Sunday, July 5, 2020

बातें-मुलाकातें: 3 (एम.एस. सथ्यू)

साल 2002 की शुरुआत. दिल्ली की सर्दियां और मौका वही सीरीफोर्ट का इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल. एक दिन घूमते-घूमते एक लंबी, दुबली-पतली काया, सिर पर सफेद झक बाल और उतनी ही सफेद दाढ़ी. समांतर सिनेमा और फिल्म पत्रकारिता में गहरी रुचि होने के कारण, पहचानने में जरा भी देर नहीं लगी कि यह प्रसिद्ध कन्नड़ फिल्मकार मैसूर श्रीनिवास हैं. नहीं समझे ना, अरे वही जो एम.एस.सथ्यू के नाम से ज्यादा प्रसिद्ध हैं.

अगर आपने 2013 का गूगल रियूनियन वाला एड देखा है तो उसमें वह पाकिस्तानी वृद्ध युसूफ की भूमिका में नजर आए हैं. लेकिन वह इसके चालीस साल पहले ही 1973 में आई अपनी पहली ही हिंदी फिल्म गरम हवा के साथ समांतर सिनेमा के सशक्त हस्ताक्षरों में शुमार हो गए थे. उस समय दूरदर्शन पर, तकषी शंकर पिल्लै के उपन्यास पर आधारित, उनका धारावाहिक कयर ( जिसे गलती से कायर समझ लिया जाता था, इसके बारे में भी उन्होंने ही मुझे बताया था कि कयर का मतलब रस्सी होता है. )

मैं तब लोकमत समाचार के फिल्म वार्षिकांक का संयोजन कर रहा था. मुझे उन्हें देखते ही ख्याल आया कि कन्नड़ सिनेमा के बारे में उनसे बात करने का यह अच्छा अवसर है. मैं लपककर उनके पास पहुँच गया और अपना परिचय देते हुए बोला कि क्या मैं आपसे 10-15 मिनट बात कर सकता हूँ? उन्होंने मुझे गौर से देखा और पूछा कि इससे ज्यादा तो नहीं? मैंने कहा, बिल्कुल नहीं. तो मैंने कन्नड़ सिनेमा की स्थिति पर उनसे बातचीत की. थोड़ी बहुत जानकारी मुझे पहले से थी, इसलिए उन्हें कहीं भी ऐसा नहीं लगा कि वे एक अनाड़ी से बात कर रहे हैं. कुल मिलाकर बातचीत काफी अच्छी रही. लेकिन, कहानी खत्म नहीं होती.

वार्षिकी के लिए हम ‘भविष्य का सिनेमा और सिनेमा का भविष्य विषय‘ पर एक परिसंवाद भी आयोजित कर रहे थे. फेस्टिवल के अगले दिन सथ्यु जी जब मुझे दोबारा नजर आए तो मुझे लगा कि मौका चूकना नहीं चाहिए, सिनेमा के इस जीनियस से फिर पता नहीं कब बात हो या न हो. मैं फिर से उनके पास जा पहुँचा और बोला कि मुझे आपके दस-पंद्रह मिनट चाहिए. ‘आपने कल भी यही कहा था?’’ उन्होंने मुझे घूरते हुए कहा. ‘‘ मैं आज भी कल से ज्यादा समय नहीं लूँगा.’’ मैंने बेझिझक जवाब दिया और फिर से बात शुरू हो गई. आज उनका 90 वां जन्मदिन है, इस मौके पर हम उनके दीर्घायु होने की कामना करते हैं. दोनों बार की बातचीत यहाँ हाजिर है, चाहे तो आप भी पढ़ सकते हैं.

interview

       

Wednesday, July 1, 2020

बातें—मुलाकातें : 2 (पवन मल्होत्रा)

इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल एक ऐसा मौका होता है, जहाँ आठ-दस दिनों में बहुत सारी फिल्मी हस्तियां एक ही जगह पर मिल जाती हैं. गोवा जाने से पहले यह आयोजन हर तीसरे साल दिल्ली के सीरीफोर्ट के आॅडिटोरियम्स में हुआ करता था. तीनो आॅडिटोरियम के बीच इतना फासला था, जिसे तय करते हुए किसी न किसी से मुलाकात हो ही जाती थी. ऐसे ही एक मौके पर मुझे पवन मल्होत्रा मिल गए. ब्राउन कलर का चमकीला ब्लेजर और व्हाइट पैंट....उस समय उनका बाघ बहादुर और नुक्कड़ की वजह से काफी नाम था... और मेरा नवभारत टाइम्स में अपने काॅलम 'मेरा सपना'  की वजह से. मैंने उन्हें जाकर अपना परिचय दिया और कहा कि मैं आपका इंटरव्यू करना चाहता हूँ. 

Strong characters stay in one's memory: Pawan Malhotra - lucknow ...

पवन ने कहा कि आप कर सकते हैं, लेकिन मैं पहले ही आपको बता देता हूँ कि मुझसे आपको अच्छी काॅपी नहीं मिलने वाली. मैं उस समय काफी मुंहफट था, बोल दिया कि आपने हँस के नीर-क्षीर विवेक के बारे में तो सुना ही होगा, तो  आप सिर्फ मेरे सवालों के जवाब देते जाइए, जो काम की चीजें होंगी, मैं खुद छाँट लूँगा. उस वक्त वह चाय का कप हाथ में लिए हुए थे. उन्होंने मुझसे पूछा कि आप कुछ पीएंगे, चाय या काॅफी? मैंने विनम्रता से मना कर दिया. फिर वहीं खड़े-खड़े उनसे करीब 15 मिनट बात हुई. 

उनके डराने के बावजूद इंटरव्यू काफी अच्छा रहा. कई साल बाद जब उनका नंबर मिला तो मैंने उन्हें भी इस इंटरव्यू की काॅपी व्हाट्स एप्प पर भेजी, तो उन्हें बहुत अच्छा लगा. आज उनका जन्मदिन है, अच्छी बात यह है कि वे आज भी उसी पुरानी ऊर्जा के साथ लगातार सक्रिय हैं. यह सक्रियता और ऊर्जा लगातार बनी रहे, इसी शुभकामना के साथ यह इंटरव्यू यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ. आप भी पढ़िए और उनके साथ हवा में उड़ते हुए जमीन की हरियाली का दीदार कीजिए....

interview

चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग

Thursday, June 18, 2020

बातें—मुलाकातें : 1 ( आशीष विद्यार्थी)

मैंने अपने पत्रकारीय जीवन में करीबन सत्तर—अस्सी सेलिब्रिटीज के इंटरव्यू किए होंगे, उनकी बड़ी—बड़ी डींगे सुनी हैं, लंबे—चौड़े आदर्शों की बातें सुनी हैं, लेकिन उनमें से बहुत कम ऐसे हैं, जिन्होंने वाकई मुझे प्रभावित किया है. आशीष विद्यार्थी उन्हीं में से एक हैं. एक अभिनेता के तौर भी और एक अच्छे इंसान के तौर पर भी मैं दिल से उनकी काफी कद्र करता हूँ. दिल्ली प्रवास के दौरान आशीष और उनके परिवार से मेरे बहुत निजी रिश्ते रहे, जिनकी शुरुआत बड़े नाटकीय अंदाज में हुई थी. 

Happy Birthday Ashish Vidyarthi Apart from famous actor Ashish ...

उन दिनों मैं उत्तराखंड के अखबार हिमालय दर्पण में एंटरटेनमेंट कॉरेस्पॉन्डेंट हुआ करता था. हुआ कुछ यूं कि एक शाम सू.प्र.मं. की प्रेस कॉन्फ्रेंस में गया हुआ था. वहाँ दिवंगत चेतन आनंद की अध्यक्षता वाली ज्यूरी ने राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की घोषणा की. उनमें एक यह भी थी कि आशीष को उनकी पहली ही फिल्म द्रोहकाल के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार दिया जाएगा. यह जानकर मुझे बहुत अच्छा लगा, क्योंकि इस फिल्म से पहले से ही जीटीवी के धारावाहिक कुरुक्षेत्र में हम उनकी प्रतिभा और विस्फोटक संभावनाओं से परिचित हो चुके थे. 

मेरे पास दिल्ली के लक्ष्मीनगर स्थित उनके घर का फोन नंबर था, मैंने आॅफिस आकर तुरंत उनके घर कॉल किया. पहले उनकी माता जी ने फोन उठाया तो मैंने उन्हें यह खुशखबरी सुनाई. उन्हें न तो यकीन आया और न ही समझ में आया कि मैं क्या कहना चाहता हूँ तो उन्होंने फिर आशीष के पिताजी को कॉल दिया. इनाम की खबर पाकर उन्हें लगा कि मैं शायद मजाक कर रहा हूँ, तो उन्होंने पूछा कि यह खबर आपने कहाँ पढ़ी. तो मैंने बताया कि यह कल के अखबारों में छपेगी. फिर मैंने उन्हें अपना परिचय दिया तो वे कुछ आश्वस्त हुए और उन्होंने कहा कि वे आशीष को बता सकते हैं न. मैंने उन्हें यकीन दिलाया कि यह खबर सोलह आने सही है और वे किसीको भी बता सकते हैं. 

कुछ  दिनों बाद मैंने उनके घर पर फिर फोन किया तो फोन आशीष ने उठाया. मैंने जैसे ही अपना नाम बताया, उन्होंने बड़ी गर्मजोशी से कहा कि संदीप मैं आशीष बोल रहा हूँ. फिर इंटरव्यू का तय हुआ और एक—दो दिन बाद ही मैं उनका इंटरव्यू लेने पहुँच गया. इंटरव्यू हुआ,छपा भी. हिंदी में शायद यह उनका पहला इंटरव्यू था. इस इंटरव्यू से पता चला कि उनका अभिनय विद्या और समसामायिक मुद्दों पर कितना स्कॉलर अप्रोच है. यूं तो पूरा इंटरव्यू ही बहुत अच्छा रहा, लेकिन सबसे ज्यादा अच्छा मुझे उनकी एक बात से लगा, वह यह थी कि आप सीना फुलाकर राजा नहीं बन जाते, राजा तब बनते हैं जब दूसरे आपके सामने सिर झुकाएं. यह बात किस संदर्भ में कही गई थी, उसका यहाँ जिक्र करेंगे तो संस्मरण बहुत लंबा हो जाएगा.

दूसरी मजेदार बात मुझे यह याद है कि कई हफ्तों के अंतराल के बाद जब मैंने उन्हें फोन किया तो उन्होंने पूछा कि आप कौन बोल रहे हैं? मैंने कहा, पहचानिये तो उन्होंने कहा कि नाम तो नहीं जानता, पर आप जरूर कोई पत्रकार बोल रहे हैं.

नाम बताइए, मैं हँसकर बोला.

आप पाँच शब्द बोलिए तो मैं पहचान जाऊंगा. 

मैंने सिर्फ पाँच शब्द बोले, ये लीजिए आपके पाँच शब्द और उन्होंने तुरंत पहचान लिया.

इस घटना के बाद हमारी कई बार बात हुई, एक—दो बार अनौपचारिक मुलाकात भी हुई. लेकिन, उनकी गर्मजोशी और मिलनसारिता में कभी कोई कमी मुझे महसूस नहीं हुई.

आज आशीष का जन्मदिन है, उन्हें हार्दिक बधाई व दीर्घ स्वस्थ—सक्रिय जीवन की शुभकामनाएं...

interview

Saturday, November 18, 2017

सेव द क्रिएटिव एडवर्टाइजिंग

कन्ज्यूमर राइट्स के प्रोटेक्शन के लिए सरकार पार्लियामेंट के विंटर सेशन में एक ऐसा बिल इन्ट्रोड्यूस करने की तैयारी में है, जिसमें सोकाॅल्ड मिसगाइडिंग एडवर्टाइजमेंट्स पर लगाम लगाने की बात कही गई है. इस प्रपोज्ड बिल के प्रोवीजंस के अकाॅर्डिंग, किसी भी प्रोडक्ट या सर्विस के बारे में विज्ञापनों के जरिए गलत जानकारी देने पर प्रोडक्ट मैनफैक्चरर या सर्विस प्रोवाइडर कंपनी के अगेंस्ट कड़ी कार्रवाई हो सकती है. इस कार्रवाई में दो से पाँच साल की कैद या 10 से 50 लाख रुपए की पैनल्टी या फिर दोनों की सजा दी जा सकती है.

लास्ट ईयर इसी तरह का एक कोड़ा ऐसे एडवर्टाइजमेंट में प्राॅडक्ट को एन्डोर्स करने वाले सेलिब्रिटीज पर भी फटकारा जा चुका है, जिसमें एडवर्टाइजमेंट्स में प्राॅडक्ट के बारे में बढ़ा-चढाकर बातें करने वाले स्टार्स को जेल और जुर्माने की सजा से डराया गया था. जबकि ज्यादातर मामलों में सेलिब्रिटीज को न तो पता होता है और न ही उनके पास पता करने का कोई तरीका होता है कि जिस प्राॅडक्ट को वे एन्डोर्स करने जा रहे हैं, उसके दावों की सच्चाई क्या है. 


अपने प्राॅडक्ट्स को बेचने के लिए प्राॅडक्ट के बारे में बढ़ा-चढ़ा कर बताना कोई नई बात नहीं है, बड़े-बड़े मैनफैक्चरर ही नहीं, बल्कि बसों में बाम और सड़कों पर मजमा लगाकर टूथ पाउडर बेचने वाले भी यही करते हैं और दशकों से करते आ रहे हैं. ऐसा नहीं करेंगे तो प्राॅडक्ट कैसे बिकेगा. मान लीजिए कि एक कंपनी एक ऐसी क्रीम बनाती है, जो स्किन को फेअर बनाने के पर्पज से खरीदी जानी है. अगर वह कहे कि हमारी क्रीम बनाई तो इसी इसी पर्पज से गई है, लेकिन हो सकता है कि यह आपको गोरा न बना पाए. अब इतनी आॅनेस्टी तो शायद ही कोई दिखाएगा कि अपने प्राॅडक्ट की लिमिटेशंस के बारे में बताते हुए प्राॅडक्ट्स सेल करने की सोचे. और अगर वह सोचे भी तो क्या कोई भी प्राॅस्पेक्टिव कन्ज्यूमर उसे खरीदेगा?

जाहिर है कि कन्ज्यूमर्स को अट्रेक्ट करने के लिए अलंकारों से भरी भाषा का इस्तेमाल, मार्केटिंग की स्टर्टजी का एक इंटीग्रल पार्ट है. इस लैंग्वेज पर उंगली उठाने से पहले तीन बातें समझना बहुत जरूरी है, एक तो यह कि इसमें कन्ज्यूमर को अपनी ऐसी प्राॅब्लम्स से छुटकारा पाने का साॅल्यूशन नजर आता है, जो उसे इनफीरियरटी काॅम्प्लेक्स और फ्रस्ट्रेटन से भरे रहती हैं. दूसरी बात यह कि ये ‘पाॅवर आॅफ फेथ ’ का यूज करते हुए उसमें एक काॅन्फिडेंस क्रिएट करती है, जिसमें वह फायदा न होते हुए भी फायदा होते हुए महसूस करता है. साइंस भी इसे ‘प्लेसबो इफेक्ट’ के तौर पर एक्सेप्ट करता है. तीसरी और सबसे अहम बात यह है कि हर इंसान की किसी चीज से फायदा उठाने की क्षमता अलग-अलग होती है. एक सही प्राॅडक्ट भी कुछ यूजर्स के लिए फायदेमंद और कुछ के लिए नुकसानदेह या बेअसर साबित हो सकता है. ऐसे में शिकायत आने पर कार्रवाई का पैमाना क्या होगा, यह कौन तय करेगा?

आर्ट आॅफ सेलिंग और एक्ट आॅफ चीटिंग, दोनों में एक बड़ा फर्क है. लेकिन प्रपोज्ड बिल इस फर्क को मिटा देगा. हो सकता है कि कुछ विज्ञापन दावे करने के मामले में लाॅजिक की हदों को पार कर जाते हों, लेकिन इन पर काबू के लिए एडवर्टाइजिंग स्टैंडर्ड काउंसिल आॅफ इंडिया जैसी बाॅडी है, जो किसी भी एडवर्टाइजमेंट के अगेंस्ट आने वाली हर कम्प्लेंट को काफी सीरियसली लेती हैं और अकाॅर्डिंगली उसे मीडिया से हटवा भी देती हैं. इस तरह के आदेश से एडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री पर एक अननेसेसरी प्रेशर जेनरेट होगा, जिसमें उनका काम और क्रिएटिविटी सफर करेगी. क्रिएटिव एनर्जी और हजारों-लाखों आॅप्शंस के बीच आज यह कल्पना तो नहीं की जा सकती कि साठ के दशक की तरह एक माॅडल के हाथ में प्राॅडक्ट थमाकर खींचे गए उसके फोटोग्राफ के जरिए प्राॅडक्ट को प्रमोट किया जाए.

अगर सरकार वाकई कन्ज्यूमर्स के राइट्स को लेकर इतनी सीरियस है तो उसे चाहिए कि ऐसे प्राॅडक्ट को मार्केट में लाॅन्च किए जाने से पहले ही सारे टेस्ट कर ले और उसे बेचे जाने की परमिशन ही तब दे, जब यह पक्का हो जाए कि वह प्राॅडक्ट कन्ज्यूमर को वाकई वे सब फायदे दे सकता है, जिसके लिए उसे बेचा जा रहा है. तभी यह एन्श्योर किया जा सकता है कि प्राॅडक्ट के बारे में जो भी उसके एडवर्टाइजमेंट में बताया जा रहा है, वह अक्षरशः सच है.

चलते-चलते
कुछ लोगों का सवाल  है कि क्या चुनावों के दौरान वोट पाने के लिए दिए जाने वाले विज्ञापनों पर भी यह पाबंदी लागू होगी ?

Monday, July 6, 2015

एक ब्रैन्ड की मौत

वर्षों से इंडिया के लगभग हर मिडिल क्लास और इससे ऊपर के स्तर वाले घर में किसी फेमिली मेंबर की तरह मौजूद रहने वाला मैगी ब्रैन्ड आज अचानक ही ऐसे विलेन में तब्दील हो गया है, जो आस्तीन के साँप की तरह, धीरे-धीरे हमारे शरीर में अपना विष फेला रहा था. इसे अनिश्चितकाल के लिए न सिर्फ भारत, बल्कि दूसरे कई देशों से अचानक ही निर्वासित कर दिया गया है.

किसी ब्रैन्ड के कालकवलित होने का यह पहला मामला नहीं है. बाजार के इस विशाल आकाश में सितारों की तरह जगमगाते अनेक ब्रैन्ड आपको अक्सर उन्हीं की तरह टूटकर गिरते नजर आ जाएंगे. जब तक उनका वक्त और तकदीर बुलंद होती है, वे जगमगाते हैं और फिर धीरे-धीरे उनकी चमक मंद पड़ने लगती हैं और एक दिन वे चुपचाप टूटकर गिर जाते हैं. कुछ अर्सा बाद उनका नाम भी यादों से मिट जाता है.



एक मोटे-मोटे अनुमान के हिसाब से एक एवरेज इंडियन, सुबह उठकर किसी खास ब्रांड का टूथपेस्ट और टूथब्रश इस्तेमाल करने से लेकर रात को एक और पाॅपुलर ब्रांड की मच्छरों को दूर करने वाले मशीन या अगरबत्ती जलाकर सोने तक, रोजाना चार-पाँच दर्जन ब्रैन्डों को तो इस्तेमाल कर ही लेता है. विकसित देशों में यह संख्या दो से तीन गुनी हो सकती है. 

आम-तौर पर किसी भी ब्रैन्ड की उम्र उसके प्रति यूजर की निष्ठा पर निर्भर करती है. लेकिन, यह निष्ठा उसे अमरत्व की गारंटी नहीं देती. कई बार बाजार की ताकतें भी ब्रैन्ड के टिके रहने में सशक्त भूमिका का निर्वहन करती हैं. देखते ही देखते 21 वीं सदी में अचानक ब्रैन्डों की संख्या कई गुना बढ़ गई है और आश्चर्यजनक रूप से इनमें दर्जनों ऐसे ब्रैन्ड मौजूद नहीं हैं, जिनकी 80’ज और 90’ज में तूती बोलती थी. 

वनस्पति घी का पर्याय माना जाने वाला डालडा, वाशिंग पाउडर का दूसरा नाम समझा जाने वाला निरमा, सनलाइट सोप, ओके नहाने का साबुन, लौंग के तेल के सहारे बिकने वाला टूथपेस्ट प्राॅमिस और सिर्फ झाग बनाकर पाॅपुलरटी पाने वाला टूथपेस्ट फोरहंस अब कहाँ हैं? अमिताभ बच्चन जैसे सुपरस्टार को लेकर बेस्ट में यकीन दिलाने वाला बीपीएल टीवी में से कब लोगों का यकीन खत्म हो गया पता ही नहीं चला, इट्स वाचिंग यू का नारा बुलंद करने वाला बुश टीवी, खुद ही नजर आना बंद हो गया. मर्फी रेडियो की आवाज खामोश हो गई, नेशनल के टू-इन की कैसेट अटक गई, कछुआ छाप अगरबत्ती बीच में ही बुझ गई.... ऐसे दर्जनों, सैंकड़ो ब्रैंड जो एक समय हमारे अवचेतन में गहरे तक पैठ बनाए हुए थे, आज उनका जिक्र तक नहीं होता. 

ब्रैन्ड को लंबी उम्र प्रदान करने वाले तत्वों में विज्ञापनों की निरंतरता भी एक प्रमुख तत्व है. तीन दशक पहले तक की स्थिति को देखें तो सिलाई के धागों से लेकर खुजली के मरहम तक, अनेक साधारण सी चीजों तक के विज्ञापन रेडियो-टीवी पर देखने-सुनने को मिल जाते थे. लेकिन, अब प्रचार में एमएनसी की आक्रामक घुसपैठ ने ज्यादातर देसी ब्रैन्ड्स को पटखनी दे दी.  और अब वे टीवी या अखबारों में नहीं, सिर्फ आर्काइव्ज में ही नजर आते हैं. 

और अब जो दौर है, वह किसी भी ब्रैन्ड से लाॅयल्टी प्रदर्शित करने से ज्यादा नए-नए आॅप्शन चुनने में यकीन रखने वाले कन्ज्यूमर्स का है. अपने चहेते किसी भी ब्रैन्ड को हम मिस तो करते हैं, लेकिन जब वह एक बार हाशिए से बाहर हो जाता है तो उसकी जगह दूसरे आॅप्शन को चुनने में हम बहुत ज्यादा वक्त नहीं लगाते. अपने चहेते किसी भी ब्रैन्ड को हम मिस तो करते हैं, लेकिन जब वह एक बार हाशिए से बाहर हो जाता है तो उसकी जगह दूसरे आॅप्शन को चुनने में हम बहुत ज्यादा वक्त नहीं लगाते.

लेकिन मैगी जैसे ब्रैन्ड का, जो कि एक मिडिल क्लास कल्चर को सिम्ब्लाॅइज करता था, का जाना दूसरे ब्रैन्ड्स के बाजार से निर्वासित होने जैसा नहीं है.अगर  ब्रैन्ड स्वाभाविक मौत मरते हैं,  तो  मैगी एक्सीडेंटल डेथ  है, जिस पर शायद ही कोई अफसोस करने वाला मिले. 

Sunday, April 21, 2013

ढूंढते रह जाओगे


अक्सर हम एक से एक बेहतरीन विज्ञापनों से गुजरते हैं, कभी ये विज्ञापन प्रिंट में होते हैं, कभी टीवी के पर्दे पर, कभी किसी और मीडिया पर...किसी का विज्युअल हमें मंत्रमुग्ध कर देता है, किसी के शब्द, किसी का डायरेक्शन हमें बहुत प्रभावित करता है, तो कोई अपनी समग्रता में हमारे दिलो-दिमाग पर अपनी छाप छोड़ जाता है. लेकिन, हम शायद ही कभी यह जानने की कोशिश करते हैं कि आखिर ये बेहतरीन काम, है किसके दिमाग की उपज...और अगर करते भी हैं तो जान नहीं पाते. क्योंकि किसी भी विज्ञापन में उसकी रचना प्रक्रिया से जुड़े लोगों के बारे में जानने का कोई जरिया नहीं होता. ये वो सितारे हैं, जो आसमान में मौजूद होकर उसे रोशन तो करते हैं, लेकिन खुद चमकते नजर नहीं आते. 


विज्ञापन एक ऐसी विधा है, जो ज्ञान, विज्ञान (मानव व्यवहार विज्ञान) कला का अद्भुत संगम है, जैसा कि ज्ञान, सूचना और मनोरंजन की सभी विधाएं होती हैं. आप चाहे एक किताब लीजिए, अखबार लीजिए, नाटक लीजिए, फिल्म लीजिए...या कोई भी मास अपील वाला मीडिया लीजिए, सभी में अच्छे खासे अनुभव और जानकारी की दरकार होती है. लेकिन, विज्ञापन की दुनिया ऐसी है, जहाँ आपको अनुभव और जानकारी के अलावा एक अपने ही किस्म की सतर्कता की भी जरूरत होती है. क्योंकि यहाँ ‘सावधानी हटी, दुर्घटना घटी’ का सिद्धांत किसी भी अन्य मीडिया/विधा की तुलना में ज्यादा काम करता है. बल्कि, हर छोटी से छोटी बात में आपको इसका पालन करना पड़ता है. कभी कोई चीज कानून के खिलाफ जा सकती है, कभी किसी व्यक्ति या समूह की भावनाओं के खिलाफ तो कभी उसके खिलाफ, जिसके लिए वह विज्ञापन किया जा रहा है. 

क्या यह बात आपको हैरान नहीं करती कि इतनी सारी खूबियों से युक्त और हर समय तलवार की धार पर चलने वाले इन सृजनकर्मियों के बारे में आप कभी जान नहीं पाते. दशकों पहले का विज्ञापन भले ही आपके जेहन में आज भी तरोताजा हो, लेकिन आपको यह चीज कभी नहीं अखरती कि आप जिस तरह किसी गीत के पसंद आने पर उसके गायक, संगीतकार या गीतकार का नाम खोजने के लिए बेचैन हो उठते है, उतनी बेचैनी एक जिंगल को गुनगुनाते हुए आपके मन में कभी उसके गायक, म्यूजिक कंपोजर या राइटर के बारे में जानने के लिए कभी नहीं पैदा होती. फिल्म पसंद आने पर आप डायरेक्टर का नाम जानना चाहते हैं ताकि उसकी निर्देशित अन्य फिल्में भी देख सकें. लेकिन किसी विज्ञापन के डायरेक्टर के बारे में जानने की कोशिश आपने शायद ही कभी की हो. विज्ञापनों में इस्तेमाल किए गए जुमलों को आप रोजमर्रा की जिंदगी में धड़ल्ले से यूज करते हैं, लेकिन वे किसके दिमाग की उपज होंगे, यह बात कभी आपके दिमाग में नहीं आती. विज्ञापन में दिखने वाले जिस मॉडल से प्रेरित होकर आप एक उत्पाद खरीदने का फैसला करते हैं, अगर वह खेल या सिनेमा की दुनिया की सेलिब्रिटी नहीं है तो आपको इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसका एक अदद नाम भी होगा, जो आपको पता होना चाहिए.

यह सिर्फ विज्ञापन ही हैं, जो सर्जक के बारे में कुछ नहीं बताते. वर्ना हर किताब के साथ उसके लेखक, प्रकाशक, संपादक, अनुवादक का नाम होता है. हर पेंटिंग या कार्टून पर किसी न किसी कोने में उसके रचयिता के हस्ताक्षर मिल जाते हैं, हर फिल्म में उसके निर्माण में योगदान देने वालों की एक लंबी फेहरिश्त फिल्म के शुरू में अथावा आखिर में नजर आ ही जाती है, नाटकों तक में नाटक से पहले या बाद में उससे जुड़े लोगों का परिचय दर्शकों को दे ही दिया जाता है...कहने का आशय यह है कि सृजन की हर विधा में सर्जकों का नाम प्रस्तुत करने की परंपरा है, सिर्फ विज्ञापनों को छोड़कर. प्रिंट  में कम से कम विज्ञापन रचने वाली एजेंसी का तो नाम होता है, लेकिन टीवी और न्यूमीडिया एडवर्टाइजिंग में वह भी गायब हो जाता है. 

एक आम आदमी तो छोडि़ए, विज्ञापन की दुनिया से संबंध रखने वाला भी शायद ही कोई व्यक्ति हो, जो विज्ञापन रचना से जुड़े पचास नाम भी गिना पाए. यहां तक कि अगर  प्रह्लाद कक्कड़, एलिक पद्मसी, पीयूष पांडे जैसे एडवर्टाजिंग सेलेब्स की भी बात करें तो एक दर्जन नाम से आगे शायद ही आगे बढ़ पाएं. बेहतरीन से बेहतरीन परफॉर्म  करने वाला भी इसमें गुमनाम ही बना रहता है. नाम होता है, लेकिन इससे निकलकर दूसरी दुनिया में आने के बाद. आज थिएटर और फिल्मों की कई नामचीन हस्तियां हैं, जिनका उद्भव विज्ञापन की दुनिया से हुआ है. श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, जान मैथ्यू,अनुभव सिन्हा जैसे प्रसिद्ध निर्देशक,  जैकी श्राफ, प्रीति जिंटा, मिलिंद गुणाजी, मिलिंद सोमन जैसे कलाकार, प्रसून जोशी जैसे गीतकार, लुईस बैंक्स जैसे संगीतकार...सबकी प्रतिभा की फसल विज्ञापनों की जमीन से ही खादपानी लेकर परवान चढ़ी है. 

हर सर्जक को उसके सृजन का श्रेय मिलना चाहिए, इससे भला किसे इंकार होगा. लेकिन, विज्ञापनों की दुनिया में ऐसा शायद इसलिए नहीं हो पाता कि इसमें जो टारगेट आफ आडियेंस है, वह खरीदार नहीं है. आप किताब पढ़ने के लिए पैसा देते हैं, फिल्म देखने के लिए पैसा देते हैं, टीवी देखने के लिए नियमित भुगतान करते हैं,  नाटक या संगीत प्रस्तुतियों का आनंद लेने के लिए पैसा चुकाते हैं, लेकिन आपको विज्ञापन मुफ्त में मिलते हैं. आप चाहे एक मैगजीन खरीदें या सिनेमा का टिकट या किसी चैनल का सब्सक्रिप्शन लें, विज्ञापन आपको साथ में वैसे ही फ्री मिलते हैं, जैसे चाय के पैकेट के साथ सिरामिक कप...

इसी लिए विज्ञापन का बाजार केंद्रित मनोविज्ञान किसी भी विज्ञापन की गहराई में जाने का अवसर नहीं देता. क्योंकि इसमें खरीदार वह है, जिसे खुद को बेचना है. वह विज्ञापन बनवाने के लिए पैसा भुगतान करता है, उसे आप तक पहुंचाने के लिए पत्र-पत्रिकाओं, टीवी चैनलों, रेडियो को पैसा देता है. चाहे यह स्पेस सेंटीमीटरों में हो या सेकेंडों में, उसका खरीदा होता है और उसके मनचाहे इस्तेमाल का उसे पूरा हक देता है. जाहिर है कि इस स्पेस या टाइम का हर अंश वह अपने उत्पाद को बेचने के लिए ही इस्तेमाल करेगा. न कि उन एक दर्जन लोगों को, जो उस विज्ञापन के निर्माण से जुड़े हुए हैं. और जिन्हें ये फ्री में मिलते हैं, उन्हें इनके इतिहास, भूगोल और ज्यामिती के जानने न जानने से कोई फर्क नहीं पड़ता और न ही इसकी कोई जरूरत महसूस होती है.

संदीप अग्रवाल
नागपुर

Thursday, April 4, 2013

दावे हैं, दावों का क्या


विज्ञापनों की दुनिया में वादों, दावों और छलावों में बहुत ज्यादा फर्क नहीं है. लेकिन, जब मकसद सिर्फ बेचना हो, तो इस बेचने के लिए खरीदार को फुसलाने के लिए उसे किसी भी तरह से गुमराह किया जा सकता है. और यह कोई आज
से नहीं हो रहा है, सदियों से हो रहा है. चाहे वह पानी मिले दूध को ‘पियोर’ बताकर बेच रहा ग्वाला हो, या सड़े फलों को ‘फिरेश’ बताने वाला रेहड़ीवाला. चाहे घटिया कपड़े को ‘लाइफलोंग’ कहकर बेचता कपड़ेवाला हो या एक लीटर घी को एक किलो कहकर तोलता लाला. जो भी बेच रहा है, उसे बेचने के लिए झूठ बोलने में जरा भी हिचक, शर्म या डर नहीं है.

इससे बेहतर ला दो तो मूंछे मुंड़ा दूँ, ऐसा सुरमा जिसे आंखों में लगाकर दिन में तारे नजर आ जाएं, इस तेल को लगाने से गंजे सिर पर बालों की फसल लहलहाने लगेगी, यह बाम 36 तरह के दर्दों से छुटकारा दिलाता है...होश संभालने से लेकर अब तक हम ऐसे सैकड़ों दावों और वादों को फुटपाथ और बस-ट्रेनों में सामान बेचने वालों से सुनते बड़े हुए हैं. पर हमने न किसी को मूंछे मुंडाते देखा है, न किसी को यह पुष्टि करते कि उसे फलां सुरमा लगाने से दिन में तारे दिखाई देने  लगे हैं, 36 तरह के दर्द से छुटकारा दिलाने वाला बाम 37 वां दर्द पैदा कर जाता है, गंजेपन का तेल लगाते-लगाते सिर की बजाए हथेलियों पर बाल उग आते हैं...लेकिन, दावे करने वालों के माथे पर शिकन तक नहीं आती. उनका काम बदस्तूर जारी रहता है. कभी-कभी कोई शिकायत लेकर उनसे लड़ने भी पहुंच जाए तो ये उल्टे उसी की गलती बताते हैं और उसे एक और ‘शीशी’ थमाकर फिर से झांसे में ले लेते हैं.

इलीट नजरिए से यह भदेस बाजार है, छोटे लोगों की छोटी-छोटी मक्कारियां हैं. लेकिन, इन्हीं छोटे मक्कारों ने अरबों-खरबों के टर्नओवर वाले ‘बड़े’ कारोबारियों को राह दिखाई है. इसीलिए अजीब नहीं लगता, जब कोई टूथपेस्ट दांतों की सारी समस्याओं से छुटकारा दिलाने की बात करता है या कोई क्रीम सांवले लोगों को गोरेपन का वरदान देती नजर आती है, या कोई एनर्जी फूड नाटे बच्चों की लंबाई को साल में दो फुट बढ़ाता है तो दूसरा उसे स्मार्ट बनाता है.



रात को बारह बजे के बाद से सुबह करीब आठ बजे के दरम्यां दो दर्जन से ज्यादा चैनलों पर टेली शॉपिंग में प्रचारित उत्पादों ने तो दावों की सारी हदें ही पार कर दी हैं. ये आपको मोटापे, छोटे कद,डायबिटीज, इनफर्टिलिटी, बड़े-छोटे स्तनों, नपुंसकता जैसी शारीरिक व्याधियों से ही नहीं, बल्कि बुरी नजर, दुर्भाग्य और प्रेतात्माओं जैसी परालौकिक चीजों तक से छुटकारा दिलाने का दम भरते हैं. और इन दावों में विश्वसनीयता का परिमाण बढ़ाने के लिए ये टेलीविजन और फिल्मों के कुछ फुसर्तिया सितारों को भी भाड़े पर ले आते हैं.

ऐसा नहीं इन झूठे वादों-दावों पर किसी की नजर नहीं जाती. समय-समय पर इनके खिलाफ शिकायतें भी हुई हैं और कार्रवाईयां भी. कई बड़ी कंपनियों को एएसआई (एडवर्टाइजिंग स्टैंडर्ड काउंसिल ऑफ इंडिया) के आदेश पर अपने विज्ञापनों को वापस लेना पड़ा है. पिछले साल नवंबर में नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी के कुछ स्टुडेंट्स ने झूठे दावे करने के लिए दस एमएनसीज के खिलाफ केस दायर किया था. इसके दो ही हफ्तों के भीतर, फूड सेफ्टी स्टैंडड्र्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने भी 38 कंपनियों को नोटिस भेजा था, जिनके विज्ञापन भ्रामक पाए गए थे. उनका कहना है कि झूठे दावों वाले विज्ञापन न सिर्फ अनैतिक हैं, बल्कि अनेक कंज्यूमर राइट्स का वॉयलेशन भी करते हैं. ऐसे ही कई मामले इंडीविज्युअल्स द्वारा की गई पहलकदमियों के भी सामने आए हैं.

लेकिन, ऐसे छलिया विज्ञापनों की तादाद अभी भी इतनी ज्यादा है कि कोई भी कदम अपर्याप्त ही प्रतीत होता है. इनके पक्षधरों का कहना है कि एक ओपेन मार्केट इकोनॉमी में कम्पटीशन इतना ज्यादा है कि अपने प्रोडक्ट को बेचने के लिए बढ़ा-चढ़ाकर दावे करने ही पड़ते हैं और आज का उपभोक्ता कोई बेवकूफ नहीं है, उसे इस बात की पूरी जानकारी है कि किसी चीज के असर की क्या लिमिटेशंस हैं.

तो क्या यह माना जाए कि सिर्फ झूठ के सहारे ही उत्पाद को बेचा जा सकता है? या फिर यह विद्या सिर्फ एक बार ही काम करती है? इस बारे में बहुत यकीनी तौर पर कुछ कह पाना बहुत मुश्किल है. क्योंकि इस बारे में यूनिवर्सल ट्रुथ जैसी कोई चीज लागू नहीं होती. कई बार अनुभव हमारा अगला कदम निर्धारित करता है, जिसके आधार पर हम किसी चीज हो दोबारा खरीदने या न खरीदने का फैसला लेते हैं, तो कई बार हमारी मासूम उम्मीदें हमारी समझदारी पर भारी पड़ जाती हैं और हम एक ही चीज को ठगे जाने के बावजूद लंबे अर्से तक बार-बार खरीदते रहते हैं. पर यह तय है कि लॉन्ग टर्म में ‘पहले इस्तेमाल करें, फिर विश्वास करें’ का फंडा ही ज्यादा कारगर साबित होता है. इसी चीज को ब्रांड वैल्यू कहते हैं, जब विज्ञापनों में किए गए दावों से ज्यादा हमारे खुद के या परिचितों के अनुभव हमें किसी खास ब्रांड के खास उत्पाद को खरीदने-आजमाने के लिए प्रेरित करते हैं. गारंटी तो सभी देते हैं, लेकिन हमारे लिए हमारी संतुष्टि किसी भी गारंटी या वारंटी से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है.

एक पुरानी कहावत है कि सच जितनी देर में बिस्तर से उतर कर अपने जूते पहन रहा होता है, झूठ उतनी देर में दुनिया का सफर तय कर आता है. लेकिन, कामयाबियों का इतिहास यह भी कहता  है कि झूठ अपने इस सफर में इतना थक चुका होता है कि दोबारा कहीं जाने के काबिल नहीं रहता और सच धीरे-धीरे ही सही, मगर चलता रहता है.

चलते-चलते
एक बार एक आदमी को अपना बंगला बेचने की जरूरत आन पड़ी. अच्छे दाम मिलें, इस उम्मीद के साथ उसने एक विज्ञापन एजेंसी की सेवाएं लीं. जब एजेंसी ने उसका विज्ञापन तैयार करके अप्रूवल के लिए उसके पास भेजा तो  विज्ञापन
में उसके बंगले की इतनी तारीफ की गई थी कि उसने बंगला बेचने का अपना
इरादा ही बदल दिया.


संदीप अग्रवाल