Monday, July 6, 2015

एक ब्रैन्ड की मौत

वर्षों से इंडिया के लगभग हर मिडिल क्लास और इससे ऊपर के स्तर वाले घर में किसी फेमिली मेंबर की तरह मौजूद रहने वाला मैगी ब्रैन्ड आज अचानक ही ऐसे विलेन में तब्दील हो गया है, जो आस्तीन के साँप की तरह, धीरे-धीरे हमारे शरीर में अपना विष फेला रहा था. इसे अनिश्चितकाल के लिए न सिर्फ भारत, बल्कि दूसरे कई देशों से अचानक ही निर्वासित कर दिया गया है.

किसी ब्रैन्ड के कालकवलित होने का यह पहला मामला नहीं है. बाजार के इस विशाल आकाश में सितारों की तरह जगमगाते अनेक ब्रैन्ड आपको अक्सर उन्हीं की तरह टूटकर गिरते नजर आ जाएंगे. जब तक उनका वक्त और तकदीर बुलंद होती है, वे जगमगाते हैं और फिर धीरे-धीरे उनकी चमक मंद पड़ने लगती हैं और एक दिन वे चुपचाप टूटकर गिर जाते हैं. कुछ अर्सा बाद उनका नाम भी यादों से मिट जाता है.



एक मोटे-मोटे अनुमान के हिसाब से एक एवरेज इंडियन, सुबह उठकर किसी खास ब्रांड का टूथपेस्ट और टूथब्रश इस्तेमाल करने से लेकर रात को एक और पाॅपुलर ब्रांड की मच्छरों को दूर करने वाले मशीन या अगरबत्ती जलाकर सोने तक, रोजाना चार-पाँच दर्जन ब्रैन्डों को तो इस्तेमाल कर ही लेता है. विकसित देशों में यह संख्या दो से तीन गुनी हो सकती है. 

आम-तौर पर किसी भी ब्रैन्ड की उम्र उसके प्रति यूजर की निष्ठा पर निर्भर करती है. लेकिन, यह निष्ठा उसे अमरत्व की गारंटी नहीं देती. कई बार बाजार की ताकतें भी ब्रैन्ड के टिके रहने में सशक्त भूमिका का निर्वहन करती हैं. देखते ही देखते 21 वीं सदी में अचानक ब्रैन्डों की संख्या कई गुना बढ़ गई है और आश्चर्यजनक रूप से इनमें दर्जनों ऐसे ब्रैन्ड मौजूद नहीं हैं, जिनकी 80’ज और 90’ज में तूती बोलती थी. 

वनस्पति घी का पर्याय माना जाने वाला डालडा, वाशिंग पाउडर का दूसरा नाम समझा जाने वाला निरमा, सनलाइट सोप, ओके नहाने का साबुन, लौंग के तेल के सहारे बिकने वाला टूथपेस्ट प्राॅमिस और सिर्फ झाग बनाकर पाॅपुलरटी पाने वाला टूथपेस्ट फोरहंस अब कहाँ हैं? अमिताभ बच्चन जैसे सुपरस्टार को लेकर बेस्ट में यकीन दिलाने वाला बीपीएल टीवी में से कब लोगों का यकीन खत्म हो गया पता ही नहीं चला, इट्स वाचिंग यू का नारा बुलंद करने वाला बुश टीवी, खुद ही नजर आना बंद हो गया. मर्फी रेडियो की आवाज खामोश हो गई, नेशनल के टू-इन की कैसेट अटक गई, कछुआ छाप अगरबत्ती बीच में ही बुझ गई.... ऐसे दर्जनों, सैंकड़ो ब्रैंड जो एक समय हमारे अवचेतन में गहरे तक पैठ बनाए हुए थे, आज उनका जिक्र तक नहीं होता. 

ब्रैन्ड को लंबी उम्र प्रदान करने वाले तत्वों में विज्ञापनों की निरंतरता भी एक प्रमुख तत्व है. तीन दशक पहले तक की स्थिति को देखें तो सिलाई के धागों से लेकर खुजली के मरहम तक, अनेक साधारण सी चीजों तक के विज्ञापन रेडियो-टीवी पर देखने-सुनने को मिल जाते थे. लेकिन, अब प्रचार में एमएनसी की आक्रामक घुसपैठ ने ज्यादातर देसी ब्रैन्ड्स को पटखनी दे दी.  और अब वे टीवी या अखबारों में नहीं, सिर्फ आर्काइव्ज में ही नजर आते हैं. 

और अब जो दौर है, वह किसी भी ब्रैन्ड से लाॅयल्टी प्रदर्शित करने से ज्यादा नए-नए आॅप्शन चुनने में यकीन रखने वाले कन्ज्यूमर्स का है. अपने चहेते किसी भी ब्रैन्ड को हम मिस तो करते हैं, लेकिन जब वह एक बार हाशिए से बाहर हो जाता है तो उसकी जगह दूसरे आॅप्शन को चुनने में हम बहुत ज्यादा वक्त नहीं लगाते. अपने चहेते किसी भी ब्रैन्ड को हम मिस तो करते हैं, लेकिन जब वह एक बार हाशिए से बाहर हो जाता है तो उसकी जगह दूसरे आॅप्शन को चुनने में हम बहुत ज्यादा वक्त नहीं लगाते.

लेकिन मैगी जैसे ब्रैन्ड का, जो कि एक मिडिल क्लास कल्चर को सिम्ब्लाॅइज करता था, का जाना दूसरे ब्रैन्ड्स के बाजार से निर्वासित होने जैसा नहीं है.अगर  ब्रैन्ड स्वाभाविक मौत मरते हैं,  तो  मैगी एक्सीडेंटल डेथ  है, जिस पर शायद ही कोई अफसोस करने वाला मिले. 

Sunday, April 21, 2013

ढूंढते रह जाओगे


अक्सर हम एक से एक बेहतरीन विज्ञापनों से गुजरते हैं, कभी ये विज्ञापन प्रिंट में होते हैं, कभी टीवी के पर्दे पर, कभी किसी और मीडिया पर...किसी का विज्युअल हमें मंत्रमुग्ध कर देता है, किसी के शब्द, किसी का डायरेक्शन हमें बहुत प्रभावित करता है, तो कोई अपनी समग्रता में हमारे दिलो-दिमाग पर अपनी छाप छोड़ जाता है. लेकिन, हम शायद ही कभी यह जानने की कोशिश करते हैं कि आखिर ये बेहतरीन काम, है किसके दिमाग की उपज...और अगर करते भी हैं तो जान नहीं पाते. क्योंकि किसी भी विज्ञापन में उसकी रचना प्रक्रिया से जुड़े लोगों के बारे में जानने का कोई जरिया नहीं होता. ये वो सितारे हैं, जो आसमान में मौजूद होकर उसे रोशन तो करते हैं, लेकिन खुद चमकते नजर नहीं आते. 


विज्ञापन एक ऐसी विधा है, जो ज्ञान, विज्ञान (मानव व्यवहार विज्ञान) कला का अद्भुत संगम है, जैसा कि ज्ञान, सूचना और मनोरंजन की सभी विधाएं होती हैं. आप चाहे एक किताब लीजिए, अखबार लीजिए, नाटक लीजिए, फिल्म लीजिए...या कोई भी मास अपील वाला मीडिया लीजिए, सभी में अच्छे खासे अनुभव और जानकारी की दरकार होती है. लेकिन, विज्ञापन की दुनिया ऐसी है, जहाँ आपको अनुभव और जानकारी के अलावा एक अपने ही किस्म की सतर्कता की भी जरूरत होती है. क्योंकि यहाँ ‘सावधानी हटी, दुर्घटना घटी’ का सिद्धांत किसी भी अन्य मीडिया/विधा की तुलना में ज्यादा काम करता है. बल्कि, हर छोटी से छोटी बात में आपको इसका पालन करना पड़ता है. कभी कोई चीज कानून के खिलाफ जा सकती है, कभी किसी व्यक्ति या समूह की भावनाओं के खिलाफ तो कभी उसके खिलाफ, जिसके लिए वह विज्ञापन किया जा रहा है. 

क्या यह बात आपको हैरान नहीं करती कि इतनी सारी खूबियों से युक्त और हर समय तलवार की धार पर चलने वाले इन सृजनकर्मियों के बारे में आप कभी जान नहीं पाते. दशकों पहले का विज्ञापन भले ही आपके जेहन में आज भी तरोताजा हो, लेकिन आपको यह चीज कभी नहीं अखरती कि आप जिस तरह किसी गीत के पसंद आने पर उसके गायक, संगीतकार या गीतकार का नाम खोजने के लिए बेचैन हो उठते है, उतनी बेचैनी एक जिंगल को गुनगुनाते हुए आपके मन में कभी उसके गायक, म्यूजिक कंपोजर या राइटर के बारे में जानने के लिए कभी नहीं पैदा होती. फिल्म पसंद आने पर आप डायरेक्टर का नाम जानना चाहते हैं ताकि उसकी निर्देशित अन्य फिल्में भी देख सकें. लेकिन किसी विज्ञापन के डायरेक्टर के बारे में जानने की कोशिश आपने शायद ही कभी की हो. विज्ञापनों में इस्तेमाल किए गए जुमलों को आप रोजमर्रा की जिंदगी में धड़ल्ले से यूज करते हैं, लेकिन वे किसके दिमाग की उपज होंगे, यह बात कभी आपके दिमाग में नहीं आती. विज्ञापन में दिखने वाले जिस मॉडल से प्रेरित होकर आप एक उत्पाद खरीदने का फैसला करते हैं, अगर वह खेल या सिनेमा की दुनिया की सेलिब्रिटी नहीं है तो आपको इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसका एक अदद नाम भी होगा, जो आपको पता होना चाहिए.

यह सिर्फ विज्ञापन ही हैं, जो सर्जक के बारे में कुछ नहीं बताते. वर्ना हर किताब के साथ उसके लेखक, प्रकाशक, संपादक, अनुवादक का नाम होता है. हर पेंटिंग या कार्टून पर किसी न किसी कोने में उसके रचयिता के हस्ताक्षर मिल जाते हैं, हर फिल्म में उसके निर्माण में योगदान देने वालों की एक लंबी फेहरिश्त फिल्म के शुरू में अथावा आखिर में नजर आ ही जाती है, नाटकों तक में नाटक से पहले या बाद में उससे जुड़े लोगों का परिचय दर्शकों को दे ही दिया जाता है...कहने का आशय यह है कि सृजन की हर विधा में सर्जकों का नाम प्रस्तुत करने की परंपरा है, सिर्फ विज्ञापनों को छोड़कर. प्रिंट  में कम से कम विज्ञापन रचने वाली एजेंसी का तो नाम होता है, लेकिन टीवी और न्यूमीडिया एडवर्टाइजिंग में वह भी गायब हो जाता है. 

एक आम आदमी तो छोडि़ए, विज्ञापन की दुनिया से संबंध रखने वाला भी शायद ही कोई व्यक्ति हो, जो विज्ञापन रचना से जुड़े पचास नाम भी गिना पाए. यहां तक कि अगर  प्रह्लाद कक्कड़, एलिक पद्मसी, पीयूष पांडे जैसे एडवर्टाजिंग सेलेब्स की भी बात करें तो एक दर्जन नाम से आगे शायद ही आगे बढ़ पाएं. बेहतरीन से बेहतरीन परफॉर्म  करने वाला भी इसमें गुमनाम ही बना रहता है. नाम होता है, लेकिन इससे निकलकर दूसरी दुनिया में आने के बाद. आज थिएटर और फिल्मों की कई नामचीन हस्तियां हैं, जिनका उद्भव विज्ञापन की दुनिया से हुआ है. श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, जान मैथ्यू,अनुभव सिन्हा जैसे प्रसिद्ध निर्देशक,  जैकी श्राफ, प्रीति जिंटा, मिलिंद गुणाजी, मिलिंद सोमन जैसे कलाकार, प्रसून जोशी जैसे गीतकार, लुईस बैंक्स जैसे संगीतकार...सबकी प्रतिभा की फसल विज्ञापनों की जमीन से ही खादपानी लेकर परवान चढ़ी है. 

हर सर्जक को उसके सृजन का श्रेय मिलना चाहिए, इससे भला किसे इंकार होगा. लेकिन, विज्ञापनों की दुनिया में ऐसा शायद इसलिए नहीं हो पाता कि इसमें जो टारगेट आफ आडियेंस है, वह खरीदार नहीं है. आप किताब पढ़ने के लिए पैसा देते हैं, फिल्म देखने के लिए पैसा देते हैं, टीवी देखने के लिए नियमित भुगतान करते हैं,  नाटक या संगीत प्रस्तुतियों का आनंद लेने के लिए पैसा चुकाते हैं, लेकिन आपको विज्ञापन मुफ्त में मिलते हैं. आप चाहे एक मैगजीन खरीदें या सिनेमा का टिकट या किसी चैनल का सब्सक्रिप्शन लें, विज्ञापन आपको साथ में वैसे ही फ्री मिलते हैं, जैसे चाय के पैकेट के साथ सिरामिक कप...

इसी लिए विज्ञापन का बाजार केंद्रित मनोविज्ञान किसी भी विज्ञापन की गहराई में जाने का अवसर नहीं देता. क्योंकि इसमें खरीदार वह है, जिसे खुद को बेचना है. वह विज्ञापन बनवाने के लिए पैसा भुगतान करता है, उसे आप तक पहुंचाने के लिए पत्र-पत्रिकाओं, टीवी चैनलों, रेडियो को पैसा देता है. चाहे यह स्पेस सेंटीमीटरों में हो या सेकेंडों में, उसका खरीदा होता है और उसके मनचाहे इस्तेमाल का उसे पूरा हक देता है. जाहिर है कि इस स्पेस या टाइम का हर अंश वह अपने उत्पाद को बेचने के लिए ही इस्तेमाल करेगा. न कि उन एक दर्जन लोगों को, जो उस विज्ञापन के निर्माण से जुड़े हुए हैं. और जिन्हें ये फ्री में मिलते हैं, उन्हें इनके इतिहास, भूगोल और ज्यामिती के जानने न जानने से कोई फर्क नहीं पड़ता और न ही इसकी कोई जरूरत महसूस होती है.

संदीप अग्रवाल
नागपुर

Thursday, April 4, 2013

दावे हैं, दावों का क्या


विज्ञापनों की दुनिया में वादों, दावों और छलावों में बहुत ज्यादा फर्क नहीं है. लेकिन, जब मकसद सिर्फ बेचना हो, तो इस बेचने के लिए खरीदार को फुसलाने के लिए उसे किसी भी तरह से गुमराह किया जा सकता है. और यह कोई आज
से नहीं हो रहा है, सदियों से हो रहा है. चाहे वह पानी मिले दूध को ‘पियोर’ बताकर बेच रहा ग्वाला हो, या सड़े फलों को ‘फिरेश’ बताने वाला रेहड़ीवाला. चाहे घटिया कपड़े को ‘लाइफलोंग’ कहकर बेचता कपड़ेवाला हो या एक लीटर घी को एक किलो कहकर तोलता लाला. जो भी बेच रहा है, उसे बेचने के लिए झूठ बोलने में जरा भी हिचक, शर्म या डर नहीं है.

इससे बेहतर ला दो तो मूंछे मुंड़ा दूँ, ऐसा सुरमा जिसे आंखों में लगाकर दिन में तारे नजर आ जाएं, इस तेल को लगाने से गंजे सिर पर बालों की फसल लहलहाने लगेगी, यह बाम 36 तरह के दर्दों से छुटकारा दिलाता है...होश संभालने से लेकर अब तक हम ऐसे सैकड़ों दावों और वादों को फुटपाथ और बस-ट्रेनों में सामान बेचने वालों से सुनते बड़े हुए हैं. पर हमने न किसी को मूंछे मुंडाते देखा है, न किसी को यह पुष्टि करते कि उसे फलां सुरमा लगाने से दिन में तारे दिखाई देने  लगे हैं, 36 तरह के दर्द से छुटकारा दिलाने वाला बाम 37 वां दर्द पैदा कर जाता है, गंजेपन का तेल लगाते-लगाते सिर की बजाए हथेलियों पर बाल उग आते हैं...लेकिन, दावे करने वालों के माथे पर शिकन तक नहीं आती. उनका काम बदस्तूर जारी रहता है. कभी-कभी कोई शिकायत लेकर उनसे लड़ने भी पहुंच जाए तो ये उल्टे उसी की गलती बताते हैं और उसे एक और ‘शीशी’ थमाकर फिर से झांसे में ले लेते हैं.

इलीट नजरिए से यह भदेस बाजार है, छोटे लोगों की छोटी-छोटी मक्कारियां हैं. लेकिन, इन्हीं छोटे मक्कारों ने अरबों-खरबों के टर्नओवर वाले ‘बड़े’ कारोबारियों को राह दिखाई है. इसीलिए अजीब नहीं लगता, जब कोई टूथपेस्ट दांतों की सारी समस्याओं से छुटकारा दिलाने की बात करता है या कोई क्रीम सांवले लोगों को गोरेपन का वरदान देती नजर आती है, या कोई एनर्जी फूड नाटे बच्चों की लंबाई को साल में दो फुट बढ़ाता है तो दूसरा उसे स्मार्ट बनाता है.



रात को बारह बजे के बाद से सुबह करीब आठ बजे के दरम्यां दो दर्जन से ज्यादा चैनलों पर टेली शॉपिंग में प्रचारित उत्पादों ने तो दावों की सारी हदें ही पार कर दी हैं. ये आपको मोटापे, छोटे कद,डायबिटीज, इनफर्टिलिटी, बड़े-छोटे स्तनों, नपुंसकता जैसी शारीरिक व्याधियों से ही नहीं, बल्कि बुरी नजर, दुर्भाग्य और प्रेतात्माओं जैसी परालौकिक चीजों तक से छुटकारा दिलाने का दम भरते हैं. और इन दावों में विश्वसनीयता का परिमाण बढ़ाने के लिए ये टेलीविजन और फिल्मों के कुछ फुसर्तिया सितारों को भी भाड़े पर ले आते हैं.

ऐसा नहीं इन झूठे वादों-दावों पर किसी की नजर नहीं जाती. समय-समय पर इनके खिलाफ शिकायतें भी हुई हैं और कार्रवाईयां भी. कई बड़ी कंपनियों को एएसआई (एडवर्टाइजिंग स्टैंडर्ड काउंसिल ऑफ इंडिया) के आदेश पर अपने विज्ञापनों को वापस लेना पड़ा है. पिछले साल नवंबर में नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी के कुछ स्टुडेंट्स ने झूठे दावे करने के लिए दस एमएनसीज के खिलाफ केस दायर किया था. इसके दो ही हफ्तों के भीतर, फूड सेफ्टी स्टैंडड्र्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने भी 38 कंपनियों को नोटिस भेजा था, जिनके विज्ञापन भ्रामक पाए गए थे. उनका कहना है कि झूठे दावों वाले विज्ञापन न सिर्फ अनैतिक हैं, बल्कि अनेक कंज्यूमर राइट्स का वॉयलेशन भी करते हैं. ऐसे ही कई मामले इंडीविज्युअल्स द्वारा की गई पहलकदमियों के भी सामने आए हैं.

लेकिन, ऐसे छलिया विज्ञापनों की तादाद अभी भी इतनी ज्यादा है कि कोई भी कदम अपर्याप्त ही प्रतीत होता है. इनके पक्षधरों का कहना है कि एक ओपेन मार्केट इकोनॉमी में कम्पटीशन इतना ज्यादा है कि अपने प्रोडक्ट को बेचने के लिए बढ़ा-चढ़ाकर दावे करने ही पड़ते हैं और आज का उपभोक्ता कोई बेवकूफ नहीं है, उसे इस बात की पूरी जानकारी है कि किसी चीज के असर की क्या लिमिटेशंस हैं.

तो क्या यह माना जाए कि सिर्फ झूठ के सहारे ही उत्पाद को बेचा जा सकता है? या फिर यह विद्या सिर्फ एक बार ही काम करती है? इस बारे में बहुत यकीनी तौर पर कुछ कह पाना बहुत मुश्किल है. क्योंकि इस बारे में यूनिवर्सल ट्रुथ जैसी कोई चीज लागू नहीं होती. कई बार अनुभव हमारा अगला कदम निर्धारित करता है, जिसके आधार पर हम किसी चीज हो दोबारा खरीदने या न खरीदने का फैसला लेते हैं, तो कई बार हमारी मासूम उम्मीदें हमारी समझदारी पर भारी पड़ जाती हैं और हम एक ही चीज को ठगे जाने के बावजूद लंबे अर्से तक बार-बार खरीदते रहते हैं. पर यह तय है कि लॉन्ग टर्म में ‘पहले इस्तेमाल करें, फिर विश्वास करें’ का फंडा ही ज्यादा कारगर साबित होता है. इसी चीज को ब्रांड वैल्यू कहते हैं, जब विज्ञापनों में किए गए दावों से ज्यादा हमारे खुद के या परिचितों के अनुभव हमें किसी खास ब्रांड के खास उत्पाद को खरीदने-आजमाने के लिए प्रेरित करते हैं. गारंटी तो सभी देते हैं, लेकिन हमारे लिए हमारी संतुष्टि किसी भी गारंटी या वारंटी से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है.

एक पुरानी कहावत है कि सच जितनी देर में बिस्तर से उतर कर अपने जूते पहन रहा होता है, झूठ उतनी देर में दुनिया का सफर तय कर आता है. लेकिन, कामयाबियों का इतिहास यह भी कहता  है कि झूठ अपने इस सफर में इतना थक चुका होता है कि दोबारा कहीं जाने के काबिल नहीं रहता और सच धीरे-धीरे ही सही, मगर चलता रहता है.

चलते-चलते
एक बार एक आदमी को अपना बंगला बेचने की जरूरत आन पड़ी. अच्छे दाम मिलें, इस उम्मीद के साथ उसने एक विज्ञापन एजेंसी की सेवाएं लीं. जब एजेंसी ने उसका विज्ञापन तैयार करके अप्रूवल के लिए उसके पास भेजा तो  विज्ञापन
में उसके बंगले की इतनी तारीफ की गई थी कि उसने बंगला बेचने का अपना
इरादा ही बदल दिया.


संदीप अग्रवाल

Sunday, March 3, 2013

इमेज के सहारे ब्रांड की बिक्री


वर्षों से तरह-तरह के उत्पादों को बेचने के लिए कंपनियों द्वारा मशहूर हस्तियों का सहारा लिया जाता रहा है. ये हस्तियां ज्यादातर फिल्म, खेल (खासकर क्रिकेट) जैसे आम रुचि के क्षेत्रों से ताल्लुक रखने वाली होती हैं. ऐसी हस्तियां, जिनके बारे में यह माना जाता है कि वे अपने कद्रदानों के कंज्यूमर बिहेवियर को मोटिवेट, इन्फ्ल्युएंस या चेंज करने में सक्षम हैं. लक्स, इस मानसिकता का एक सबसे बड़ा कामयाब उदाहरण है, जिसने करीब सात दशकों से फिल्मी सितारों का सौंदर्य साबुन होने की दावेदारी को बनाए रखा है. ऐसे बहुत से उत्पाद हैं, जिनके मॉडल सेलिब्रिटीज हैं. और बावजूद लोगों की इस चिरशंका के, कि वे खुद शायद ही कभी उन उत्पादों को इस्तेमाल करते हों जिनका कि वे प्रचार करते हैं, वे लोगों को बहलाने में लगभग कामयाब ही रहे हैं. 

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लेकिन, पिछले दो-तीन दशकों में यह परिदृश्य काफी बदल चुका है. विकल्पों और ओवरएक्सपोजर के इस दौर में सेलिब्रिटीज का अनुसरण करने करने की आम प्रवृत्ति घट रही है. अब हर शख्स अपने उठाए हर कदम का फैसला खुद करना चाहता है, सुझाए नुस्खों को आजमाने की बजाए खुद नए प्रयोग करना चाहता है. जरूरी नहीं कि वह वही साबुन या शैंपू इस्तेमाल करे, जो उसका प्रिय खिलाड़ी या फिल्मी सितारा करता है. ऐसे में विज्ञापन की दुनिया ने एक नया पैंतरा आजमाना शुरू किया है, सेलिब्रिटीज की सितारा हैसियत की बजाए उनकी पॉपुलर इमेज को कैश करने का. 

इसमें सबसे आगे हैं, नवाब सैफ अली खान पटौदी जिनकी प्लेब्वाय की पॉपुलर इमेज को उनके किए अस्सी फीसदी विज्ञापनों में कैश होते देखा जा सकता है. करीना से उनके रोमांस के दो-तीन सालों में न सिर्फ उनकी इस छवि, बल्कि इस ओवरहाइप्ड रिश्ते का भी भरपूर दोहन किया गया है. इसी तरह अक्षय कुमार अपनी एक्शन किंग की फिल्मी इमेज का फायदा विज्ञापनों में भी उठाते नजर आते हैं. कहीं वे एक कोल्डड्रिंक के लिए पहाड़ से छलांग लगाते हैं तो कहीं एक साथ दस-दस शोहदों के छक्के छुड़ाते हैं. इसी प्रकार का दोहन हम खान त्रयी के अधिकतर विज्ञापनों को देख सकते हैं. सलमान खान के विज्ञापनों में वे अपनी ऑनस्क्रीन छिछोरेपन और चुलबुलेपन की मिली-जुली छवि के साथ उपभोक्ताओं को रिझाते देखे जा सकते हैं, तो शाहरुख का रीयल लाइफ का,गलती से आत्मविश्वास समझ लिए जाने वाले अहंकार को प्रदर्शित करता चेहरा विज्ञापनों में भी उसी अकड़ के साथ नजर आता है. इन दोनों के विपरीत तीसरे खान यानि आमिर की रीयल लाइफ की सहजता वाली छवि विज्ञापनों में भी उपभोक्ताओं से उसी सहजता से पेश आती नजर आती है और मि. परपेक्शनिस्ट का टैग वे विज्ञापनों में भी उसी नफासत के साथ कैरी करते हैं. रणवीर की अलमस्त सम्पन्नता, हृतिक रोशन की अतिआत्मविश्वास से भरपूर अभिजात्यता, जूही का चुलबुलापन, करीना कपूर का नकचढ़ापन, कैटरिना का एलियन लुक और लैंग्वेज,  दर्शकों को उबासियां लेने को को मजबूर करता अभिषेक बच्चन का बुजुर्गाना शैथिल्य...ऐसी अनेक छवियां हैं, जो विज्ञापन की दुनिया में बड़ी चालाकी से कैश की जा रही हैं. फिल्मी हस्तियों की छवियों को भुनाना अपेक्षाकृत आसान होता है, क्योंकि ये पहले ही दर्शकों/उपभोक्ताओं के दिमाग में स्थापित हो चुकी होती हैं. लेकिन, नॉन फिल्म सेलिब्रिटीज के मामले में यह थोड़ा जोखिम भरा हो सकता है....और कुछ मामलों में शायद मूर्खता भरा भी.

विख्यात तबलावादक जाकिर हुसैन को संगत देती चाय ताज का विज्ञापन सालों तक सफलतापूर्वक चला, जिसमें वे अपनी सफलता का श्रेय ताज को देते नजर आते थे और वाह उस्ताद की जगह कद्रदानों से, विनम्रतापूर्वक वाह ताज बोलने का इसरार करते थे. लेकिन, एक बार चूक हो गई. उस्ताद की उस्तादी कुछ ज्यादा ही हो गई और ताज से बेहतर चाय लाकर दिखाने  पर तबला बजाना छोड़ देने के ऐलान से शुरू हुए प्रचार गिमिक ने न जाने कैसे पहले अफवाह और फिर खबर की शक्ल ले ली और इसे लेकर कलाजगत में उस्ताद को काफी भर्त्सना झेलनी पड़ी. इस तरह पूरा कैंपेन बाउंस बैक कर गया और फिर बाद में ताज के विज्ञापनों में तबले की थाप सुनाई  ही देनी बंद हो गई. 

लेकिन, ऐसा कभी-कभी ही होता है. वर्ना ऐसे प्रयोगों का अधिकतम जोखिम इतना ही होता है कि ये बेअसर रहें और विज्ञापन अथवा उत्पाद को अपेक्षित सफलता न दिला पाएं. शाकाहार को प्रमोट करते एक विज्ञापन अभियान में टी.एन.शेषन सरीखे आक्रामक नौकरशाह का हाथ में गाजर लेकर राजनेताओं को कच्चा चबाने का दावा करना, चेहरे के दाग-धब्बे मिटाने वाली एक क्रीम के विज्ञापन में बेदाग छवि वाली पहली महिला आईपीएस किरण बेदी, पेन के विज्ञापन में राइटिंग और फाइटिंग का घालमेल करते शायद जावेद अख्तर ऐसे ही कुछ बेअसर प्रयोगों का उदाहरण हैं. 

सच तो यह है कि छवियों का इस्तेमाल बहुत संवेदनशीलता और सतर्कता की मांग करता है. वर्ना कई बार ये इतनी शक्तिशाली हो जाती हैं कि उत्पाद और विज्ञापन, दोनों उनके आगे बौने हो जाते हैं. जैसा कि बीते साल एक पंखे के विज्ञापन में हुआ, जिसमें गुजरे जमाने के सुपरस्टार राजेश खन्ना, आनंद शैली में मुझसे मेरे फैन कोई नहीं छीन सकता बाबू मोशाय! कहते नजर आए. विज्ञापन का संदेश और ब्रांड, दोनांे उनके नोस्टेल्जिक मैनेरिज्म की छाया में छिप गए और इस एक्स सुपरस्टार का पहली बार किसी विज्ञापन में आना, विज्ञापन से ज्यादा चर्चित हो गया. 

ऐसा कभी भी हो सकता है, क्योंकि छवियां तो छवियां हैं, जो वक्त के हिसाब से अपना आकार बदलती रहती हैं और रंगरूप भी. इनकी सवारी वही कर पाता है, जो इनकी इस फितरत के रोम-रोम से वाकिफ हो. वर्ना तो छवियां कब अपने सवार को मैदाने जंग में पटखनी खिला दें, कोई नहीं बता सकता.

Sunday, January 20, 2013

सुगंध से आती सड़ांध


सुगंध और इंसान का रिश्ता बहुत पुराना है. इंसान ही क्यों, अनेक जीव-जंतुओं के जीवन में भी सुगंध एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. खासकर जब अपोजिट सेक्स के बीच के आकर्षण की बात चलती है तो यह सुगंध किसी दूत की तरह भावनाओं का सम्प्रेषण करने से भी पीछे नहीं हटती. दूसरे शब्दों में कहें तो खुशबू कुदरत की वह देन है, जो इंसान और अनगिनत प्राणियों के जीवन को तरह-तरह से महकाती है-कभी खाने की खुशबू , कभी फूलों की खुशबू, कभी पूजा की खुशबू तो कभी प्यार की खुशबू. 


ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब सुगंध बाजार में उतरती है, तो अपनी सारी गरिमा को तजकर एकदम बाजारू क्यों हो जाती है? क्या बिकने के लिए बाजारू होना जरूरी है? अगर नहीं तो क्यों सारी परफ्यूम्स और डियोज के विज्ञापन इसकी भूमिका को सिर्फ महिलाओं को आकर्षित करने तक सीमित करने वाले सिंगल ट्रैक पर चलते नजर आते हैं? किसी विज्ञापन में चाकलेट से बने एक पुरुष के विभिन्न अंगों को महिलाएं नोच-नोचकर खाती हैं, किसी में पुरुष नायक एक परफ्यूम इस्तेमाल करता है और उसे परियां अथवा पराग्रही नारियां आकर घेर लेती हैं. एक और विज्ञापन में युवा नायक द्वारा इस्तेमाल डियो की खुशबू एक नवविवाहिता स्त्री के मन को डगमगा रही है, तो किसी में अपने पति की बेवफाई से खफा महिला उसकी परफ्यूम की शीशी को घर के बाहर बैठे एक भिखारी की ओर फेंक देती है और अगले फ्रेम में पति की प्रेमिका उस भिखारी की ओर बढती दिखाई देती है. 

ये और इन जैसे अनेक विज्ञापन दो ऐसे मिथक स्थापित करने का असफल प्रयास करते हैं, जिन पर शायद ही कोई यकीन करे. एक, सुगंध सिर्फ महिलाओं को आकर्षित करने के लिए अस्तित्व में है और दूसरा यह कि महिलाओं को आकर्षित करने के लिए सिर्फ एक ब्रांडेड परफ्यूम ही काफी है. जबकि वास्तविकता यह है सुगंध नर और मादा के मन में प्रेम व कामभावना उत्पन्न करने में समान भूमिका निभाती है (भले ही इस प्रोसेस की टाइमिंग और टाइप अलग-अलग हों)  और कोई भी महिला सिर्फ परफ्यूम के आधार पर किसी भिखारी से संबंध नहीं बनाएगी.

इस तरह ये विज्ञापन दोधारी तलवार की तरह, दोनों प्रकार से स्त्री की गरिमा को धूमिल करते हैं. ये न सिर्फ उसके विवेक को उसकी कामुकता के सामने खारिज करते हैं, बल्कि उसकी उपलब्धता को एक परफ्यूम की शीशी जितना सस्ता साबित करने की धृष्टता से भी बाज नहीं आते. अनेक सांस्कृतिक और नारीवादी संगठनों/व्यक्तियों द्वारा समय-समय पर ऐसे विज्ञापनों के खिलाफ आपत्तियां भी दर्ज कराई गई हैं, और इनके प्रसारणों पर रोक लगाने के आश्वासन भी दिए गए हैं. लेकिन, नतीजा ढाक के ढाई पात जैसा ही है और इनका प्रसारण बदस्तूर जारी है.

ऐसे विज्ञापनों की भरमार का एक और निराशाजनक पहलू यह है कि इनकी भीड़ में शालीन किस्म के परफ्यूम एड नेपथ्य में चले जाते हैं. शायद उनका हश्र अनेक बहुत सारे सुगंध उत्पादों के निर्माताओं को सेफ जोन में रहते हुए चलने के लिए बाध्य करता है और वे भी अपने प्रतिद्वंद्वी को पछाड़ने के लिए उससे भी ज्यादा बोल्डनेस अपनाने को तरजीह देते हैं. इसका अर्थ यह नहीं कि गंदगी की इस बाढ़ को रोका नहीं जा सकता. बस जरूरत थोड़ी सख्ती और साहसिक कदम उठाने की है. रचनात्मकता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बिना पर किसी को भी पूरी संस्कृति को प्रदूषित करने की आजादी तो नहीं ही दी जा सकती.

यह सही है कि वैज्ञानिक शोध भी इस बात की पुष्टि करते आ रहे हैं कि प्रेम, आकर्षण और यौन संबंधों में सुगंध की भूमिका को हल्के में नहीं लिया जा सकता. लेकिन, ऐसी खुशबू शायद ही अभी तक अस्तित्व में आई हो, जो इस काम को सेकेंडों में अंजाम दे सके. खुशबू तो जितनी तेजी से फैलती है, उतनी ही तेजी से वायुमंडल में विलुप्त भी हो जाती है. लेकिन, पे्रम आगे बढ़ने में अपना समय लेता है. जाहिर है कि अगर सिर्फ परफ्यूम के सहारे दुनिया ( आधी दुनिया) को फतह करने के मिशन पर चलेंगे तो कोई नहीं जानता कि कितना परफ्यूम हवा में रहेगा, कितना बॉडी पे और खुशबू कब तक चलेगी. 

चलते-चलते

क्यों न खुशबू की भूमिका के बारे में कुछ और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित बातें जान ली जाएं!
1. निर्विवाद रूप से सुगंध नर और मादा के बीच अंतरंगता और प्रेम को प्रोत्साहित करती है.
2. पुरुष महिलाओं की देहगंध को माह के उस समय ज्यादा पसंद करते हैं, जब वे अधिक फर्टाइल होती हैं. 
3. महिलाएं ऐसे पुरुषों की गंध को पसंद करती हैं, जिनकी जेनेटिक्स उनके खुद के समान हो, लेकिन बहुत ज्यादा समानता विपरीत प्रभाव छोड़ जाती है.
4. ऑव्यूलेटिंग महिलाओं को डोमिनेंट पुरुषों की गंध ज्यादा  भाती है.
5. अंगूर की सुगंध की मौजूदगी में पुरुषों  को महिलाओं के फोटोग्राफ्स देखते हुए वे अपनी वास्तविक उम्र से औसतन छह साल छोटी नजर आती हैं.
6. परीक्षण किए हुए सभी 26 एरोमा, सबसे ज्यादा लवेंडर की खुशबू, पुरुषों की यौनेत्तजना को बढ़ाते हैं, जबकि महिलाएं मुलैठी की कैंडी, बेबी ऑयल जैसे कुछ एरोमा से उत्तेजित होती हैं, वहीं मेल कोलोन, भुने मांस और चेरी जैसे एरोमा बैकफायर करते हुए उन्हें टर्न ऑफ कर देते हैं.


संदीप अग्रवाल 
नागपुर 

Friday, December 14, 2012

छोटे मियां सुभानअल्लाह !


एक पुरानी कहावत है कि हर वयस्क व्यक्ति के भीतर एक बच्चा हमेशा जिंदा रहता है, जिसे बाहर आने के लिए सिर्फ एक अदद बहाने की जरूरत होती है. लेकिन, विज्ञापनों की दुनिया ने बच्चों में वयस्कों को खोज निकाला है. न सिर्फ खोज निकाला है, बल्कि उन्हें अपने वयस्क आचरण और सोच का प्रदर्शन करने के लिए कई माकूल मौके और बहाने भी दिए हैं. इन दिनों चल रहा एक शॉपिंग साइट के एड कैंपेन को देखकर इस आचरण को भलीभांति समझा जा सकता है, जिसमें बच्चे बड़ों की तरह मूंछ लगाए, साड़ी पहने उनके जैसा ही धीर-गंभीर आचरण करते नजर आते हैं. 

यूं तो बचपन, हमेशा से ही विज्ञापनों का प्रिय विषय रहा है और विज्ञापनों में उनकी मासूम बातों, बालसुलभ गतिविधियों का बहुतायत में इस्तेमाल भी किया गया है. लेकिन, पहले यह सब सिर्फ बच्चों के लिए बने उत्पादों, जैसे कि एनर्जी ड्रिंक्स, बिस्कुट, चाकलेट, चिप्स, स्टेशनरी, खिलौनों,  किताबों आदि के लिए किया जाता था. ज्यादातर, ऐसी चीजें जिन्हें खरीदने का फैसला करने में बहुत अक्ल लगाने की जरूरत नहीं पड़ती थी. लेकिन, ऐसे विज्ञापनों में उनकी भूमिका बड़ों की मिमिक्री करने या टीचर के साथ शरारत करने जैसी बातों तक ही सीमित रहती थी. 

इसके बाद के दौर में विज्ञापनों ने बालहठ की प्रवृत्ति का दोहन करना शुरू किया और उन्हें ऐसे उत्पादों के विज्ञापनों में भी इस्तेमाल करने लगे, जो विशेषतः बच्चों के लिए न होकर पूरे परिवार के लिए होते थे. विज्ञापनों में सर्फ-साबुन जैसी मामूली चीजों से लेकर टीवी, कार, बाइक, फ्रिज जैसी कीमती चीजों तक को खरीदने के फेसलों में उन्हें हस्तक्षेप करते दिखाया जाने लगा. जिसने भारतीय, खासकर मध्यवर्ग परिवारों में बच्चों को डिसीजनमेकर्स की भूमिका में ला दिया. विज्ञापन में हमउम्र बच्चों को निर्णायक की भूमिका निभाते देखते बच्चे वास्तविक जीवन में भी वैसी ही भूमिका निभाने लग गए. इस चलन पर अनेक बार अनेक आपत्तियां भी उठीं कि वयस्कों के काम आने वाली चीजों में बच्चों का इस्तेमाल इमोशनल ब्लैकमेलिंग को बढ़ावा दे रहा है, लेकिन समय के साथ-साथ ऐसी आपत्तियां अपने आप ही आउट ऑफ फैशन भी होती गईं.


मगर  अब बात सिर्फ इतने तक ही सीमित नहीं रही है. अब बच्चे सिर्फ स्क्रीन पर दिखने भर के लिए बच्चे हैं. वे गुडि़यों का विवाह करने की उम्र में खुद रोमांस करते नजर आते हैं, जिन चीजों का एबीसी भी शायद उन्हें मालूम न हो, उन्हें लेकर बड़ों को बेवकूफ साबित करते दिखाई दे जाते हैं. बीते दिनों एक मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनी के विज्ञापन को लेकर बहुतों की भृकुटियां तनी थीं, जिसमें सीढि़यों पर तन्हाई में रोमांस करते एक प्रीटीन ‘कपल’ को डिस्टर्ब करने आ रहे एक बूढ़े को, एक कुत्ता ऊपर नहीं आने देता. इसी एड के प्रीक्वल में यही कुत्ता, लड़की का स्कार्फ ले जाकर लड़के को देता है और उनके बीच प्रेम का सूत्रपात करता है. 

आज के विज्ञापनों में वे स्टेटस सिंबल्स को लेकर अपने पैरेंट्स से ज्यादा कॉशस हैं. एक बाइक के नए एड में अपने पिता का ‘चलता है’ वाला एटिट्यूड देखकर बच्चे का पारा चढ़ता जाता है और जब उसका सब्र जवाब दे जाता है तो वह बाप को ही झाड़ देता है कि अब बोलो चलता है. एक इंश्योरेंस कंपनी के एक विज्ञापन में बच्चा अपने चाचा को सलाह देता है कि उसे कौन सा प्लान लेना चाहिए और कैसी गर्लफ्रैंड से शादी करनी चाहिए. 

इस तरह के विज्ञापनों को लेकर समाज में ही नहीं, विज्ञापन जगत के पेशेवरों के बीच भी दो किस्म के मत प्रचलित हैं. पहली धारा मानती है कि आज के बच्चे अब पहले जैसे नहीं रहे, उनसे मासूमियत छीनने वाली और भी बहुत सारी चीजें हैं. इसके लिए सिर्फ विज्ञापनों को ही कटघरे में नहीं खड़ा किया जाना चाहिए. वहीं दूसरी धारा बच्चों के इस तरह के अनुपयुक्त इस्तेमाल के पक्ष में नहीं है. पिछले साल, इस मुद्दे पर काफी बहस के बाद, कुछ कंपनियों ने मिलकर एक प्रतिज्ञापत्र पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें कहा गया था कि वे ऐसे उत्पादों में विज्ञापनों में बारह साल से कम उम्र के बच्चों का इस्तेमाल नहीं करेंगे, जिनका संबंध उनकी पोषण आवश्यकताओं से हो. यह प्रतिज्ञा खासकर फूड सप्लिमेंट्स के विज्ञापनों के संदर्भ में थी, लेकिन ऐसे प्रतिज्ञापत्र की जरूरत बच्चों को  फीचर करने वाले सभी किस्म के विज्ञापनों के लिए जरूरी है.

संदीप अग्रवाल
नागपुर

सरहदें लांघता स्वाद

हमारी दुनिया में ऐसी बहुत सारी चीजें हैं, जो इंसान की बनाई भौगोलिक सीमाओं की बंदिशें मानना जरूरी नहीं समझतीं. जैसे कि, मोहब्बत, पंछी, बादल, हवा, नदिया...इन्हीं की तरह स्वाद भी एक ऐसी ही चीज है, जो बिना वीजा, बिना पासपोर्ट कहीं भी पहुंच सकता है. विज्ञापनों की दुनिया ने तो स्वाद के इस सफर को इतना लंबा कर दिया है कि हर मंजिल, महज एक मुकाम सी लगती है. वे देशों, महाद्वीपों की सीमाओं को तो कभी का लांघ चुके हैं, इन दिनों ब्रह्मांड की सीमाओं को लांघ रहे हैं.   


चाय से चिप्स तक, चाकलेट से  टूथपेस्ट तक, कोल्डड्रिंक्स से बर्गर तक...स्वाद हर जगह अपनी सरहदों को पार करने को उतावला नजर आता है. कहीं किसी अंजान से देश के सभ्यता से कोसों दूर रह रहे भूखों  के मुरझाये चेहरे किसी पिज्जा को देखकर फूलों से खिल उठते हैं तो कहीं किसी दूरस्थ प्रांत के बच्चे किसी कोल्ड ड्रिंक को पाकर एक अपरिचित सी भाषा में अपनी खुशी का इजहार करते नजर आते हैं. यह स्वाद ही तो है, जो परिवार में बहू को सबकी चहेती बनाता है और एक मां को अपने बच्चों की नजरों में दुनिया की सबसे अच्छी मम्मी साबित करता है.

एक विज्ञापन मृत परिजनों को अपनों के बीच वापस आकर कुरकुरों का स्वाद लेते दिखाता है तो दूसरे में एक अंतरिक्ष यात्री के मृत माता-पिता ही उसके स्नैक्स शेयर करने के लिए उसके यान में आ पहुंचते हैं. कहीं कोई शहीद सैनिक अपने पसंदीदा स्नैक्स के साथ परलोक पहुंच जाता है तो कहीं यमदूत धरती पर आकर आत्माओं को ले जाने का अपना काम ही भूल जाता है. एक और फास्टफूड के एड में सृष्टि का रचयिता परमेश्वर, स्वाद में इतना खो जाता है कि गफलत में हर चीज को डबल बनाता चला जाता है. जाहिर है कि सरहदें पार करने के इस सिलसिले में तार्किकता की सीमाएं भी कोई मायने नहीं रखतीं. आखिर मनोरंजन भी तो एक तरह का स्वाद ही है.

स्वाद एक एक ऐसे सस्पेंस नोवल की तरह हमारे सामने होता है, जिसे हम अंत जानने के बावजूद बार-बार पढ़ते हैं और उस खुले रहस्य का लुत्फ लेते हैं, जो हर बार हमें एक नया एहसास देकर जाता है. वहीं कुछ स्वाद, अबूझ रहस्यों के कोहरे में लिपटे रहकर अपनी विलक्षणता को बरकरार रखे हुए हैं. क्या आपने कभी सोचा है कि एक सदी से अपने स्वाद के फार्मूले को मजबूत तिजोरी में बंद रखने के पीछे कोकाकोला का क्या मंतव्य है? क्यों पारले-जी जैसा सोंधा स्वाद किसी और ग्लूकोज बिस्कुट में नहीं आ पाता, क्यों ब्रिटानिया की ब्रेड और अमूल बटर में मौजूद हल्का सा नमकीनी एहसास किसी और ब्रेड या बटर में नहीं मिलता?

क्या स्वाद एक लत है या फिर कोई तलब, जो सिर्फ खुद से ही शांत होती है? क्यों स्वाद एक याद की तरह हमारे मन में रच-बस जाता है, जिसे हम बार-बार जीना चाहते हैं? दरअसल, स्वाद को अमर होने के लिए एक विशेषज्ञता की दरकार होती है, जिसमें प्रेम का होना सोने पे सुहागे का काम करता है. यह प्रेम किसी अपने के प्रति भी हो सकता है और अपने काम के प्रति भी. शायद यही वजह है कि मां के हाथ का बने गाजर के हलवे और आलू के परांठों का स्वाद किसी मुहावरे की तरह हमारी संस्कृति में रच-बस जाता है, यही वजह है कि किसी नुक्कड़ के हलवाई के समोसे हमारे शाम के नाश्ते का हिस्सा बन जाते हैं, जिसके लिए आपको चार-पाँच किमी दूर तक जाना भी नागवारा नहीं गुजरता. 

स्वाद का यह जलवा विज्ञापनों में ही नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन में भी इतनी ही प्रभावी भूमिका में देखा जा सकता है. वर्ना उत्तर का समोसा और दक्षिण का डोसा, गुजरात का ढोकला, महाराष्ट्र की पावभाजी और बंगाली रसगुल्ला देश के कोने-कोने में समान रूप से लोकप्रिय न होते. वह भी एक ऐसे देश में जिसके पास भाषा से लेकर पानी तक लड़ने-झगड़ने और एक-दूसरे को नीचा दिखाने के अनगिनत बहाने उपलब्ध हैं. क्या आपने कभी सुना है कि दो राज्यों में किसी चीज के स्वाद को लेकर झगड़ा हुआ हो? क्या कभी किसी ने कहा है कि हम अपने राज्य में पड़ोसी राज्य का फलां व्यंजन नहीं बिकने देंगे, क्योंकि इससे लोग अपने राज्य का व्यंजन खाना छोड़ देंगे? कभी किसी नेता को समोसे या डोसे का बहिष्कार करने का आह्वान करते सुना है? एक इतालवी महिला को बेशक हम अपने देश पर राज न करने दें, लेकिन इतालवी पिज्जे का हम दिल खोलकर स्वागत करते हैं. चीन को भले ही हम दुश्मन नं. दो ( पहला पाकिस्तान ) मानते हों, लेकिन चाइनीज चाउमिन से दोस्ती हमें कबूल है, अमेरिका के साम्राज्यवाद को लेकर हम चाहे कितनी ही त्यौरिया चढ़ाएं, लेकिन अमेरिकी बर्गर के स्वाद के आगे हम नतमस्तक हो जाते हैं. स्वाद, सार्वभौमिक है. अगर भूख हमारे कर्म का पहला पायदान है तो अगला पायदान यकीनन स्वाद ही है.

चलते-चलते
एक पुरानी कहावत है कि अगर किसी को दिल में पहुंचना हो तो पेट का रास्ता सबसे अच्छा है. स्वाद इस रास्ते पर चलने वाला ऐसा वाहन है, जिसे स्टार्ट करने के लिए सिर्फ एक किक की जरूरत होती है. 


संदीप अग्रवाल 
नागपुर