर बदस्तूर जारी है.


प्रोफेशनल लाइफ में आपका संपर्क बहुत सारे लोगों से होता है. लेकिन उनमें ज्यादातर से आपके रिश्ते बहुत वक्ती होते हैं. ऐसे कुछ ही लोग होते हैं जिनसे आपके रिश्ते साल—दर—साल चलते जाते हैं. राहुल देव ऐसे ही लोगों में से एक हैं, जिनसे मेरे रिश्तों को वक्त की धूल ने कतई धुंधला नहीं होने दिया है. दो दशक से भी ज्यादा बीत चुके हैं, जब हम पहली बार मिले थे. विषय वही था, मेरा सपना.

राहुल को फोन किया तो पता चला कि वह तो हमारे घर के पास ही रहते थे. हम मालवीय नगर में रहते थे और वह साकेत में...करीब डेढ़—दो किलोमीटर की दूरी पर. मिलने का टाइम फिक्स हुआ और मैं घूमते—घूमते, ढूंढते—ढूंढते उनके घर पहुँच गया. वहाँ राहुल तो नहीं मिले, पर उनके पिता जी से सामना हो गया. उनकी उर्दू बड़ी नफीस थी. उन्होंने पूछा कि क्या आपका राहुल से मुलाकात का वक्त मुकर्रर हुआ था. मेरे हाँ कहने पर वे बोले कि फिर तो वह आता ही होगा. और कुछ ही देर में राहुल वहाँ पहुँच गए. इंटरव्यू हुआ, बड़ा अच्छा हुआ. मैंने कहा कि मैं पास ही रहता हूँ तो राहुल बोले कि फिर तो आप कभी भी आ—जा सकते हैं. और यह आना—जाना शुरू हो गया. कई बार अलग—अलग विषयों पर इंटरव्यू के लिए और कई बार यूं ही...


इसी दौरान मैं स्क्रिप्ट राइटर के तौर पर कबीर कौशिक (सहर, चमकू, हम तुम और घोस्ट, मैक्सिमम जैसी फिल्मों के निर्देशक) के संपर्क में आया जो उन दिनों दूरदर्शन के लिए खामोश नाम का एक टीवी सीरियल बना रहे थे. पता लगा कि उसमें राहुल लीड रोल में थे. तो हमारा एक रिश्ता और जुड़ गया.


इसके समांतर बहुत सारी बातें चलती रहीं. राहुल के परिवार के सभी लोग इतने मिलनसार थे कि मैं जब भी वहाँ जाता, मेरे साथ एक फेमिली मेंबर जैसा व्यवहार होता.
एक दिन राहुल ने कहा कि आपके लिए एक खुश—खबरी है. उन्होंने मुझे मिठाई खिलाई और कहा कि आपको भतीजा हुआ है. वहीं से वे लोग अस्पताल जा रहे थे, उन्होंने कहा कि आप भी साथ चलिए. रास्ते में मैंने उनके पापा से हुई पहली मुलाकात का जिक्र किया तो उनकी मम्मी ने हँसते हुए बताया कि हाँ, उनकी उर्दू वाकई बहुत अच्छी है. अदालत में तो एक बार जब वे किसी मामले में पैरवी कर रहे थे तो जज तक ने कहा था कि मि. देव, आपकी दलीलें कैसी भी हों, लेकिन आपकी उर्दू बहुत शानदार है. राहुल ने मुझे बच्चे के लिए कोई नाम सजेस्ट करने के लिए कहा, मैंने सिद्धार्थ और सिद्धांत नाम सुझाए. जो सभी को बहुत पसंद आए. मेरा सिद्धांत पर ज़्यादा जोर था पर सिद्धार्थ और राहुल, दोनों नाम एक—दूसरे के पर्यायवाची लगते थे इसलिए बहुमत सिद्धार्थ के पक्ष में रहा.
राहुल से अक्सर बातें और मुलाकातें होती रहीं और यह सिलसिला उनके मुंबई चले जाने तक चला. फिर इसमें से मुलाकातें गायब हो गईं, लेकिन बातें चलती रहीं. कई बार हम लोगों ने बहुत निजी मामलों पर भी चर्चा की है और मुझे यह एहसास काफी खुशी भी देता है कि राहुल मुझ पर इतना विश्वास करते हैं कि कुछ भी शेयर कर लेते हैं. राहुल से मैंने एक चीज सीखी है, वह है खुद को लगातार रिइन्वेंट करते रहना. उनके इस शानदार सफर और कामयाबी का शायद यही रहस्य है, जिसने उन्हें इतने सालों में कभी हाशिए पर नहीं जाने दिया है.
एक बार मैंने उनके एक पुराने इंटरव्यू, जिसमें उन्होंने कहा था कि उनकी दिली इच्छा है कि वे फैंटम की गुफा में जाएं और फैंटम से मिलें, का जिक्र करते हुए पूछा कि क्या इतने सालों बाद आज भी उनकी यह लाइफ फेंटेसी है... तो उनका जवाब था कि 'बिल्कुल सौरभ, अभी भी है.' कबीर और राहुल, सिर्फ दो ही लोग हैं, जो आज भी मुझे मेरे पुराने पेन नेम 'सौरभ' से संबोधित करते हैं.
आज उनका जन्मदिन है, हमारी शुभकामना है कि वे यूं ही सक्रिय और ऊर्जावान बने रहें और एक दिन फैंटम की गुफा में जाकर फैंटम से जरूर मिलें, ताकि हम भी उनसे पूछ सकें कि फैंटम वास्तव में कैसा लगता है.

Thursday, September 24, 2020

बातें—मुलाकातें : 19 (बिशन सिंह बेदी)

अपने समय के बेहद मशहूर क्रिकेटर और स्पिनर बिशन सिंह बेदी आज 74 साल के हो गए हैं. 1966 से 1979 तक टेस्ट क्रिकेट खेलने वाले और फेमस स्पिनर चौकड़ी का हिस्सा रहे बेदी ने 22 टेस्ट मैचों में भारत की कप्तानी की है. 

बेदी को हमेशा एक रंगीन पटका पहनने और बेबाकी से क्रिकेट पर अपने विचार रखने के लिए भी जाना जाता है. जैसे कि अभी हाल ही में उन्होनें यह कहा कि मुरली अब हजार विकेट पूरा करने वाले हैं लेकिन मेरी नज़रों में यह सिर्फ रन आउट ही है. इससे पहले वे सुनील गावस्कर को विनाशकारी प्रभाव और टेस्ट क्रिकेट को टी-20 क्रिकेट को "क्रिकेट की सबसे अशिष्ट अभिव्यक्ति कह चुके हैं.  1990 में वह कुछ अर्सा भारतीय क्रिकेट टीम के कोच भी रहे हैं.  एक क्रिकेट दौरे के बाद जहां भारत ने खराब प्रदर्शन किया था, उन्होनें एक बड़ी प्रसिद्ध धमकी दी कि वे पूरी टीम को वापसी की यात्रा में नदी में डुबो देंगे. 

अक्सर अपनी इस शैली की वजह से वे अनाश्यक विवादों में भी घिर जाते हैं, ऐसे बहुत से उद्धरण हैं, लेकिन इनका जिक्र मुनासिब न होगा. 

जहाँ तक उनके साथ मेरे अनुभव का सवाल है तो उनके साथ इंटरव्यू मेरे किए गए कुछ बेहद नीरस इंटरव्यूज में से एक है. यह मुलाकात उनके कस्तूरबा गांधी मार्ग , दिल्ली स्थित आॅफिस में हुई थी, जहाँ वे एक सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम में अधिकारी के रूप में कार्यरत थे. 

जितनी देर हम एक साथ रहें, वहाँ सारी गर्मजोशी उनकी मंगाई चाय तक ही सीमित रही. वह बामुश्किल मुस्कराते थे और हर सवाल का बहुत नपा—तुला जवाब देते थे. शायद वह इतने व्यक्तिगत किस्म के सवालों का जवाब देते हुए असहज अनुभव कर रहे होंगे. खैर, आज उनके जन्मदिन के मौके पर उन्हें बहुत सारी शुभकामनाएं, वे स्वस्थ रहें, दीर्घायु हों...

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