Sunday, March 3, 2013

इमेज के सहारे ब्रांड की बिक्री


वर्षों से तरह-तरह के उत्पादों को बेचने के लिए कंपनियों द्वारा मशहूर हस्तियों का सहारा लिया जाता रहा है. ये हस्तियां ज्यादातर फिल्म, खेल (खासकर क्रिकेट) जैसे आम रुचि के क्षेत्रों से ताल्लुक रखने वाली होती हैं. ऐसी हस्तियां, जिनके बारे में यह माना जाता है कि वे अपने कद्रदानों के कंज्यूमर बिहेवियर को मोटिवेट, इन्फ्ल्युएंस या चेंज करने में सक्षम हैं. लक्स, इस मानसिकता का एक सबसे बड़ा कामयाब उदाहरण है, जिसने करीब सात दशकों से फिल्मी सितारों का सौंदर्य साबुन होने की दावेदारी को बनाए रखा है. ऐसे बहुत से उत्पाद हैं, जिनके मॉडल सेलिब्रिटीज हैं. और बावजूद लोगों की इस चिरशंका के, कि वे खुद शायद ही कभी उन उत्पादों को इस्तेमाल करते हों जिनका कि वे प्रचार करते हैं, वे लोगों को बहलाने में लगभग कामयाब ही रहे हैं. 

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लेकिन, पिछले दो-तीन दशकों में यह परिदृश्य काफी बदल चुका है. विकल्पों और ओवरएक्सपोजर के इस दौर में सेलिब्रिटीज का अनुसरण करने करने की आम प्रवृत्ति घट रही है. अब हर शख्स अपने उठाए हर कदम का फैसला खुद करना चाहता है, सुझाए नुस्खों को आजमाने की बजाए खुद नए प्रयोग करना चाहता है. जरूरी नहीं कि वह वही साबुन या शैंपू इस्तेमाल करे, जो उसका प्रिय खिलाड़ी या फिल्मी सितारा करता है. ऐसे में विज्ञापन की दुनिया ने एक नया पैंतरा आजमाना शुरू किया है, सेलिब्रिटीज की सितारा हैसियत की बजाए उनकी पॉपुलर इमेज को कैश करने का. 

इसमें सबसे आगे हैं, नवाब सैफ अली खान पटौदी जिनकी प्लेब्वाय की पॉपुलर इमेज को उनके किए अस्सी फीसदी विज्ञापनों में कैश होते देखा जा सकता है. करीना से उनके रोमांस के दो-तीन सालों में न सिर्फ उनकी इस छवि, बल्कि इस ओवरहाइप्ड रिश्ते का भी भरपूर दोहन किया गया है. इसी तरह अक्षय कुमार अपनी एक्शन किंग की फिल्मी इमेज का फायदा विज्ञापनों में भी उठाते नजर आते हैं. कहीं वे एक कोल्डड्रिंक के लिए पहाड़ से छलांग लगाते हैं तो कहीं एक साथ दस-दस शोहदों के छक्के छुड़ाते हैं. इसी प्रकार का दोहन हम खान त्रयी के अधिकतर विज्ञापनों को देख सकते हैं. सलमान खान के विज्ञापनों में वे अपनी ऑनस्क्रीन छिछोरेपन और चुलबुलेपन की मिली-जुली छवि के साथ उपभोक्ताओं को रिझाते देखे जा सकते हैं, तो शाहरुख का रीयल लाइफ का,गलती से आत्मविश्वास समझ लिए जाने वाले अहंकार को प्रदर्शित करता चेहरा विज्ञापनों में भी उसी अकड़ के साथ नजर आता है. इन दोनों के विपरीत तीसरे खान यानि आमिर की रीयल लाइफ की सहजता वाली छवि विज्ञापनों में भी उपभोक्ताओं से उसी सहजता से पेश आती नजर आती है और मि. परपेक्शनिस्ट का टैग वे विज्ञापनों में भी उसी नफासत के साथ कैरी करते हैं. रणवीर की अलमस्त सम्पन्नता, हृतिक रोशन की अतिआत्मविश्वास से भरपूर अभिजात्यता, जूही का चुलबुलापन, करीना कपूर का नकचढ़ापन, कैटरिना का एलियन लुक और लैंग्वेज,  दर्शकों को उबासियां लेने को को मजबूर करता अभिषेक बच्चन का बुजुर्गाना शैथिल्य...ऐसी अनेक छवियां हैं, जो विज्ञापन की दुनिया में बड़ी चालाकी से कैश की जा रही हैं. फिल्मी हस्तियों की छवियों को भुनाना अपेक्षाकृत आसान होता है, क्योंकि ये पहले ही दर्शकों/उपभोक्ताओं के दिमाग में स्थापित हो चुकी होती हैं. लेकिन, नॉन फिल्म सेलिब्रिटीज के मामले में यह थोड़ा जोखिम भरा हो सकता है....और कुछ मामलों में शायद मूर्खता भरा भी.

विख्यात तबलावादक जाकिर हुसैन को संगत देती चाय ताज का विज्ञापन सालों तक सफलतापूर्वक चला, जिसमें वे अपनी सफलता का श्रेय ताज को देते नजर आते थे और वाह उस्ताद की जगह कद्रदानों से, विनम्रतापूर्वक वाह ताज बोलने का इसरार करते थे. लेकिन, एक बार चूक हो गई. उस्ताद की उस्तादी कुछ ज्यादा ही हो गई और ताज से बेहतर चाय लाकर दिखाने  पर तबला बजाना छोड़ देने के ऐलान से शुरू हुए प्रचार गिमिक ने न जाने कैसे पहले अफवाह और फिर खबर की शक्ल ले ली और इसे लेकर कलाजगत में उस्ताद को काफी भर्त्सना झेलनी पड़ी. इस तरह पूरा कैंपेन बाउंस बैक कर गया और फिर बाद में ताज के विज्ञापनों में तबले की थाप सुनाई  ही देनी बंद हो गई. 

लेकिन, ऐसा कभी-कभी ही होता है. वर्ना ऐसे प्रयोगों का अधिकतम जोखिम इतना ही होता है कि ये बेअसर रहें और विज्ञापन अथवा उत्पाद को अपेक्षित सफलता न दिला पाएं. शाकाहार को प्रमोट करते एक विज्ञापन अभियान में टी.एन.शेषन सरीखे आक्रामक नौकरशाह का हाथ में गाजर लेकर राजनेताओं को कच्चा चबाने का दावा करना, चेहरे के दाग-धब्बे मिटाने वाली एक क्रीम के विज्ञापन में बेदाग छवि वाली पहली महिला आईपीएस किरण बेदी, पेन के विज्ञापन में राइटिंग और फाइटिंग का घालमेल करते शायद जावेद अख्तर ऐसे ही कुछ बेअसर प्रयोगों का उदाहरण हैं. 

सच तो यह है कि छवियों का इस्तेमाल बहुत संवेदनशीलता और सतर्कता की मांग करता है. वर्ना कई बार ये इतनी शक्तिशाली हो जाती हैं कि उत्पाद और विज्ञापन, दोनों उनके आगे बौने हो जाते हैं. जैसा कि बीते साल एक पंखे के विज्ञापन में हुआ, जिसमें गुजरे जमाने के सुपरस्टार राजेश खन्ना, आनंद शैली में मुझसे मेरे फैन कोई नहीं छीन सकता बाबू मोशाय! कहते नजर आए. विज्ञापन का संदेश और ब्रांड, दोनांे उनके नोस्टेल्जिक मैनेरिज्म की छाया में छिप गए और इस एक्स सुपरस्टार का पहली बार किसी विज्ञापन में आना, विज्ञापन से ज्यादा चर्चित हो गया. 

ऐसा कभी भी हो सकता है, क्योंकि छवियां तो छवियां हैं, जो वक्त के हिसाब से अपना आकार बदलती रहती हैं और रंगरूप भी. इनकी सवारी वही कर पाता है, जो इनकी इस फितरत के रोम-रोम से वाकिफ हो. वर्ना तो छवियां कब अपने सवार को मैदाने जंग में पटखनी खिला दें, कोई नहीं बता सकता.

Sunday, January 20, 2013

सुगंध से आती सड़ांध


सुगंध और इंसान का रिश्ता बहुत पुराना है. इंसान ही क्यों, अनेक जीव-जंतुओं के जीवन में भी सुगंध एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. खासकर जब अपोजिट सेक्स के बीच के आकर्षण की बात चलती है तो यह सुगंध किसी दूत की तरह भावनाओं का सम्प्रेषण करने से भी पीछे नहीं हटती. दूसरे शब्दों में कहें तो खुशबू कुदरत की वह देन है, जो इंसान और अनगिनत प्राणियों के जीवन को तरह-तरह से महकाती है-कभी खाने की खुशबू , कभी फूलों की खुशबू, कभी पूजा की खुशबू तो कभी प्यार की खुशबू. 


ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब सुगंध बाजार में उतरती है, तो अपनी सारी गरिमा को तजकर एकदम बाजारू क्यों हो जाती है? क्या बिकने के लिए बाजारू होना जरूरी है? अगर नहीं तो क्यों सारी परफ्यूम्स और डियोज के विज्ञापन इसकी भूमिका को सिर्फ महिलाओं को आकर्षित करने तक सीमित करने वाले सिंगल ट्रैक पर चलते नजर आते हैं? किसी विज्ञापन में चाकलेट से बने एक पुरुष के विभिन्न अंगों को महिलाएं नोच-नोचकर खाती हैं, किसी में पुरुष नायक एक परफ्यूम इस्तेमाल करता है और उसे परियां अथवा पराग्रही नारियां आकर घेर लेती हैं. एक और विज्ञापन में युवा नायक द्वारा इस्तेमाल डियो की खुशबू एक नवविवाहिता स्त्री के मन को डगमगा रही है, तो किसी में अपने पति की बेवफाई से खफा महिला उसकी परफ्यूम की शीशी को घर के बाहर बैठे एक भिखारी की ओर फेंक देती है और अगले फ्रेम में पति की प्रेमिका उस भिखारी की ओर बढती दिखाई देती है. 

ये और इन जैसे अनेक विज्ञापन दो ऐसे मिथक स्थापित करने का असफल प्रयास करते हैं, जिन पर शायद ही कोई यकीन करे. एक, सुगंध सिर्फ महिलाओं को आकर्षित करने के लिए अस्तित्व में है और दूसरा यह कि महिलाओं को आकर्षित करने के लिए सिर्फ एक ब्रांडेड परफ्यूम ही काफी है. जबकि वास्तविकता यह है सुगंध नर और मादा के मन में प्रेम व कामभावना उत्पन्न करने में समान भूमिका निभाती है (भले ही इस प्रोसेस की टाइमिंग और टाइप अलग-अलग हों)  और कोई भी महिला सिर्फ परफ्यूम के आधार पर किसी भिखारी से संबंध नहीं बनाएगी.

इस तरह ये विज्ञापन दोधारी तलवार की तरह, दोनों प्रकार से स्त्री की गरिमा को धूमिल करते हैं. ये न सिर्फ उसके विवेक को उसकी कामुकता के सामने खारिज करते हैं, बल्कि उसकी उपलब्धता को एक परफ्यूम की शीशी जितना सस्ता साबित करने की धृष्टता से भी बाज नहीं आते. अनेक सांस्कृतिक और नारीवादी संगठनों/व्यक्तियों द्वारा समय-समय पर ऐसे विज्ञापनों के खिलाफ आपत्तियां भी दर्ज कराई गई हैं, और इनके प्रसारणों पर रोक लगाने के आश्वासन भी दिए गए हैं. लेकिन, नतीजा ढाक के ढाई पात जैसा ही है और इनका प्रसारण बदस्तूर जारी है.

ऐसे विज्ञापनों की भरमार का एक और निराशाजनक पहलू यह है कि इनकी भीड़ में शालीन किस्म के परफ्यूम एड नेपथ्य में चले जाते हैं. शायद उनका हश्र अनेक बहुत सारे सुगंध उत्पादों के निर्माताओं को सेफ जोन में रहते हुए चलने के लिए बाध्य करता है और वे भी अपने प्रतिद्वंद्वी को पछाड़ने के लिए उससे भी ज्यादा बोल्डनेस अपनाने को तरजीह देते हैं. इसका अर्थ यह नहीं कि गंदगी की इस बाढ़ को रोका नहीं जा सकता. बस जरूरत थोड़ी सख्ती और साहसिक कदम उठाने की है. रचनात्मकता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बिना पर किसी को भी पूरी संस्कृति को प्रदूषित करने की आजादी तो नहीं ही दी जा सकती.

यह सही है कि वैज्ञानिक शोध भी इस बात की पुष्टि करते आ रहे हैं कि प्रेम, आकर्षण और यौन संबंधों में सुगंध की भूमिका को हल्के में नहीं लिया जा सकता. लेकिन, ऐसी खुशबू शायद ही अभी तक अस्तित्व में आई हो, जो इस काम को सेकेंडों में अंजाम दे सके. खुशबू तो जितनी तेजी से फैलती है, उतनी ही तेजी से वायुमंडल में विलुप्त भी हो जाती है. लेकिन, पे्रम आगे बढ़ने में अपना समय लेता है. जाहिर है कि अगर सिर्फ परफ्यूम के सहारे दुनिया ( आधी दुनिया) को फतह करने के मिशन पर चलेंगे तो कोई नहीं जानता कि कितना परफ्यूम हवा में रहेगा, कितना बॉडी पे और खुशबू कब तक चलेगी. 

चलते-चलते

क्यों न खुशबू की भूमिका के बारे में कुछ और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित बातें जान ली जाएं!
1. निर्विवाद रूप से सुगंध नर और मादा के बीच अंतरंगता और प्रेम को प्रोत्साहित करती है.
2. पुरुष महिलाओं की देहगंध को माह के उस समय ज्यादा पसंद करते हैं, जब वे अधिक फर्टाइल होती हैं. 
3. महिलाएं ऐसे पुरुषों की गंध को पसंद करती हैं, जिनकी जेनेटिक्स उनके खुद के समान हो, लेकिन बहुत ज्यादा समानता विपरीत प्रभाव छोड़ जाती है.
4. ऑव्यूलेटिंग महिलाओं को डोमिनेंट पुरुषों की गंध ज्यादा  भाती है.
5. अंगूर की सुगंध की मौजूदगी में पुरुषों  को महिलाओं के फोटोग्राफ्स देखते हुए वे अपनी वास्तविक उम्र से औसतन छह साल छोटी नजर आती हैं.
6. परीक्षण किए हुए सभी 26 एरोमा, सबसे ज्यादा लवेंडर की खुशबू, पुरुषों की यौनेत्तजना को बढ़ाते हैं, जबकि महिलाएं मुलैठी की कैंडी, बेबी ऑयल जैसे कुछ एरोमा से उत्तेजित होती हैं, वहीं मेल कोलोन, भुने मांस और चेरी जैसे एरोमा बैकफायर करते हुए उन्हें टर्न ऑफ कर देते हैं.


संदीप अग्रवाल 
नागपुर 

Friday, December 14, 2012

छोटे मियां सुभानअल्लाह !


एक पुरानी कहावत है कि हर वयस्क व्यक्ति के भीतर एक बच्चा हमेशा जिंदा रहता है, जिसे बाहर आने के लिए सिर्फ एक अदद बहाने की जरूरत होती है. लेकिन, विज्ञापनों की दुनिया ने बच्चों में वयस्कों को खोज निकाला है. न सिर्फ खोज निकाला है, बल्कि उन्हें अपने वयस्क आचरण और सोच का प्रदर्शन करने के लिए कई माकूल मौके और बहाने भी दिए हैं. इन दिनों चल रहा एक शॉपिंग साइट के एड कैंपेन को देखकर इस आचरण को भलीभांति समझा जा सकता है, जिसमें बच्चे बड़ों की तरह मूंछ लगाए, साड़ी पहने उनके जैसा ही धीर-गंभीर आचरण करते नजर आते हैं. 

यूं तो बचपन, हमेशा से ही विज्ञापनों का प्रिय विषय रहा है और विज्ञापनों में उनकी मासूम बातों, बालसुलभ गतिविधियों का बहुतायत में इस्तेमाल भी किया गया है. लेकिन, पहले यह सब सिर्फ बच्चों के लिए बने उत्पादों, जैसे कि एनर्जी ड्रिंक्स, बिस्कुट, चाकलेट, चिप्स, स्टेशनरी, खिलौनों,  किताबों आदि के लिए किया जाता था. ज्यादातर, ऐसी चीजें जिन्हें खरीदने का फैसला करने में बहुत अक्ल लगाने की जरूरत नहीं पड़ती थी. लेकिन, ऐसे विज्ञापनों में उनकी भूमिका बड़ों की मिमिक्री करने या टीचर के साथ शरारत करने जैसी बातों तक ही सीमित रहती थी. 

इसके बाद के दौर में विज्ञापनों ने बालहठ की प्रवृत्ति का दोहन करना शुरू किया और उन्हें ऐसे उत्पादों के विज्ञापनों में भी इस्तेमाल करने लगे, जो विशेषतः बच्चों के लिए न होकर पूरे परिवार के लिए होते थे. विज्ञापनों में सर्फ-साबुन जैसी मामूली चीजों से लेकर टीवी, कार, बाइक, फ्रिज जैसी कीमती चीजों तक को खरीदने के फेसलों में उन्हें हस्तक्षेप करते दिखाया जाने लगा. जिसने भारतीय, खासकर मध्यवर्ग परिवारों में बच्चों को डिसीजनमेकर्स की भूमिका में ला दिया. विज्ञापन में हमउम्र बच्चों को निर्णायक की भूमिका निभाते देखते बच्चे वास्तविक जीवन में भी वैसी ही भूमिका निभाने लग गए. इस चलन पर अनेक बार अनेक आपत्तियां भी उठीं कि वयस्कों के काम आने वाली चीजों में बच्चों का इस्तेमाल इमोशनल ब्लैकमेलिंग को बढ़ावा दे रहा है, लेकिन समय के साथ-साथ ऐसी आपत्तियां अपने आप ही आउट ऑफ फैशन भी होती गईं.


मगर  अब बात सिर्फ इतने तक ही सीमित नहीं रही है. अब बच्चे सिर्फ स्क्रीन पर दिखने भर के लिए बच्चे हैं. वे गुडि़यों का विवाह करने की उम्र में खुद रोमांस करते नजर आते हैं, जिन चीजों का एबीसी भी शायद उन्हें मालूम न हो, उन्हें लेकर बड़ों को बेवकूफ साबित करते दिखाई दे जाते हैं. बीते दिनों एक मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनी के विज्ञापन को लेकर बहुतों की भृकुटियां तनी थीं, जिसमें सीढि़यों पर तन्हाई में रोमांस करते एक प्रीटीन ‘कपल’ को डिस्टर्ब करने आ रहे एक बूढ़े को, एक कुत्ता ऊपर नहीं आने देता. इसी एड के प्रीक्वल में यही कुत्ता, लड़की का स्कार्फ ले जाकर लड़के को देता है और उनके बीच प्रेम का सूत्रपात करता है. 

आज के विज्ञापनों में वे स्टेटस सिंबल्स को लेकर अपने पैरेंट्स से ज्यादा कॉशस हैं. एक बाइक के नए एड में अपने पिता का ‘चलता है’ वाला एटिट्यूड देखकर बच्चे का पारा चढ़ता जाता है और जब उसका सब्र जवाब दे जाता है तो वह बाप को ही झाड़ देता है कि अब बोलो चलता है. एक इंश्योरेंस कंपनी के एक विज्ञापन में बच्चा अपने चाचा को सलाह देता है कि उसे कौन सा प्लान लेना चाहिए और कैसी गर्लफ्रैंड से शादी करनी चाहिए. 

इस तरह के विज्ञापनों को लेकर समाज में ही नहीं, विज्ञापन जगत के पेशेवरों के बीच भी दो किस्म के मत प्रचलित हैं. पहली धारा मानती है कि आज के बच्चे अब पहले जैसे नहीं रहे, उनसे मासूमियत छीनने वाली और भी बहुत सारी चीजें हैं. इसके लिए सिर्फ विज्ञापनों को ही कटघरे में नहीं खड़ा किया जाना चाहिए. वहीं दूसरी धारा बच्चों के इस तरह के अनुपयुक्त इस्तेमाल के पक्ष में नहीं है. पिछले साल, इस मुद्दे पर काफी बहस के बाद, कुछ कंपनियों ने मिलकर एक प्रतिज्ञापत्र पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें कहा गया था कि वे ऐसे उत्पादों में विज्ञापनों में बारह साल से कम उम्र के बच्चों का इस्तेमाल नहीं करेंगे, जिनका संबंध उनकी पोषण आवश्यकताओं से हो. यह प्रतिज्ञा खासकर फूड सप्लिमेंट्स के विज्ञापनों के संदर्भ में थी, लेकिन ऐसे प्रतिज्ञापत्र की जरूरत बच्चों को  फीचर करने वाले सभी किस्म के विज्ञापनों के लिए जरूरी है.

संदीप अग्रवाल
नागपुर

सरहदें लांघता स्वाद

हमारी दुनिया में ऐसी बहुत सारी चीजें हैं, जो इंसान की बनाई भौगोलिक सीमाओं की बंदिशें मानना जरूरी नहीं समझतीं. जैसे कि, मोहब्बत, पंछी, बादल, हवा, नदिया...इन्हीं की तरह स्वाद भी एक ऐसी ही चीज है, जो बिना वीजा, बिना पासपोर्ट कहीं भी पहुंच सकता है. विज्ञापनों की दुनिया ने तो स्वाद के इस सफर को इतना लंबा कर दिया है कि हर मंजिल, महज एक मुकाम सी लगती है. वे देशों, महाद्वीपों की सीमाओं को तो कभी का लांघ चुके हैं, इन दिनों ब्रह्मांड की सीमाओं को लांघ रहे हैं.   


चाय से चिप्स तक, चाकलेट से  टूथपेस्ट तक, कोल्डड्रिंक्स से बर्गर तक...स्वाद हर जगह अपनी सरहदों को पार करने को उतावला नजर आता है. कहीं किसी अंजान से देश के सभ्यता से कोसों दूर रह रहे भूखों  के मुरझाये चेहरे किसी पिज्जा को देखकर फूलों से खिल उठते हैं तो कहीं किसी दूरस्थ प्रांत के बच्चे किसी कोल्ड ड्रिंक को पाकर एक अपरिचित सी भाषा में अपनी खुशी का इजहार करते नजर आते हैं. यह स्वाद ही तो है, जो परिवार में बहू को सबकी चहेती बनाता है और एक मां को अपने बच्चों की नजरों में दुनिया की सबसे अच्छी मम्मी साबित करता है.

एक विज्ञापन मृत परिजनों को अपनों के बीच वापस आकर कुरकुरों का स्वाद लेते दिखाता है तो दूसरे में एक अंतरिक्ष यात्री के मृत माता-पिता ही उसके स्नैक्स शेयर करने के लिए उसके यान में आ पहुंचते हैं. कहीं कोई शहीद सैनिक अपने पसंदीदा स्नैक्स के साथ परलोक पहुंच जाता है तो कहीं यमदूत धरती पर आकर आत्माओं को ले जाने का अपना काम ही भूल जाता है. एक और फास्टफूड के एड में सृष्टि का रचयिता परमेश्वर, स्वाद में इतना खो जाता है कि गफलत में हर चीज को डबल बनाता चला जाता है. जाहिर है कि सरहदें पार करने के इस सिलसिले में तार्किकता की सीमाएं भी कोई मायने नहीं रखतीं. आखिर मनोरंजन भी तो एक तरह का स्वाद ही है.

स्वाद एक एक ऐसे सस्पेंस नोवल की तरह हमारे सामने होता है, जिसे हम अंत जानने के बावजूद बार-बार पढ़ते हैं और उस खुले रहस्य का लुत्फ लेते हैं, जो हर बार हमें एक नया एहसास देकर जाता है. वहीं कुछ स्वाद, अबूझ रहस्यों के कोहरे में लिपटे रहकर अपनी विलक्षणता को बरकरार रखे हुए हैं. क्या आपने कभी सोचा है कि एक सदी से अपने स्वाद के फार्मूले को मजबूत तिजोरी में बंद रखने के पीछे कोकाकोला का क्या मंतव्य है? क्यों पारले-जी जैसा सोंधा स्वाद किसी और ग्लूकोज बिस्कुट में नहीं आ पाता, क्यों ब्रिटानिया की ब्रेड और अमूल बटर में मौजूद हल्का सा नमकीनी एहसास किसी और ब्रेड या बटर में नहीं मिलता?

क्या स्वाद एक लत है या फिर कोई तलब, जो सिर्फ खुद से ही शांत होती है? क्यों स्वाद एक याद की तरह हमारे मन में रच-बस जाता है, जिसे हम बार-बार जीना चाहते हैं? दरअसल, स्वाद को अमर होने के लिए एक विशेषज्ञता की दरकार होती है, जिसमें प्रेम का होना सोने पे सुहागे का काम करता है. यह प्रेम किसी अपने के प्रति भी हो सकता है और अपने काम के प्रति भी. शायद यही वजह है कि मां के हाथ का बने गाजर के हलवे और आलू के परांठों का स्वाद किसी मुहावरे की तरह हमारी संस्कृति में रच-बस जाता है, यही वजह है कि किसी नुक्कड़ के हलवाई के समोसे हमारे शाम के नाश्ते का हिस्सा बन जाते हैं, जिसके लिए आपको चार-पाँच किमी दूर तक जाना भी नागवारा नहीं गुजरता. 

स्वाद का यह जलवा विज्ञापनों में ही नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन में भी इतनी ही प्रभावी भूमिका में देखा जा सकता है. वर्ना उत्तर का समोसा और दक्षिण का डोसा, गुजरात का ढोकला, महाराष्ट्र की पावभाजी और बंगाली रसगुल्ला देश के कोने-कोने में समान रूप से लोकप्रिय न होते. वह भी एक ऐसे देश में जिसके पास भाषा से लेकर पानी तक लड़ने-झगड़ने और एक-दूसरे को नीचा दिखाने के अनगिनत बहाने उपलब्ध हैं. क्या आपने कभी सुना है कि दो राज्यों में किसी चीज के स्वाद को लेकर झगड़ा हुआ हो? क्या कभी किसी ने कहा है कि हम अपने राज्य में पड़ोसी राज्य का फलां व्यंजन नहीं बिकने देंगे, क्योंकि इससे लोग अपने राज्य का व्यंजन खाना छोड़ देंगे? कभी किसी नेता को समोसे या डोसे का बहिष्कार करने का आह्वान करते सुना है? एक इतालवी महिला को बेशक हम अपने देश पर राज न करने दें, लेकिन इतालवी पिज्जे का हम दिल खोलकर स्वागत करते हैं. चीन को भले ही हम दुश्मन नं. दो ( पहला पाकिस्तान ) मानते हों, लेकिन चाइनीज चाउमिन से दोस्ती हमें कबूल है, अमेरिका के साम्राज्यवाद को लेकर हम चाहे कितनी ही त्यौरिया चढ़ाएं, लेकिन अमेरिकी बर्गर के स्वाद के आगे हम नतमस्तक हो जाते हैं. स्वाद, सार्वभौमिक है. अगर भूख हमारे कर्म का पहला पायदान है तो अगला पायदान यकीनन स्वाद ही है.

चलते-चलते
एक पुरानी कहावत है कि अगर किसी को दिल में पहुंचना हो तो पेट का रास्ता सबसे अच्छा है. स्वाद इस रास्ते पर चलने वाला ऐसा वाहन है, जिसे स्टार्ट करने के लिए सिर्फ एक किक की जरूरत होती है. 


संदीप अग्रवाल 
नागपुर 

Monday, October 1, 2012

मेगा से माइक्रो की ओर



नैनो यानी सूक्ष्म टेक्नोलॉजी का दौर है. सब कुछ सिकुड़ रहा है. घर, परिवार, कारें...दिल के भीतर की जगह. विज्ञापन भी इसके असर से अछूते नहीं रहे हैं. अलबत्ता, दिलचस्प रूप से ये अपनी संक्षिप्तता के बावजूद विशालता से ज्यादा असरदार साबित हो रहे हैं. वर्षों पहले टीवी पर आ रहा एक डिटरजेंट का विज्ञापन, जिसकी पंचलाइन थी- इट रिमूव्स स्टेंस, विच यू कैन सी एंड जर्म्स, विच यू कांट’. वो बिल क्लिंटन और मोनिका लेविंस्की स्केंडल का जमाना था, तो विज्ञापन को चर्चित होने के लिए एक अतिरिक्त वजह मिल गई थी. 


 बहरहाल, आज माइक्रोटेक्नोलॉजी ने सब कुछ उलटपुलट कर दिया है. स्टेंस तो सभी क्लिनिंग एजेंट मिटा देते हैं. काबिलियत तो जर्म्स से मुकाबले में है. स्टेंस का दिखाई देना या न देना इतना मायने नहीं रखता है, जितना कि जर्म्स का रखता है. वो जमाना गया, जब आप सिर्फ स्टेंस को ही देख पाते थे और जर्म्स को नहीं. वीडियो प्रोडक्शन की दुनिया में वीएचएस से हाई डेफिनेशन के सफर में अब जम्र्स को देख पाना भी मुमकिन है. और वे सिर्फ दिखाई ही नहीं देते, बल्कि स्टेंस से कई गुना ज्यादा बड़े आकार में दिखाई देते हैं. कभी वे हमारे दांतों के बीच की जगह से निकलकर मुंह से बाहर आकर टेबल पर खड़े होकर हमें डराते नजर जाते हैं, कभी एक खुद डरकर कपड़ों से निकलकर भागते नजर आते हैं. बर्तनों में हो तो वे सब्जी से बड़े दिखाई देते हैं, टायलेट में हों तो कमोड से बड़े...और कई बार वे हवा में तैरते हुए आपकी सांसों में घुस जाते हैं ताकि आप उस उत्पाद को खरीदने के लिए मजबूर हो जाएं, जिसे बेचने के लिए वे एक्सटोर्शन वाली मुद्रा अपना रहे हैं कि ‘किल अस, बिफोर वी किल यू...’ इनका आकार और रंगरूप, दहशत से ज्यादा वितृष्णा उत्पन्न करता है. अजीबोगरीब आकारों और मुखमुद्राओं वाले इन जीवाणुओं का अट्टाहस और चीखपुकार, दोनों ही असह्य हो जाती हैं. यही इनकी प्रभावोत्पादकता है कि जब आप इन्हें देखना बर्दाश्त नहीं कर पाते तो अपने शरीर, कपड़ों अथवा घर में इनकी मौजूदगी कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं. 

इसने कल्पनाशीलता को पनपने के अपार अवसर भी दिए हैं. अब हम दर्द जैसी चीज को अपने कंधे पर सवार होकर हमारे बाल नोंचते या हमारी पीठ पर मुक्के बरसाते देख सकते हैं. अपने भीतर के शैतान संवाद कर सकते हैं और अनेक चीजों के एटम्स कंबीनेशन को देखकर उन पर भरोसा करते हुए उन्हें आजमाने को जोखिम उठा सकते हैं. 

मेगा से माइक्रो की यह यात्रा सिर्फ स्टेंस और जर्म्स की ही नहीं है, बल्कि विज्ञापनों में दिखने वाली छवियों और उनमें व्यक्त भावनाओं की भी है. पहले के दौर में जहाँ विज्ञापनों का मतलब उत्पाद हाथ में लेकर एक कृत्रिम मुस्कान के साथ दर्शकों को उसे खरीदने की सलाह देना भर होता था, वहीं आज इनमें क्लोजअप की जगह लॉन्ग शॉट्स ने ले ली है, जिनमें फन है, एक्शन है और इमोशन है...वेरायटी है. और यह सब तकनीक का ही कमाल है. माइक्रो की बदौलत आप वह सब कुछ भी देख सकते हैं, जो पर्दे पर नहीं दिखाई देता, लेकिन मन की आंखें उसे महसूस कर सकती हैं.

और यही महसूस करना इन विज्ञापनों की ताकत है और हमारी संजीवनी. आज सच यह नहीं कि हम मनुष्य हैं, इसलिए महसूस करते हैं, बल्कि यह है कि हम महसूस करते हैं, इसीलिए हम मनुष्य हैं. वर्ना एक विज्ञापन पर हमारा रिएक्शन भी इतना ही संक्षिप्त होगा, जितना कि किसी ऑनलाइन एक्टिविटीज में, यह सिद्ध करने के लिए कि आप मनुष्य हैं, मशीन नहीं, एक बॉक्स में दी गई अक्षर छवियों को ब्लैंक स्पेस में टाइप करना होता है. 

संदीप अग्रवाल

Saturday, September 15, 2012

‘बैड’ इज मोर अपीलिंग दैन ‘बेस्ट’


वर्षों पहले, अगर आपको याद हो तो टेलीविजन पर एक डिटर्जेंट का एड आता था, जिसमें एक पात्र, दूसरे के बाजू से निकलते हुए  अपने आप से पूछता है कि भला उसकी कमीज मेरी कमीज से सफेद कैसे...और फिर उसे पता चलता है कि किस डिटरजेंट के इस्तेमाल से वह भी उस अजनबी जैसी सफेदी पा सकता है. 


ये इंडिया में वीडियो एडवर्टाइजिंग का आरंभिक दौर था. इसके बाद के कुछ सालों में तो यह अनेक मुकामों से गुजरी. और अंतः में प्रतिस्पर्द्धा के नए-नए कीर्तिमान स्थापित करते हुए दो धाराओं  में  बंट गई. एक अपनी कमीज को दूसरे की कमीज से सफेद बताने में विश्वास रखते हुए उपभोक्ताओं को रिझाने की कोशिश करती हुई और दूसरे सीधे प्रतिस्पर्द्धी  की कमीज को गंदा बताती थी और यह उपभोक्ताओं पर छोड़ देती थी कि वे सामने वाले की कमीज को गंदा समझकर, शाब्दिक हमला करने वाले की कमीज को ही साफ मानें.

विज्ञापनों की भाषा में इसे  कंपयरेटिव   एडवर्टाइजिंग कहा जाता है...और ज्यादा तकनीकी शब्द का इस्तेमाल करना हो तो इसे नाकिंग कापीभी कह सकते हैं. इसी तरह की एक विधा पैरोडी एडवर्टाजिंग भी है, लेकिन उसमें उत्पाद वास्तविक नहीं होता, बल्कि सिर्फ मजा लेने के लिए किसी काल्पनिक उत्पाद को प्रचारित करते विज्ञापन तैयार किए जाते हैं. कई बार पैरोडी की जगह सैटायर का इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें उत्पाद को तो कुछ नहीं कहा जाता, लेकिन उसके विज्ञापन का मजाक उड़ाकर अपने उत्पाद का प्रचार किया जाता है. एक सोडा ड्रिंक, मशहूर कंपनियों के कोल्डड्रिंक के विज्ञापन आते ही, उनकी मजाक उड़ाने वाले विज्ञापन पेश कर देता था. यह सिलसिला कई साल तक चला. 

भारत में भले ही कंपयरेटिव  एडवर्टाइजिंग को पेशेवर तरीके से अपनाने की परंपरा ज्यादा पुरानी नहीं है, लेकिन वास्तव में यह एक सदी से भी ज्यादा पुरानी है. कंपयरेटिव एडवर्टाइजिंग का पहला मामला अमेरिका में 1910 में सामने आया था. पहले इसे काफी जोखिम भरा माना जाता था कि यह उत्पाद की पहचान को नुकसान पहुँचा सकती है, कानूनी कार्रवाई का सबब बन सकती है और लोगों में प्रतिस्पद्र्धी के प्रति सहानुभूति पैदा कर सकती है, लेकिन ‘70 के दशक में इसके सकारात्मक पक्षों पर विचार किया गया और इसे प्रोत्साहन दिया जाना शुरू हो गया और एफटीसी (फेडेरल ट्रेड कमीशन) बाकायदा ऐसे विज्ञापनदाताओं को बढ़ावा देती थी, जो  प्रतिस्पर्द्धी का खुलेआम नाम लेकर रचनात्मक विज्ञापन पेश करते थे. एफटीसी का मानना था कि इससे उत्पादों की गुणवत्ता में नयापन और सुधार आएगा.

यह मुकाबलेबाजी बहुत दिलचस्प रही है. अगर कोई चैनल इस पर भी रियलिटी शो बनाने का जोखिम उठाए तो वह टीआरपी में काफी ऊपर जा सकता है. मिंट की गोली का एक विज्ञापन कहेगा कि हमारे उत्पाद का छेद उसे विश्वस्त बनाता है, तो दूसरी गोली का विज्ञापन कहेगा कि क्या आपके दिमाग में छेद है, जो छेद वाली मिंट खाएंगे. एक नमक कहेगा कि दूसरे नमक को टाटाबोल दो तो दूसरा कैप्टनको गोली मारने की राय देगा. एक बिस्कुट कंपनी बताएगी कि मोना-को’  टॉप बाटम प्राब्लम है तो एक डिटरजेंट कंपनी और ज्यादा हिम्मत दिखाएगी और सीधे-सीधे कहेगी कि उसका डिटरजेंट टाइड से ज्यादा सफेदी देता है. दर्शकों का तो पता नहीं, लेकिन चैनलों के लिए यह जरूर आम के आम और गुठलियों के दाम जैसा फायदेमंद हो सकता है. 

एक पुरानी कहानी है, जिसमें राजा अपने  बुद्धिमान मंत्री के सामने एक लकीर खींचकर उसे बिना मिटाए छोटी करने की चुनौती पेश करता है तो मंत्री उसके ऊपर एक उससे भी बड़ी लकीर खींच देता है. लेकिन, आज के फटाफट कल्चर वाले दौर में बड़ी लकीर खींचने के लिए जो वक्त चाहिए, उसका काफी टोटा है, इसलिए लकीर को मिटाकर ही खुद को बड़ा साबित करने का शार्टकट अपनाने वालों की तादाद बढ़ रही है. और कंपयरेटिव एडवर्टाइजिंग अपने मूल उद्देश्य को बहुत पीछे छोड़ चुकी है. 

दूसरे की कमजोरी को अपनी ताकत बताने का यह सिलसिला लंबे समय से चल रहा है. राजनीति में भी और विज्ञापनों में भी. जिस तरह हमारे नेता अपनी खूबियों की बजाए, विरोधी की कमियां बताने में ज्यादा विश्वास करते हैं, वैसे ही विज्ञापन भी कर रहे हैं. बस प्रतिशत का फर्क है. शायद इसकी वजह यह है कि विज्ञापनों पर अभी भी प्रतिस्पर्द्धा आयोग और एडवर्टाइजिंग स्टेंडर्ड काउंसिल जैसी नियामक संस्थाओं का अंकुश है, जबकि राजनेताओं पर किसी भी शाब्दिक मुकाबलेबाजी के लिए कोई पाबंदी नहीं है. देखा जाए तो यह स्थिति विज्ञापनों के हित में है, क्योंकि इसी से राजनेताओं के विपरीत, उनकी विश्वसनीयता अभी तक बची हुई है.

                                                                                                                                                                                                               -संदीप अग्रवाल , नागपुर 

Friday, September 14, 2012

पिक्चर अभी बाकी है !

कौतुहल मनोरंजन की किसी भी विधा की एक सामान्य शर्त है, जो देखने-पढ़ने वाले की रुचि उसमें बनाए रखती है. बीती सदी के अंत तक विज्ञापन अमूमन इससे बचते ही रहे हैं. लेकिन, अब ऐसा नहीं है. बीते कुछ सालों में विज्ञापनों ने कौतुहल को अपनाकर रचनात्मकता और रोचकता, दोनों को नए आयाम दिए हैं. पुराने दौर के विज्ञापन जहाँ एक ही ट्रैक पर सालों-साल चलते रहते थे. अब वे नित नई-नई कहानियां कहते नजर आ रहे हैं. कई बार ये कहानियां एकदम स्वतंत्र होती हैं, तो कई बार एक-दूसरे से संबद्ध. लेकिन, हर बार हम यह पाते हैं कि एक प्रोडक्ट का अपने आप में मुकम्मल लगने वाला विज्ञापन, अक्सर आगे के लिए कुछ और कहने की गुंजाइश छोड़ता हुआ खत्म होता है.

उदाहरण के लिए, हम पैरागान चप्पल के विज्ञापन को ही लेते हैं. इसके पहले भाग में एक सरकारी आफिस में अपना काम करवाने के लिए चक्कर काटने वाला युवक अधिकारी से शिकायत करता है कि चक्कर काटते-काटते उसकी चप्पल घिस गई हैं, तो वह उसे पैरागान की चप्पल पहनने की सलाह देता है और दर्शकों को अपनी ढिठाई से हतप्रभ कर देता है. सालों से यही विज्ञापन हमें गुदगुदाता आ रहा था, लेकिन कुछ महीनों से इसका अगला हिस्सा हम यह देख रहे हैं कि फाइल लेकर आते युवक को देखकर वही अधिकारी टेबल्स के बीच में छिप जाता है और उसकी झूठी बीमारी का बहाना सुनकर युवक को हम यह कहते सुनते हैं कि कोई बात नहीं, वह कल फिर आ जाएगा. और अधिकारी इस बात पर अफसोस जाहिर करता है कि उसने युवक को पैरागान चप्पल पहनने की सलाह दी थी.


इसी तरह ड्यूलक्स पेंट का रास्कल रेड विज्ञापन पहले पार्ट में एक लड़की के खब्ती बाप को उसके साथ आए लड़के को देख कर इरीटेट होते हुए  दिखाया गया है तो अगले पार्ट में वह उसके साथ बड़ी आत्मीयता से बतियाता हुआ नजर आता है.एक और विज्ञापन नोकिया का दिखाओ अपना स्टैंडर्डहै, जिसमें कालेज में नायिका का वीडियो बनाने की कोशिश कर रहे एक शोहदे को नायक उसके गांव से भी ज्यादा बड़ी मेमोरी वाला फोन दिखाकर लज्जित करता है, और इसके अगले पार्ट में वही नायक है, वही नायिका और वही शोहदा, लेकिन लोकेशन बदल गई है, अब यह एक शादी के माहौल में घट रहा है. ऐसे ही कैडबरीज के नायिका को घर छोड़ने का शुभ काम करने जा रहे नायक, वाले विज्ञापन के इसके अगले पार्ट में उसे नायिका के साथ चाकलेट शेयर कर वक्त गुजारते देखा जा सकता है तो वहीं एयरटेल के जो मेरा है वो तेरा है...को उसी के जिंदगी में हरेक दोस्त जरूरी होता हैके नेशनल क्रेज बन जाने वाले स्लोगन की अगली कड़ी के रूप में देखा जा सकता है. आजकल इसी जमात में एक और विज्ञापन शामिल हुआ है, जिसमें पिछली कड़ी में मच्छर की बजाए जवानी के दिनों का फोटो खोजकर लाने वाला बूढ़ा पति, किसी परिचित के घर से मच्छर लाके पत्नी से लगाई शर्त जीतने की कोशिश करता है.

इन  विज्ञापनों में जो बदलाव है, वह लंबे समय से चल रही एकरसता को तोड़ने के लिए है. लेकिन, कई बार बदलाव को नई सूचना देने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है, जैसे कि मैक्स न्यूयार्क लाइफ का विज्ञापन. इसके पहले भाग में ग्राहक के पास बैठे इंश्योरेंस एजेंट के भीतर का शैतान उसे झूठ बोलकर ग्राहक को फंसाने के लिए उकसाता है, लेकिन वह सच बोलने पर आमादा है. वहीं इसके पार्ट-2 वाले विज्ञापन का इस्तेमाल ग्राहक को यह बताने के लिए किया गया है, कि मैक्स न्यूयार्क लाइफ अब न्यूयार्क टैगहटाकर मैक्स लाइफ बन गया है. लेकिन, नाम बदल जाने के बावजूद अपने ग्राहकों के लिए उसकी प्रतिबद्धता नहीं बदली है. 

जरूर नहीं कि बदलाव और नएपन के लिए किसी एक विज्ञापन की ही कहानी को आगे बढ़ाया जाए. बहुत सारे ऐसे विज्ञापन भी हैं, जो एक ही समय में एक ही थीम पर अलग-अलग कहानियों के साथ अलग-अलग तरह का प्रभाव छोड़ रहे हैं. कहीं ये गुदगुदाते हैं, कहीं हैरान कर जाते हैं, कहीं प्रेरणा बनते नजर आते हैं तो कहीं भावनाओं के समंदर में ले जाते हैं. कैडबरीज, टाइड, आइडिया, अमूल माचो, टाटा स्काई, मैगी, पेप्सी, कोकाकोला और थम्सअप कोल्ड ड्रिंक...ऐसे अनेक उत्पाद हैं, जो अपने विज्ञापनों  में निरंतर विविधता को अपना रहे हैं. 

नई-नई कहानियों वाले विज्ञापन हों, या सीक्वल, मकसद दोनों का एक है...अपने उत्पाद का प्रचार लेकिन मनोरंजक तरीके से, ताकि टारगेट को कुछ सेकेंड तक बांधकर रखा जा सके. वर्ना उसके हाथ में थमे रिमोट के बटन दबना शुरू हो जाने में सेकेंड भी नहीं लगता.  

वैसे भी अधूरी पिक्चर किसे पसंद है? 
संदीप अग्रवाल