Friday, May 18, 2012

कमाल के किरदार !



किसी भी रचना और किरदार का रिश्ता ऐसा ही होता है, जैसा कि जिस्म का और रूह का. रचना अगर जिस्म है, तो किरदार उसकी रूह. फिल्मों, उपन्यासों, कहानी-नाटकों से कलाकृतियों तक, किरदार लगभग हर जगह मौजूद रहता है...किरदार न हो तो रचना कितनी भी महान क्यों न हो, दर्शक-पाठक से नाता नहीं जोड़ पाती. 

और तो और, अब तो विज्ञापन भी किरदार के बिना अधूरे से ही लगते हैं...खासकर टेलीविजन के विज्ञापन. जब से टेलीविजन के पर्दे पर रंग उतरे हैं, तभी से विज्ञापनों की रचनात्मकता ने सिर्फ ‘उत्पाद के फोटो के साथ उसे इस्तेमाल करने का मशवरा/गुजारिश/लालच देते  मॉडल्स’ वाले दौर से बाहर निकलने की कवायद शुरू कर दी थी, जो बढ़ते-बढ़ते ऐसे मुकाम पर आ चुकी है, जहाँ प्रोडक्ट से ज्यादा किरदार अपना असर छोड़ जाते हैं.

एक किरदार के तौर पर स्टारडम की बुलंदियों को छूने वाला पहला नामधारी ( जिसकी पहचान उसके नाम से की जा सके) किरदार संभवतः ललिता जी का है, जो तर्जनी से माथे को ठकठकाकर बोली गई अपनी पंचलाइन ‘सर्फ की खरीदारी में ही समझदारी है’ से टेलीविजन दर्शकों के दिलो-दिमाग पर छा गई थीं. इससे पहले सिर्फ फिल्मी सितारों की केंद्रीय भूमिका वाले विज्ञापन ही ऐसी छाप छोड़ पाते थे. एक अल्पज्ञात, नॉन स्टार मॉडल को मिले इस अप्रत्याशित स्टारडम ने ‘फेस टू नेक्स्ट डोर’ वाले ऐसे किरदारों के लिए रास्ता खोल दिया. हालांकि इससे पहले भी ‘न्यूट्रामूल दादा’, ‘कम्प्लान ब्वाय’ जैसे किरदार आ चुके थे. लेकिन बिना एडजेक्टिव के उनकी अपनी कोई शख्सियत नहीं थी.

इसके बाद अनेक विज्ञापनों में,अनेक किरदार सामने आते गए. कुछ आए-गए वाले थे तो कुछ ऐसे, जो दर्शकों की स्मृति में अमर हो गए. कई तो ऐसे भी किरदार आए, जिनके द्वारा विज्ञापित उत्पादों को आप शायद भूल भी गए हों, लेकिन उन किरदारों को नहीं भूले होंगे तो कई किरदार ऐसे भी, जिनके चेहरे भी आपको याद नहीं होंगे, लेकिन नाम नहीं भूले होंगे. क्या आपको पप्पू पास हो गया वाले कैडबरिज के विज्ञापन के पप्पू का चेहरा याद है, एशियन पेंट के विज्ञापन में ‘नया घर, नई गाड़ी, नई मिसेज...बढि़या है ’ में न आपको यह डायलाग बोलने वाले का चेहरा याद होगा, न सुनने वाले का, लेकिन सुनील बाबू नाम हमारी स्मृतियों में ऐसे बैठ चुका है, जैसे कि हमारा ही कोई सगा-संबंधी हो.

एक ओर नाम इतना ठोस असर छोड़ते हैं, वहीं अनेक ऐसे किरदार भी हैं, जिनके नाम विज्ञापन में कहीं नहीं सुनने में आते, लेकिन वो किरदार अपने चेहरों के साथ हमारे दिमाग में दर्ज हो जाते हैं. जैसे नोकिया के विज्ञापन में स्टेटस दिखाने वाला डैडी जी का शोहदा बेटा, सेंटर फ्रेश का ‘पापा, मैं फिर से फेल हो गया...’ बताकर चांटा खाने वाला बेटा, कुरकुरे की जूही चावला, महाशय दी हट्टी यानी एमडीएच मसालों के विज्ञापन में राजा-महाराजा की तरह हाथी पर सवार होकर आने वाले वयोवृद्ध महाशय जी, वोडाफोन (पहले हच) का हर समय पीछे-पीछे चलने वाला मासूम सा डॉगी, अंजान लड़की से चाकलेट मांगकर उसे घर छोड़ने का ‘अच्छा काम’ करने वाला एक सामान्य रंगरूप वाला नौजवान, मेंटोस खाकर बंदर से आदमी बनने वाला बंदर और दद्दू...सिलसिला लगातार जारी है. 

आज भी हमारे पास तरह-तरह के किरदार हैं... हर समस्या के समाधान का आइडिया देने वाले ‘सर जी’, हर मुश्किल हालात को अपने अनूठे अप्रोच से दिलचस्प बना देने वाले एनिमेटेड जोजो, माथे पर त्यौरियां चढ़ाए रहने वाला बॉस  हरी साडू, पेस्ट लेकर कीटाणुओं से लड़ते पप्पू और पापा, अपने ही बैंक को लूटने आया बेवकूफ सिक्योरिटी गार्ड बजरंगी, फ्लर्ट दोस्त को ठेंगा दिखाती अपर्णा उर्फ एप्स, पिताजी की पतलून को छोटी कराने आए भुलक्कड़ रमेश-सुरेश...एक लंबी फेहरिश्त है ऐसे किरदारों की, जो टेलीविजन के रास्ते आपके ड्राइंग-रूम में ही नहीं, बल्कि आपके सब कॉशस में प्रवेश कर चुके हैं.

पिछले कुछ अर्से से फिल्मों में नजर आने वाले किरदारों को हुबहू उसी तरह विज्ञापन में उतारने का एक नया चलन शुरू हो गया है. मसलन, सलमान खान दबंग के चुलबुल पांडे के गेटअप में एक खास ब्रांड की मोटरसाइकिल पर बैठकर बिल्ला का पीछा करते हैं तो सैफ खान एजेंट विनोद के गेटअप में पुंगी बजाते हुए एक बनियान का प्रचार करते नजर आते हैं...और रणवीर कपूर ने तो सभी को पीछे छोड़ दिया है. बाकी किरदार जहाँ फिल्म के रिलीज होने के बाद विज्ञापन में नजर आए, वहीं उनकी  फिल्म बर्फी के रिलीज से पहले ही वे उसके एक किरदार के गेटअप में अभी से एक सेल्युलर फोन सर्विस का एड करते नजर आ रहे हैं. अभी तक फिल्मों के बीच में प्रोडक्ट का चुपके से प्रचार करने का चलन था, जिसे सेरोगेट एडवर्टाइजिंग कहा जाता है. रणवीर ने टेबल उलट दी है, अब विज्ञापन के बीच फिल्म का प्रचार हो रहा है. सही है, कभी नाव गाड़ी पर तो कभी गाड़ी नाव पर... 

चलते-चलते
एक किरदार किस तरह वक्त के तमाम थपेड़ों को धता बताते हुए हमेशा तरोताजा बना रह सकता है, इसकी सबसे बेहतरीन मिसाल है अमूल की ‘‘अटरली...बटरली...सो डिलीसियस’’ सीरीज की मपेट गर्ल और उसके संगी-साथी....जो पिछले साढे़ चार दशकों से, देश-दुनिया की हर छोटी-बड़ी घटना पर अपनी चुटीली और रचनात्मक टिप्पणियों से हर उम्र के उपभोक्ताओं को लुभाती चली आ रहे हैं. दिलचस्प बात यह है कि अमूल गर्ल की रचना पोल्सन बटर गर्ल को मात देने के लिए की गई थी. 1967 में शुरू हुई यह विज्ञापन श्रंखला, विश्व की सबसे लंबे समय तक चलने वाली सीरीज बन गई है. 1976 के बाद आई इसकी चुनिंदा कहानियां  http://www.amul.com/m/amul-hits वेबसाइट पर संयोजित हैं. चाहे तो आप भी तीन पीढि़यों से चले आ रहे इस सागा का लुत्फ उठा सकते हैं.

संदीप अग्रवाल , नागपुर 




Monday, May 14, 2012

ये ‘अंडर’ की बात है...




वर्षों पहले रेडियो पर एक विज्ञापन लगभग रोज सुनने को मिलता था, जिसमें एक पात्र दूसरे से पूछता है कि क्या बात है, बड़े खुश नजर आ रहे हो? दूसरा जवाब देता था, ये अंदर की बात है. इस पर पहला पूछता था कि क्यों, रूपा बनियान पहन रखी है क्या? और दूसरे की हाँ में स्वीकारोक्ति और श्रोताओं को रूपा बनियान पहनने के सुझाव के साथ विज्ञापन खत्म हो जाता था. 

अब टेलीविजन, खासकर सेटेलाइट टेलीविजन के वर्चस्व से अंदर की बात पूरी तरह बाहर आ गई है. अब टेलीविजन पर अंडरगारमेंट्स के विज्ञापनों को देखना, तरह-तरह के अनुभव देता है. ये कभी हमें हंसी दिलाते हैं, कभी खिझाते हैं और कभी बुद्धू बनाते हैं.

एक विज्ञापन एक खास किस्म का बनियान पहनकर कभी आपको थिएटर की टिकट विंडो पर लगी लंबी लाइन में सबसे आगे खड़े होने का अधिकार दिलाता है और कभी ट्रैफिक पुलिसमैन को सड़क मंत्री की लाल बत्ती वाली गाड़ी को आपके रास्ते में आने से रोकने की ताकत देता है. वहीं दूसरे विज्ञापन में एक ब्रांड विशेष का बनियान पहनने वाला अभिनेता, बड़े आराम से तीन-चार गुंडों को विकलांग बना देता है, कत्ल की गुत्थी सुलझा लेता है. तो एक और विज्ञापन का नायक ‘ईव्ज टीजर्स’ के होश ठिकाने लगा देता है. एक और अंडरवियर विज्ञापन पहनने वाले को दुर्घटनाओं से बचाता है.

अब आप सोचते रहिए कि एक अंडरवियर में ऐसे कौन से तत्व होते हैं, जो पहनने वाले में इतनी ताकत भर देते हैं कि वह चार-छह खतरनाक बदमाशों से अकेले निपट सके. उसमें कौन से पवित्र मंत्र लिखे होते हैं, जो पहनने वाले को आने वाली आपदाओं से बचाते हैं. आपको इस सवाल का भी कोई गले उतरने वाला जवाब शायद ही मिले कि कपड़ों के नीचे पहनने वाली चीज की ब्रांड वैल्यू क्यों होती है और क्यों एक ब्रांड का अंडरवियर, दूसरों के मुकाबले दो से तीन गुनी कीमत वसूलता है.

इस ब्रांड को पहनने वालों का तर्क है कि यह उन्हें आत्मविश्वास से भर देता है.एक अंडरवियर का तो ब्रांड नेम ही आपको वीआईपी होने की अनुभूति देता है. इस फीलिंग के पीछे क्या लॉजिक  है, ये समझना बड़ा मुश्किल है. आप कौन से ब्रांड की शर्ट या जींस पहनकर लोगों से मिलते हैं, ये आपके स्टेटस को स्टैब्लिश करने में मददगार हो सकता है. लेकिन उस शर्ट या पैंट के नीचे आपने किस ब्रांड के अंडरवियर पहने हैं, इसका भी आपके स्टेटस से ताल्लुक है, इसे कैसे एक्सप्लेन किया जाए.

एक बड़ा दिलचस्प सवाल है कि एक सुपरमैन और  कॉमनमैन में क्या फर्क है? जवाब- कॉमन मैन अपना अंडरवियर पैंट के नीचे पहनता है और सुपरमैन पैंट के ऊपर...अगर अंडरवियर्स के एडवर्टाइजमैंट्स के एड- ऑंस  ( कॉन्फिडेंस, लक, चार्म, करेज, स्ट्रेंग्थ आदि ) पर यकीन करें तो इन्हें पैंट के अंदर पहनकर भी एक  कॉमनमैन  सुपरमैन होने की फीलिंग को एन्ज्वाय कर सकता है... और अगर पैंट पहनना भूल जाए तो भी, एक और अंडरवियर के विज्ञापन में सूखता 'ट्विंग' अंडरवियर उठाकर भागने वाले चिंपैंजी की तरह, नईनवेली हाउसवाइफ के शर्माने का आनंद तो ले ही सकता है. 

चलते-चलते...

इन दिनों अंडरवियर बम चर्चा में है. एफबीआई के सूत्रों के मुताबिक एक ब्रिटिश अंडरकवर एजेंट ‘बड़े आराम से’ कुख्यात आतंकवादी ग्रुप अलकायदा की यमन इकाई में सेंध लगाकर घुस गया और उसने अमेरिका में ‘अंडरवियर बम विस्फोट’ से विमान उड़ाने की साजिश को नाकाम कर दिया. इस घटना पर  भी तो एक और एडवर्टाइजमैंट बनाया जा सकता है ना?

Saturday, March 17, 2012

दबंग बीबियों की दुनिया

हकीकत में हमारे देश में स्त्रियों की चाहे जो दशा हो, लेकिन विज्ञापनों की दुनिया में उसकी छवि बहुत तेजी से बदल रही है. सिनेमा और सोप ओपेराज में बेशक वह अभी भीडॉल याआइडोल की स्टीरियोटाइप इमेज में कैद हो, लेकिन विज्ञापनों की औरत इस ककून को तोड़कर बेहद कॉन्फिडेंट और अपनी डिग्निटी को लेकर बहुत कॉशस नजर आने लगी है. इन विज्ञापनों में चाहे वह किसी भी भूमिका का निर्वहन कर रही हो, लेकिन अपनी अस्मिता से कोई समझौता उसे स्वीकार नहीं है. यह कुछ साल पहले तक छोटे पर्दे के विज्ञापनों पर हावी उस दौर के एकदम उलट है, जब वह किचेन में खाना पकाने या बाथरूम में कपड़े धोने के अलावा कोई और काम करते नजर ही नहीं आती थी.
खासकर, विज्ञापनों में दिखने वाली बीबियों के एटिट्यूड में तो जबर्दस्त क्रांतिकारी बदलाव आया है. अगर आपको बरसो पुराना वह विज्ञापन याद है, जिसमें एक दुकानदार अपने ग्राहक को राय देता है कि अगर वह अपनी बीबी को सचमुच प्यार करता है, तो उसे एक खास ब्रांड का कुकर खरीदना चाहिए. लेकिन, अब प्यार को साबित करने के लिए सिर्फ इतना भर काफी नहीं है. आज की विज्ञापन-नायिका हर चीज में बराबरी का हक मांगती नजर आती है. कहीं वह अपनी पसंद का सीरियल न देखने देने पर सजा के तौर पर उसे ऑफिस में लंच के लिए खाली टिफिन थमा देने या लिफ्ट की बजाए सीढि़यों से जाने के लिए मजबूर कर देने का दम रखती है तो कहीं वह उसके आग्रहकी परवाह न करते हुए अपने थ्रीजी के साथ बिजी नजर आती है. ऐसे बहुत सारे विज्ञापन आप इन दिनों देख सकते हैं, जिनमें नारी घर-परिवार पर अपनी हुकूमत का झंडा फहराती नजर आती है. घर और पति पर वह दबदबा जरूर बनाकर रखती है, लेकिन दादागिरी नहीं चलाती.
यह सही है कि वह अर्धांगिनी से स्वामिनी में बदल गई है. लेकिन, इसका अर्थ यह नहीं कि उसकी भूमिका सिर्फ अधिकार और बागडोर हासिल कर लेने तक ही सीमित है. वह सिर्फ परिवार के हाथों में थामी डोरियों से बंधी कठपुतली के खोल से बाहर आई है, अपने दायित्वों के नहीं. जितनी सजग वह एक गृहिणी के रूप में अपने अधिकारों को लेकर है, उतनी ही अपनी जिम्मेदारियों को लेकर भी है. वह देश की हालत पर खिन्न अपने पति को सोच बदलकर देश बदलने का गुरुमंत्र दे सकती है, ओवरवेट हो जाने पर उसके जन्मदिन पर उसे एक पर्सनल ट्रेनर गिफ्ट में दे सकती है. वह अपनी पसंद के साथ-साथ अपने पति और बच्चों का भी पूरा ख्याल रखती है. एक वित्तीय संस्थान के विज्ञापन में वह खर्चीले पति को खर्च से रोकती नजर आती है, ताकि उनके भावी बच्चे का भविष्य सुरक्षित रहे. यही नहीं, पति के लिए एक दोस्त की भूमिका निभाने में भी वह पीछे नहीं है. वह उसके साथ आंख-मिचोली खेलते हुए शरारतन अपनी बूढ़ी गवर्नेंस को उसके सामने लाकर खड़ा कर सकती है, उससे छुआछुई खेल सकती है और मोच आने पर उससे सिर्फ एक प्रेमासिक्त स्पर्श की अपेक्षा करती है. एक सच्ची सहचरी की तरह वह हर जरूरत के वक्त उसके साथ है.
इन्हीं विज्ञापनों के बीच के खाली स्लॉट में जब आप कोई ऐसा सास-बहू कार्यक्रम देखते हैं, जहाँ वह या तो साजिशों से बचने में मशगूल है या साजिशें रचने में तो आप इन विज्ञापनों को याद करके सुकून की सांस ले सकते हैं कि कोई तो जगह है, जहाँ एक हिंदुस्तानी बीवी को उसके सही रूप में पेश करने की ईमानदार कोशिश की जा रही है.
-संदीप अग्रवाल

Thursday, February 9, 2012

लालच अहा लप-लप...


इंसानी जज्बातों की दो किस्में होती हैं, एक में प्रेम,करुणा, परोपकार, सहानुभूति, खुशी आदि आते हैं तो दूसरी में क्रोध, ईष्र्या, घृणा, भय, लालच जैसी नकारात्मक भावनाएं. इनमें लालच एक ऐसी भावना है, जो समस्त नकारात्मक भावनाओं की वजह बनने में सक्षम होती है. आखिर हमारी संस्कृति में सदियों से लालच को ‘बुरी बला’ माना जाता रहा है, तो यह अकारण नहीं है. न सिर्फ हमारी, बल्कि पाश्चात्य संस्कृति भी ‘ग्रीड’ को ‘ सीड आफ आल एविल्स ’ मानती है. लेकिन, विज्ञापनों की दुनिया में ‘ग्रीड’ कोई बुरा शब्द नहीं है. बल्कि सम्पूर्ण कारोबारी मनोविज्ञान का बीज मंत्र है.

यही ग्रीड है, जो किसी मगरमच्छ को एक केंडी के पीछे-पीछे किसी के घर तक ले आता है, वानर मदारी को बालीवुड में अपने कनेक्शंस की धौंस दिखा रही नाराज नचनिया को जाने से रोक देता है. प्रमोशन के लालच में एक दंपत्ति को नया कुकर खरीदकर लाने और उसमें खाना पकाकर ‘ अफसर’ को खुश करने के लिए प्रेरित करता है. रिसाव रोकने वाले एक पेस्ट के विज्ञापन में लालच की इस भावना का बेहद खूबसूरत इस्तेमाल किया गया है. इसमें मृत्यु शैया पर लेटे एक वृद्ध को घेरे खड़े उसके रिश्तेदार एक चेक पर उससे एक के बाद लगातार शून्य पर शून्य लगवाए जा रहे हैं. इसी बीच वृद्ध की मौत के साथ ही छत से पानी की एक बूंद टपकती है और पहले अंक पर गिरकर चेक की रकम को सिर्फ चंद शून्यों में बदलकर रख देती है...


ये तो वो विज्ञापन हैं, जो लालच को एक विषय की तरह इस्तेमाल करके बनाए गए हैं. लेकिन, अगर देखा जाए तो नब्बे फीसदी विज्ञापन लालच के इस विशाल वटवृक्ष को लगातार खाद-पानी देते नजर आएंगे. सैद्धांतिक दृष्टि से विज्ञापनों को ‘कृत्रिम आवश्यकताओं का सृजन करने वाली विधा’ के रूप में पारिभाषित किया जाता है, लेकिन असल में तो ये ‘वास्तविक लालच का सृजन ’ करते हैं. किसी परफ्यूम का विज्ञापन आपको आधा दर्जन गर्लफ्रेंड्स पाने का लालच देता है तो कोई अंडरवियर आपको ‘सब कुछ बड़े आराम से’ पा लेने का. कोई विज्ञापन आपके मन में एक डिटर्जेंट के इस्तेमाल से कामयाबी   हासिल कर लेने का लालच देता है तो कोई एक उत्पाद की खरीदारी के साथ सोना बटोरने या लखपति बन जाने का.

'नीड' और 'ग्रीड' के बीच एक बहुत बारीक सी रेखा होती है. विज्ञापनों ने इसे पूरी तरह धुंधला कर दिया है. पहले हम अपनी नीड्स को पूरा करने के मकसद के साथ जीते थे, फिर विज्ञापनों ने हमारी इच्छाओं को हमारी जरूरत में बदल दिया और अब लालच को. ग्रीड के नीड में बदल जाने के इस सफर में विज्ञापन लगातार हमारे हमसफर रहे हैं. लेकिन, एक ऐसा हमसफर जो लगातार आपकी जेब पर नजर गड़ाए हुए है. जाहिर है, आपका ग्रीड, इन विज्ञापनों की नीड है.

हाँ, अगर आपको इस स्थिति से कोई आपत्ति या आशंका है तो इस लेख के दूसरे पैराग्राफ में उदाहरणार्थ दिए गए चैथे विज्ञापन को एक बार फिर से याद कर लीजिए, जो आपको याद दिलाता है कि लालच वाकई एक बुरी बला है.

-संदीप अग्रवाल

Tuesday, January 3, 2012

झूठ बोलूं तो मुझे कौआ काटे...

अक्सर आपने अपने बचपन में मजमा लगाकर अपना सामान बेचने वालों को अपने माल की गुणवत्ता के बारे में बड़े अजीबोगरीब दावे करते सुना होगा कि अगर माल उनके बताए अनुसार न निकला तो वे अपने बाप की औलाद नहीं हैं, या आप उन्हें जिस थाली में कुत्ता खाता है, उसमें खिला सकते हैं और न जाने क्या-क्या...कई तो शालीनता की सीमाओं में नहीं आने के कारण यहां जिक्र के भी काबिल नहीं हैं.
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मार्केटिंग का यह फंडा, फूहड़ तो लग सकता है, लेकिन है बहुत प्रभावी. भोले-भाले हिंदुस्तानी मानस को यह बात बहुत आसानी से समझ में आ जाती है कि कोई यूं ही अपने आपको गाली नहीं देता है. पिछले कुछ सालों में इस फंडे को विज्ञापनों की दुनिया ने बड़ी रचानत्मकता के साथ अपनाया है, वह भी शालीनता को बनाए रखते हुए. वे अपने आप को गाली न देते हुए देखने वालों को खुद पर क करने की सहूलियत देते हैं लेकिन इस चालाकी से कि देखने वाला उन पर क करते-करते यकीन करने लग जाए.

वर्षों पहले एक अगरबत्ती के विज्ञापनों में नायक कुछ बूढ़ों के बीच आकर पचास लीटर दूध देने वाली छह पैरों वाली गाय, नौ फुट लंबे उसके भाई जो हवा में उड़ सकता है के बारे में बताता है तो वे उसकी मजाक उड़ाते हैं, फिर वह घंटों तक जलने वाली अगरबत्ती के बारे में बताता है तो भी उपहास का पात्र बनता है, चिढ़कर वह धन्नो नाम की इस गाय और अपने भाई को आवाज लगाता है, तो बूढ़े उसकी बात मानने के लिए मजबूर हो जाते हैं.

इसी तरह एक कार के विज्ञापन में नायक अदृश्य ग्राहकों की झूठी तारीफ करता है तो उसे बाक्सिंग ग्लोव्स से घूंसे पड़ते हैं, लेकिन जब वह कार की खूबियों के बारे में बताता है और घूंसे के इंतजार में दांए-बांए देखता है और घूंसा नहीं पड़ता तो उसे यकीन आता है कि उसने जो कहा है वह सच है. इसी क्रम में एक फोन सेवा के विज्ञापन में एक तोता चार रुपए में बहुत सारी सर्विसेज मिलने की बात सुनकर वह चिढ़कर कहता है कि अगर यह सच है तो यह भी सच है कि वह दीपिका पादुकोण का ब्वायफ्रेंड है, सलमान उसका बाडी ट्रेनर है और वह काफी पीने के लिए बर्मिंघम पैलेस जाता है.

इन दिनों एक और विज्ञापन आ रहा है जिसमें कार खरीदने आया एक ग्राहक कार के साथ मिलने वाले फायदों की पुष्टि करने के लिए कभी लड़की तो कभी गोरिल्ले का वे धारणकर सेल्समैन के पास आता है. इसी तरह एक बर्गर के एड में पात्र कहता है की अगर इतना  बड़ा बर्गर ४० रुपये में मिल सकता है तो मैं मि. इण्डिया हूँ, और अगले ही पल वो अदृश्य हो जाता है...इस तरह के ऐसे और भी कई विज्ञापन हैं, जो आपको अपने उत्पाद के बारे में बताने के लिए हाथ घुमाकर कान पकड़ने वाल फार्मूला अपनाते हैं.आपके मन में सवाल उठ सकता है कि जब सीधे तरीके से उत्पाद की खूबियों और खासियतों को विज्ञापित करने से काम चल सकता है, तो लोगों की नकारात्मक भावनाओं को छेड़ने की क्या जरूरत है.

दरअसल, यह फंडा उस सिद्धांत पर आधारित है जो ‘दो और दो चार’ जैसे सीधे-सपाट वक्तव्य या ‘दो और दो पांच’ जैसे बड़बोलेपन की बजाए ‘छह माइनस एक बराबर पांच’ के चतुराईपूर्ण और दिलचस्पी जगाने वाले वक्तव्य पर जोर देता है. यह नकारात्मक चीजों के प्रति मनुष्य के स्वाभाविक आकर्षण से भी जुड़ा है. इसलिए अगर एक डिटर्जेंट पाउडर का विज्ञापन आपको उसे खरीदने का आदे देने की बजाए आपको ‘पहले इस्तेमाल करें, फिर विश्वास करें’ की सलाह देता है तो ताज्जुब न करें. आखिर बिना सोचे-समझे किसी भी चीज की खरीदारी में ही समझदारी कैसे हो सकती है.

-संदीप अग्रवाल

Wednesday, November 23, 2011

समाज का आईना बनते विज्ञापन

अपने शुरुआती दौर से ही विज्ञापन जहां भर की आलोचना झेलते आए हैं. इस मामले में सभी विरोधी एक हो जाती हैं. वामपंथी, उपभोक्तावाद और पूंजीवाद को बढ़ावा देने के लिए विज्ञापनों पर लानतें भेजते हैं, तो उनके घोर विरोधी दक्षिणपंथी विज्ञापनों को हमारे महान सांस्कृतिक मूल्यों का शत्रु करार देते हुए सूली पर चढ़ाने के लिए अक्सर लामबंद नजर आते हैं. विज्ञापनों को गरियाने की यही खुजली कई बार मध्यमार्गियों को भी उठती रहती है. आखिर क्या है विज्ञापनों का कसूर? किसी उत्पाद या सेवा को खरीदने के लिए प्रोत्साहित करना अगर गुनाह है तो दुनिया नाम के बाजार में कौन यह नहीं कर रहा? हर शख्स कहीं न कहीं या तो कुछ बेच रहा है, या खरीद रहा है या फिर दोनों काम कर रहा है. फिर क्यों विज्ञापन लगभग हमेशा, लोगों की आंखों की किरकिरी बने रहते हैं? सबसे ज्यादा, शिकायत जिस बात की लोगों को उनसे रहती है, वह यह है कि उन्हें समाज से कोई लेना-देना नहीं होता. वे सिर्फ बेचने के लिए बने हैं और बाकी दुनिया चाहे भाड़ में जाए, पर उन्हें सिर्फ वो उत्पाद बेचना है, जिसे बेचने के लिए उन्हें गढ़ा गया है.

मुमकिन है कि एक दशक पहले तक इस शिकायत को काफी हद तक वाजिब कहा जा सकता हो, लेकिन आज इसका पूरी तरह समर्थन करना उस रचनात्मकता और गंभीरता के प्रति ज्यादती होगी, जो नई सदी के विज्ञापनों की रीढ़ बन चुकी है. बेशक वे साथ ही साथ अपना उत्पाद भी बेच रहे हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे सामाजिक सरोकारों से विलग हैं. आज ऐसे अनेक विज्ञापन हैं, जो समाज की विसंगतियों को उजागर करने का दायित्व किसी भी सार्थक फिल्म अथवा साहित्यिक कृति की तरह बड़ी कुशलता से निर्वहन कर रहे हैं. अगर ऐसा नहीं होता तो

क्यों एक मोबाइल सेवा प्रदाता कम्पनी का विज्ञापन आपको जातिवाद और भाषाई भेदभाव की निरर्थकता का अहसास कराता है? एक चाय की पत्ती के विज्ञापन को क्या गरज है कि वह आपको आपके मत का मोल बताकर आपको मतदान के लिए प्रेरित करे या भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े होने के लिए आपका आह्वान करे, या रिश्वतखोर अधिकारी को शर्मिंदगी का अहसास कराए? एक प्लाई बनाने वाली कंपनी अगर देश की न्यायिक प्रक्रिया की कछुआ चाल पर टिप्पणी करते विज्ञापन को प्रसारण के लिए चुनती है तो क्या उसे कंटेप्ट ऑफ कोर्ट का इल्जाम चस्पां होने का डर नहीं सताता होगा? बालपेन बनाने वाली कंपनी क्यों लिखकर फाड़ देने की बात कहकर राजनीति में बढ़ते अपराधियों के खिलाफ कलम की ताकत को पुन:स्थापित करती है? एक चप्पल बेचने के लिए रचे गए विज्ञापन को क्यों आपका ध्यान सरकारी दफ्तरों में फैली लालफीताशाही की ओर ले जाने के लिए तैयार किया जाता है? इसी तरह एक मोबाइल फोन हैंडसेट के विज्ञापन का नायक एग्जाम का क्वेश्चन पेपर लीक होने पर भी उसकी सहायता नहीं लेता ताकि अपना आत्मसम्मान खोने से बचा सके, तो इसी कंपनी का एक और विज्ञापन ईव्ज टीजर्स को सबक सिखाता नजर आता है. एक टायर कंपनी के विज्ञापन अगर आपको सड़क पर ध्यान से चलने के लिए प्रेरित करते हैं तो कई मोटर साइकिलों के विज्ञापनों में आपने इस बात पर भी गौर किया होगा कि अधिकतर में मॉडल भले ही कितने स्टंट करें, लेकिन सिर पर हेलमेट जरूर पहने नजर आते हैं और कारों के विज्ञापनों में सीट बेल्ट बांधे हुए... सेनेटरी नेपकिन के विज्ञापनों को एक लंबे समय तक अश्लीलता के आरोपों को झेलना पड़ा है, लेकिन क्या आलोचकों ने कभी इस बात पर ध्यान दिया है कि वे बड़ी खामोशी से नारी सशक्तीकरण की प्रक्रिया में अपना योगदान देते हुए नए जमाने की एक बेहद मजबूत, महत्वाकांक्षी, निरंतर सक्रिय स्त्री को पुरुष प्रधान समाज में उसकी असली जगह दिला रहे हैं. यही नहीं न्यूक्लियर फेमिली के इस दौर में आपने कई विज्ञापनों में इस बात पे ज़रूर ध्यान दिया होगा कि उनमे बुजुर्ग और बूढ़े होते माँ-बाप भी प्रमुखता से अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं. इसी तरह अनेक विज्ञापन इस तरह तैयार किए गए हैं जो लोगों को पर्यावरण रक्षा के प्रति जागरूक करें. ऐसे विज्ञापनों की फेहरिश्त इससे कहीं ज्यादा लंबी हो सकती है. और ऐसी समस्याओं की भी, जिन्हें अभी तक विज्ञापनों की दुनिया ने नहीं छुआ है.

कहने का आशय यही है कि विज्ञापन अगर उपभोक्तावाद को उकसा रहे हैं तो साथ ही साथ अलग-अलग तरीकों से देखने वालों को एक सजग, सतर्क, जिम्मेदार नागरिक होने के लिए भी प्रेरित कर रहे हैं, ताकि एक बेहरीन समाज का निर्माण रखा जा सके. इसलिए अगली बार जब आप किसी विज्ञापन को देखें तो उसे सिर्फ उत्पाद बेचने के लिए आए सेल्समैन के रूप में न देखें, बल्कि उस संदेश को भी पकड़ने की जहमत उठाएं, जो बिटविन द लाइंस, वह आपको देने की कोशिश कर रहा है. भले ही आप उस उत्पाद को खरीदें या न खरीदें, लेकिन यह रचनात्मकता आपकी थोड़ी सी सराहना तो डिजर्व करती ही है. नहीं क्या?

Tuesday, November 8, 2011

जुमले जो बन गए जिंदगी !

हाल ही में एक विज्ञापन आया है , जिसमें एक युवक अपनी सुहागरात पर पत्नी के हाथ पर उसके पूर्व प्रेमी के नाम का टैटू देखता है. वह उसे मिटाने के लिए खूब कोशिश करता है, लेकिन नाकाम रहता है. हारकर वह एक सर्जन के पास जाता है. वह भी उसे मिटाने में अक्षमता जाहिर करता है. युवक न मसोसकर हालात से समझौता कर लेता है. लेकिन जब वह पत्नी के कंधे को अनावृत करता है, तो वहां पर उसके दूसरे प्रेमी के नाम का टैटू देखता है. तब हमें पता चलता है कि यह विज्ञापन ब्लैंक सीडी / डीवीडी का है , जो यह संदेश देना चाहती है कि उनपर दर्ज डाटा को भी मिटा पाना नामुमकिन है.

यही बात कई विज्ञापनों के बारे में भी कही जा सकती है , जो सालों से हमारे दिलोदिमाग पर कुछ ऐसे ही दर्ज हैं कि उन्हें मिटाया नहीं जा सकता. और इनमें से कई की पंचलाइनें तो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गई हैं. हमारी बोलचाल में इस तरह शामिल हो चुकी हैं, जैसे कि कभी मुहावरे और कहावतें हुआ करते थे. ऐसा सबसे पुराना जुमला जो याद किया जा सकता है, वह है विल्स सिगरेट का ’मेड फार इचअदर’ करीब तीन दशक पुरानी इस छोटी सी लाइन का इस्तेमाल आज भी अनेक मैरिड कपल , पुराने दोस्तों की सराहना के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

इसी तरह अपने आत्मविश्वास को दर्शाने के लिए एक वक़्त कभी 'कुछ खास है हम सभी में...' का प्रयोग होता था तो वक़्त के साथ कदमताल करते हुए आज 'हम में है हीरो..' का होता है. वहीं किसी की व्यंग्यात्मक प्रशंसा के लिए ' बढि़या है...सुनील बाबू’ या 'पप्पू पास हो गया..' या ऊँचे लोग,ऊँची पसंद...जैसे वाक्यों का इस्तेमाल होता है तो अपनी शैतानियों को जायज ठहराने के लिए ' पागलपंती भी ज़रूरी है ', किसी को आश्वस्त करने के लिए, '‘हम हैं ना...' हमेशा साथ का भरोसा दिलाने के लिए ' जिंदगी के साथ भी , जिंदगी के बाद भी...' खाने के बाद या शगुन के तौर पर ' कुछ मीठा हो जाए...जैसे वाक्य भी हैं , जिन्हें हम अक्सर लोगों को दोहराते सुन सकते हैं. कई पंचलाइने नसीहतों की तरह इस्तेमाल की जाती हैं , जैसे ' दिखावे पे मत जाओ, अपनी अक्ल लगाओ', 'पहले इस्तेमाल करें, फिर विश्वास करें...' तो कई ख्वाहिशें जाहिर करने के लिए, जैसे की 'ये दिल मांगे मोर...' या एक से मेरा क्या होगा...' कई जुमले तो बिना उनका सन्दर्भ जाने भी, लोग बहुत उदारता और बेतकल्लुफी के साथ इस्तेमाल करते हैं. ये तो बड़ा ट्विंग है..., ये आराम का मामला है... जोर का झटका,धीरे से लगे...इसी श्रेणी में आते हैं. जिंदगी का हिस्सा बनते जुमलों की इस परंपरा में हाल ही में एयरटेल का 'जिंदगी में हरेक फ्रेंड जरूरी होता है...' भी शामिल हुआ है , जो यंगस्टर्स के बीच बहुत तेजी से लोकप्रिय हो रहा है और एसएमएस व सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर काफी इस्तेमाल किया जा रहा है.

समय के साथ हर समाज अपने लिए कुछ मुहावरे गढ़ता है. कभी बातचीत में तुलसीदास , रहीम , कबीर जैसे संत कवियों के दोहे शामिल हुआ करते थे , फिर उनकी जगह किताबी मुहावरे और लोक कहावतें आईं, इसके बाद सिनेमा के डायलाग हमारी बातचीत का हिस्सा बने और आज विज्ञापनों की पंचलाइने यह भूमिका अदा कर रही हैं , जो लंबाई में छोटी , मगर अर्थों में व्यापकता की वजह से हमारी भाषा को एक नई धार दे रही हैं.